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दो परिवारों का मान

 शाम का समय था। घर के दरवाज़े पर गाड़ी रुकी और भीतर से बेटा राघव और बहू किरण उतरे। दोनों अभी-अभी किरण के मायके से लौटे थे, जहाँ उसके छोटे भाई की सगाई हुई थी।

माँ शांति देवी दरवाज़े पर ही खड़ी थीं। बेटे को देखते ही बोलीं—
“आ गए बेटा? कैसा रहा तेरे ससुराल का प्रोग्राम? कैसी रही तेरी साली की सगाई?”

राघव वहीं माँ के पास बैठ गया। लेकिन किरण का चेहरा बुझा-बुझा था। वह सीधे अपने कमरे की ओर बढ़ गई।

शांति देवी ने तंज कसते हुए कहा—
“ये महारानी का मुँह क्यों फूला हुआ है?”

राघव ने हँसते हुए कहा—
“अरे मम्मी, पूछिए ही मत। क्या खाक प्रोग्राम था वहाँ! मुश्किल से पचास-साठ लोग भी नहीं आए थे सगाई पर। और मम्मी, वहाँ के तौर-तरीके भी… बिल्कुल देहाती। खाने का मेन्यू देखकर तो मुझे हँसी ही आ गई। फिर ऊपर से सिर्फ़ दस हज़ार का लिफाफ़ा पकड़ा दिया। और इनकी होने वाली भाभी? बस मत पूछो, बिल्कुल गँवार लग रही थी।”

राघव की बातें सुनकर शांति देवी के चेहरे पर भी व्यंग्य भरी मुस्कान आ गई।
“अरे बेटा, अब ये लड़की मिल गई, वो भी गनीमत है। तीन साल से तेरा रिश्ता अटका हुआ था।”

राघव ने ठहाका मारते हुए कहा—
“हाँ माँ, यह तो है। खुद कौन सा पढ़े-लिखे लोग हैं इनके। मेरे ससुर को तो ढंग से दूसरों के बीच बैठकर खाना भी नहीं आता। चम्मच पकड़ना तक नहीं जानते।”

दोनों माँ-बेटे खिलखिलाकर हँस पड़े।

उधर कमरे में बैठी किरण सब सुन रही थी। उसके दिल में गहरा दर्द हो रहा था। रास्ते भर पति की कटाक्ष सुनते आई थी, अब घर पहुँचने के बाद भी अपने मायके का मज़ाक उड़ते देखना उसके लिए असहनीय था।


किरण जानती थी कि उसके मायके में बहुत ऐशो-आराम नहीं है। वे अब भी गाँव और खेती-बाड़ी से जुड़े सीधे-सादे लोग थे। लेकिन वही सादगी उसे हमेशा भाती थी। उसकी नज़र में उसकी भाभी बहुत प्यारी और संस्कारी लड़की थी। उसे विश्वास था कि समय के साथ सब कुछ संभल जाएगा।

लेकिन पति राघव ने उनके भोलेपन को मज़ाक बना दिया। और माँ शांति देवी ने भी समर्थन किया।


अगली सुबह शांति देवी अपनी बेटी से फोन पर बतिया रही थीं। किरण पानी भरते-भरते ही सुनने लगी।

“हाँ बेटी, हो गई तेरे मामा की सगाई। लेकिन बेटा, क्या बताऊँ, कैसे लोग हैं। लड़के की तनख्वाह भी मामूली है, ऊपर से घर भी पुराना और छोटा। कौन अच्छा घरवाला लड़की देगा ऐसे घर को? तेरी भाभी के तो भाग्य अच्छे थे कि हमारे जैसा घर मिला।”

यह सुनकर किरण दंग रह गई। उसे यकीन ही नहीं हुआ कि उसके मायके की हर छोटी-बड़ी बात पति और सास इतनी सहजता से सबके सामने उड़ा रहे थे।

अब उसके धैर्य का बाँध टूट चुका था। उसने ठान लिया कि अब चुप रहने से कुछ नहीं होगा।


दोपहर में जब सब खाना खाकर आराम कर रहे थे, किरण ने अपनी मम्मी को फोन मिलाया। ज़ोर से बोली—
“मम्मी, कैसी हो? खाना खा लिया?
पता है, यहाँ तो आज घर में कोई सब्ज़ी भी नहीं थी। मुझे तो अचार और रोटी खाकर ही काम चलाना पड़ा।”

यह सुनते ही शांति देवी चौक गईं। फोन रखते ही बोलीं—
“बहू, ये क्या बातें कर रही थी अपनी माँ से? सब्ज़ी आज न बनी तो क्या हुआ? रोज़ तो बनती है न। घर की बातें यूँ बाहर क्यों बताती हो?”

