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खुशनसीब

 


सुहानी और सूरज की शादी को 2 महीने हुए थे। उन दोनों की लव मैरिज हुई थी, इसलिए सुहानी अपनी ससुराल में धीरे-धीरे एडजस्ट कर रही थी। वह अपनी जिम्मेदारियाँ निभाने की पूरी कोशिश कर रही थी, लेकिन फिर भी उसकी सास गीता जी उसे हर बात में उलाहना देती रहतीं और उसका मनोबल कमजोर करती रहतीं।

वैसे तो सुहानी घर का काम अच्छी तरह से निपटा लेती थी, लेकिन फिर भी गीता जी को उसका किया हुआ काम कभी पसंद नहीं आता। गीता जी अक्सर अपनी बहू की बुराई अपनी पड़ोसन शिला जी से किया करती थीं। गीता जी और शिला जी दोनों ही बहुत सालों से एक ही कॉलोनी में रह रही थीं। शिला जी, गीता जी को समझाने की बजाय उनकी बातों में हाँ में हाँ मिलाती थीं और उन्हें भड़काती रहती थीं।

एक दिन गीता जी शिला के घर गईं और अपने घर का हाल बताने लगीं —
“क्या बताऊँ शिला, जब से यह बहू आई है, लड़का तो मेरे बस में रहा ही नहीं। बस अपनी पत्नी के हिसाब से चलता है। हमारे पास तो आकर बैठता भी नहीं।”

शिला जी बोलीं —
“हाँ गीता, यह लव मैरिज वाली लड़कियाँ ऐसी ही होती हैं। इन्हें बस अपने पति से मतलब होता है और हमेशा अपने पति को अपने इशारों पर नचाना चाहती हैं।”

शिला जी, गीता जी को हमेशा गलत पाठ पढ़ाती रहती थीं, जबकि शिला की भी दो बहुएँ थीं जो अलग-अलग शहरों में रहती थीं और सिर्फ तीज-त्योहार पर नाम मात्र के लिए ही अपने ससुराल आती थीं। जबकि सुहानी तो गीता जी की सेवा भी करती थी और घर का सारा काम भी।

एक दिन सुहानी किसी काम से शिला जी के घर गई। तब शिला उसे आदर्श बहू का अच्छा-खासा लेक्चर सुना देती और हर बात में अपनी बहुओं की तारीफ़ करती रहती। सुहानी चुपचाप शिला की बातों को सुन लेती और वह समझ जाती कि यह सब कहने के लिए उसकी सासु माँ ने ही कहा होगा।

फिर अचानक एक दिन शिला की तबीयत खराब हो गई, तो सुहानी उन्हें देखने उनके घर गई और बोली —
“आंटी जी, मैं आपकी कुछ मदद कर सकती हूँ। लाइए, मैं आपके लिए खिचड़ी बना देती हूँ।”

शिला ने कहा —
“अरे नहीं-नहीं सुहानी, मैंने आज कामवाली बाई से खिचड़ी बनवा ली थी। मुझसे तो उठा ही नहीं जा रहा था।”

इस पर सुहानी ने थोड़े व्यंग्य के अंदाज़ में कहा —
“आंटी जी, बुरा मत मानिएगा, छोटा मुँह बड़ी बात कर रही हूँ। आपकी इतनी तबीयत खराब है, आपको आराम की ज़रूरत है। ऐसे समय में आपकी बहुएँ सेवा करने क्यों नहीं आईं?”

शिला ने बात को टालते हुए कहा —
“उनके बच्चों के एग्ज़ाम हैं, इसलिए नहीं आ सकतीं।”

सुहानी बोली —
“अच्छा आंटी जी, अब मैं चलती हूँ। आप अपना ख्याल रखिएगा और आपको किसी भी मदद की ज़रूरत हो तो बेहिचक मुझे बुला लीजिएगा।”

कहकर वह अपने घर वापस आ गई।

आज शिला जी को कहीं न कहीं अपनी गलती का एहसास हो रहा था कि दूर रहने वाली बहुओं से तो अच्छी सुहानी जैसी बहू है, जो कम से कम बुरे समय में अपनों की सेवा तो करती है।

धीरे-धीरे दिन गुजरते गए। शिला पूरी तरह ठीक हो चुकी थीं। एक दिन वे गीता जी के घर आईं, तो गीता जी ने फिर उनके सामने अपनी बहू का रोना शुरू कर दिया।

लेकिन इस बार शिला ने उन्हें उल्टी शिक्षा देने की बजाय सच्चाई का पाठ पढ़ाया और कहा —
“अरे गीता, तू तो खुशनसीब है जो तुझे सुहानी जैसी बहू मिली। वरना आजकल तो बहुएँ अपने ससुराल में रहना ही नहीं चाहतीं और अलग रहना ही पसंद करती हैं। सुहानी तो अपनी जिम्मेदारी पूरी तरह निभा रही है। और अगर कल को भगवान न करे तुझे कुछ हो जाए, तो सुहानी ही तेरी सेवा करेगी।”

शिला की बातें सुनकर गीता जी को कहीं न कहीं अपनी गलती का एहसास हो रहा था और वे उसके आगे एक शब्द भी नहीं कह सकीं।


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