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हिसाब

 "मम्मी जी, ये फल मेरे लिए मेरे पति लाए हैं। आपको व्रत करना हो तो आप भी अपने लिए पापा जी से मंगवा लीजिए," — नेहा ने अपनी सास शिवानी जी से कहा और फल का थैला उठाकर अपने कमरे में चली गई।

शिवानी जी बैठी उसे देखती रह गईं।
उस दिन नेहा और शिवानी जी, दोनों ने ही व्रत रखा था। फलाहार के लिए फल लाए गए थे।
गुस्से और दुख में डूबी शिवानी जी ने किसी से कुछ नहीं कहा और सिर्फ़ दूध पीकर सो गईं।

अब तो अक्सर यही होने लगा। बेटा कुछ भी भेजता, तो नेहा सब अपने पास रख लेती।
शिवानी जी न तो बेटी से कुछ कहतीं, न ही पति से।
इसी कारण नेहा का मनोबल और बढ़ता गया।

एक बार शिवानी जी ने अपने पति से शिकायत की, तो उन्होंने घर की शांति के लिए शिवानी जी को ही चुप रहने को कहा।
इसके बाद पति ने ज़रूरी चीज़ें सीधे शिवानी जी के लिए लाना शुरू कर दिया।

नेहा ने इसका भी फायदा उठाना शुरू कर दिया।
वह अच्छे फल और चीज़ें खुद खाती, बच्चों को खिलाती।
और जब फल खराब होने लगते, तो बूढ़े सास–ससुर को दे देती।
कुछ बोलने पर अलग होने की धमकी देती।

शिवानी जी का एक ही बेटा था।
वे सोचतीं — "अगर अलग हो गए तो हम कहाँ जाएंगे?"
इस डर से चुप रहतीं।

एक बार शिवानी जी का बेटा अमित दो साड़ियाँ लेकर आया और बोला —
"हो सकता है दुर्गा पूजा पर मैं न आ पाऊँ, तो बच्चों और पापा के कपड़े खरीद लेना। और एक–एक साड़ी तुम और मम्मी ले लेना।"

नेहा ने देखा कि साड़ियाँ बहुत सुंदर और महंगी थीं।
उसने वो साड़ी अपनी माँ को दे दी।

दुर्गा पूजा में छुट्टी मिलने पर अमित घर आया।
उसने घूमने का प्लान बनाया।
नेहा अपने मायके जाना चाहती थी, लेकिन अमित बोला —
"नहीं, मम्मी–पापा भी साथ चलेंगे। उधर से एक घंटे के लिए तेरी मम्मी से भी मिल लेंगे।"

जब सब लोग घूमते–घामते नेहा के मायके पहुँचे, तो अमित ने देखा —
वही साड़ी, जो उसने अपनी मम्मी के लिए लाई थी, उसकी सास ने पहन रखी है।

अमित को गुस्सा आया, लेकिन उसने वहीं कुछ नहीं कहा।
घर आने पर उसने माँ से पूछा —
"मम्मी, क्या वो साड़ी आपको पसंद नहीं थी?"

शिवानी जी को तो कुछ पता ही नहीं था।
उन्होंने उल्टा अमित से ही पूछा —
"कौन सी साड़ी?"

अमित अब सारी बात समझ गया।

उसने नेहा को डाँटा, तो नेहा बोली —
"मम्मी जी तो कहीं आती–जाती नहीं हैं, इसलिए वो साड़ी मैंने अपनी मम्मी को दे दी।"

तभी पास खड़ा नेहा का 10 वर्षीय बेटा मासूमियत से बोल पड़ा —
"मम्मी तो अक्सर दादी की चीज़ नानी को दे देती हैं।
और दादा–दादी से कहती हैं, ‘आप खुद से खरीद लीजिए।’"

नेहा अपने बेटे को चुप कराना चाह रही थी, लेकिन अमित के सामने कुछ बोल नहीं पाई।

सारी बातें जानने के बाद अमित ने नेहा से पूछा —
"नेहा, एक बात बताओ — जब मैं छोटा था तो मुझे किसने पाला? तुमने या तुम्हारी मम्मी ने?"

नेहा ने शर्म से आँखें झुका लीं।

अमित ने दृढ़ आवाज़ में कहा —
"देखो, तुम्हें जो करना है करो, जिसे जो देना है दो। लेकिन मेरी माँ के हिस्से का नहीं।
क्योंकि याद रखो, आज मैं तुम्हें माफ़ कर रहा हूँ, लेकिन आगे नहीं करूंगा।
और आज से माँ–पापा की देखभाल मैं खुद करूंगा।"


लेखक : अज्ञात 


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