किरण बस हल्की मुस्कान देकर चुप हो गई।


शाम को जब राघव दफ्तर से लौटा तो किरण फिर फोन पर बात कर रही थी।
“हाँ मम्मी, भैया की शादी की तैयारी कैसी चल रही है? भाभी के कपड़े ज़रूर उनकी पसंद से लेना। मेरी ननद की शादी में तो उनके ससुराल वालों ने उसकी राय तक नहीं पूछी थी।”

यह सुनते ही शांति देवी चौकन्नी हो गईं। राघव भी वहीं खड़ा था।

किरण ने आगे कहा—
“और मम्मी, आपको पता है ननद जीजाजी बहुत शराब पीते हैं। एक बार तो उन्होंने मेरी ननद को सबके सामने थप्पड़ भी मार दिया था।”

यह सुनते ही राघव गुस्से से तिलमिला उठा। उसने झपटकर फोन छीन लिया।
“ये कैसी बातें कर रही हो किरण? अपने ससुराल की बातें मायके में क्यों बताती हो? क्यों घर की इज़्ज़त मिट्टी में मिला रही हो?”

किरण ने दृढ़ स्वर में कहा—
“क्यों राघव? जब तुम मेरे मायके की बातें नमक-मिर्च लगाकर अपनी माँ और बहन को सुना सकते हो तो मैं अपने ससुराल की बातें अपनी माँ से क्यों नहीं कह सकती? क्या इज़्ज़त संभालना सिर्फ़ बहू का ही कर्तव्य होता है? दामाद को छूट है कि वह अपनी ससुराल की खिल्ली उड़ाए?”

कमरे में सन्नाटा छा गया।

किरण ने आगे कहा—
“हर घर में ऊँच-नीच होती है, राघव। लेकिन बहुएँ ससुराल की हर कमी पर पर्दा डालती हैं, ताकि परिवार की इज़्ज़त बनी रहे। मगर तुमने कभी सोचा कि जब तुम मेरे मायके की छोटी-सी कमी का मज़ाक उड़ाते हो तो मुझे कैसा लगता होगा? अगर बहू मायके की बात छुपाए तो दामाद को भी वही ज़िम्मेदारी निभानी चाहिए। परिवार एक-दूसरे का सहारा बनने के लिए होता है, मज़ाक बनाने के लिए नहीं।”

राघव की गर्दन शर्म से झुक गई। शांति देवी भी स्तब्ध थीं।

किरण ने फोन की स्क्रीन उसकी ओर घुमाते हुए कहा—
“देखो, फोन बंद पड़ा है। मैं किसी को कुछ नहीं बता रही थी। बस तुम्हें एहसास दिलाना चाहती थी कि जिस दर्द से मैं गुज़रती हूँ, वही दर्द तुम भी महसूस करो।”

राघव की आँखें भर आईं।
“सच कहती हो किरण। तुम आते ही इस घर को अपना मान बैठीं, लेकिन मैं अब तक तुम्हारे परिवार को अपना नहीं बना पाया। मैं गलती पर था।”

शांति देवी भी सोच में पड़ गईं। उन्होंने महसूस किया कि जब अपने घर की बातें बाहर निकलती हैं तो कैसा चुभता है।


उस रात पहली बार राघव ने किरण से कहा—
“अब कभी तुम्हारे मायके की मज़ाक नहीं उड़ाऊँगा। बल्कि उन्हें भी अपना परिवार मानूँगा।”

किरण ने हल्की मुस्कान के साथ उसका हाथ पकड़ लिया।
“बस राघव, यही तो चाहती हूँ। परिवार दो तरफ़ से जुड़ता है, एक तरफ़ से नहीं।”


उस दिन से किरण के मायके का मज़ाक बनना बंद हो गया। राघव और शांति देवी ने सीख लिया कि इज़्ज़त सिर्फ़ अपनी नहीं, दूसरों के परिवार की भी उतनी ही होती है।


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