“यह हरे रंग की साड़ी पहनकर कहाँ चली महारानी? अब क्या तुझे शोभा देती हैं ये रंग पहनना? पहले ही समाज में हमारी किरकिरी कर रखी है, अब ऐसे रंग के कपड़े भी पहनने शुरू कर दिए। हमारा तो समाज में जीना मुश्किल कर दिया। इसका मुँह ही न जाने कहाँ-कहाँ काला करती फिरती है। किसके लिए इतना सजती-सँवरती है? मेरे बेटे को तो खा गई, अब हमें मारकर ही दम लेगी।”
जोया जैसे ही ऑफिस के लिए निकलने लगी तो प्रमिला जी चिल्लाकर बोलीं।
“माँजी, आज ऑफिस में मीटिंग है। मुझे प्रेजेंटेशन देनी है। ड्रेस कोड है हरे रंग का। जब से राहुल हमें छोड़कर गए हैं, मैंने इन रंगों को हाथ भी नहीं लगाया। लेकिन ऑफिस जाती हूँ तो वहाँ के नियम मानने पड़ते हैं और मुझे प्रेजेंटेबल भी रहना होगा, वरना वे मुझे अगले ही दिन नौकरी से निकाल देंगे। और आपको पता है कि इस नौकरी की हमें कितनी ज़रूरत है।” जोया ने बहुत हल्के स्वर में कहा।
“क्यों? उन्हें नहीं पता कि तू विधवा है और विधवा कैसे कपड़े पहनती है? सब जानती हूँ तेरे झूठ। अपनी अदाओं से ऑफिस में सबको रिझाती है। अरे तुझसे चैन से नहीं रहा जाता।” प्रमिला के मुँह से तो जैसे जहर ही टपक रहा था।
“बस कीजिए माँजी! आपका सम्मान करती हूँ, इसका मतलब यह नहीं कि आप कुछ भी बोलती जाएँ। आपने तो केवल अपना बेटा खोया है, मेरा तो सबकुछ चला गया। आज का जमाना पुराने जमाने जैसा नहीं है। लोगों के लिए एक औरत विधवा तभी होती है जब घर से बाहर जाती है, ठीक से खा लेती है, थोड़ा सज-सँवर लेती है। लेकिन जब घर में खाने के लिए पैसे न हों, तो घर से बाहर उसी विधवा को निकलना होता है। तब किसी को वह विधवा नहीं दिखाई देती, तब तो केवल उसके फर्ज़ याद दिलाए जाते हैं।
आज के समय में आदमी हो चाहे औरत, घर से बाहर कदम रखने पर उसे हर मिनट अपने आप को प्रेजेंटेबल दिखाना होता है, न कि कुछ भी पहनकर चले जाओ। अब मुझे इतना सब कहने से पहले सोच तो लेतीं कि मैं आपके बेटे की विधवा हूँ। कभी एक निवाला भी गले से नीचे नहीं उतर पाता और आप ऐसे इल्ज़ाम लगा रही हैं। मैं चाहती तो कब की यहाँ से चली जाती, लेकिन राहुल के माता-पिता आप हैं। उनके जाने के बाद आपको अपनी जिम्मेदारी माना है।”
कहकर जोया बिना रुके ऑफिस के लिए निकल गई।
जब मीटिंग में बैठकर जोया अपनी सास के तानों को सोच रही थी, उसने फोन में राहुल की फोटो निकाली। उसकी आँखों में आँसू आ गए।
“राहुल, मुझे ज़िंदगी की जंग में अकेला क्यों छोड़ गए? तुम्हारे बिना यह जंग लड़ी नहीं जाती। अकेले जीने की जंग क्या कम मुश्किल थी, जो माँजी के ये भी ताने सुनने पड़ते हैं? मैं हार रही हूँ राहुल, मैं हार रही हूँ।”
आज के प्रेजेंटेशन के लिए कल आखिरी मीटिंग थी। इस प्रेजेंटेशन पर जोया का प्रमोशन डिपेंड था। टीम के बीच हरा रंग पहनकर आना डिसाइड हुआ। टीम लीडर थी, तो अपनी मजबूरी भी कह नहीं सकती थी।
मैनेजर ने कहा —
“अगर तुम कम्फर्टेबल न हो तो कोई और रंग रख लिया जाए?”
“नहीं, ऐसे में रंगों से कहाँ तक भागूँगी? यह सफेद रंग तो अब मेरी नियति बन चुका है, लेकिन मैं अपने काम में ऐसी किसी बात को बीच में नहीं आने दूँगी।”
मैनेजर से तो कह दिया, लेकिन जब सुबह यह हरी साड़ी अलमारी से निकाली तो उसकी आँखों में आँसू आ गए। राहुल ने उसके पहले जन्मदिन पर गिफ्ट की थी यह साड़ी। आज वही देखने वाला नहीं था।
“राहुल, काश तुम मेरे साथ होते तो मुझे इस दुनिया से लड़ने में ताकत मिलती। तुम ही तो मेरी ताकत थे।”
तभी जोया को अपने अंतर्मन से आवाज़ आई —
“मैं कहीं नहीं गया जोया। मैं तो हमेशा तुम्हारे साथ हूँ, तुम्हारी ताकत बनकर। दुनिया का क्या है, तुम कुछ भी करोगी तो तुम्हें अपने लक्ष्य से हिलाने को कुछ तो बोलेंगी ही। अब यह तुम पर निर्भर है कि तुम इस जंग को कैसे जीतती हो।”
अंतर्मन की आवाज़ सुनकर जोया को बहुत हिम्मत मिली। उसने अपने आँसू पोछे। ऑफिस पहुँच चुकी थी। उसने पूरे आत्मविश्वास के साथ अपनी प्रेजेंटेशन दी। उसका प्रमोशन पक्का था। सब उसे बधाइयाँ देने में लगे थे।
जोया ने मन ही मन अपने स्वर्गवासी पति को धन्यवाद दिया। “अगर तुम्हारी हिम्मत न मिलती तो मैं यह नहीं कर पाती।”
शाम को जब जोया घर पहुँची तो उसे लगा कि अब जाने क्या हंगामा होगा।
जैसे ही जोया अंदर पहुँची, सासू माँ उसके इंतजार में बैठी थीं। उन्होंने उसे गले लगा लिया।
“बहू, मुझे माफ कर देना। अपने दुख के आगे मैं तेरा दुख तो भूल ही गई थी। तूने राहुल के जाने के बाद हमेशा हमारा ध्यान रखा और मैं हमेशा अपने घमंड में बैठी रही। अब से तुझे मेरी तरफ से कोई परेशानी नहीं होगी। तेरी इस जंग में हम तेरे साथ हैं।”
सासू माँ की बात सुनकर जोया ने ससुर जी की तरफ देखा। वह मुस्कुरा रहे थे। दीवार पर लगी राहुल की तस्वीर भी मुस्कुरा रही थी, मानो कह रही हो — “मैंने कहा था न, तुम अपना कर्म करती रहो, एक दिन तुम यह जंग जीत जाओगी।”
जोया की आँखों से आँसू बह रहे थे। न जाने सुबह मेरी बातों का असर था या ससुर जी ने मेरे पीछे से समझाया। जो भी था, माँजी ने मेरा दर्द समझा — यही बहुत है।
जोया ने अपने मन में सोचा और कमरे में चली गई।
लेखक : अज्ञात
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