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सच्चाई

 कुछ फैसले अचानक ही लिए जाते हैं और आज इस बात का फैसला होकर ही रहेगा कि जब बीच की बहू जीते-जी अपनी सास की सेवा कर सकती है, तो फिर सास के मरने के बाद उनको हाथ क्यों नहीं लगा सकती? क्यों नहीं उनके लिए गोग्रास का खाना बना सकती? क्यों नहीं उनके सतरे का सामान नदी में बहा सकती?

जब मछली (ताई सास) से कहा तो उसने बोली —
“बहू, हमारे समाज में ऐसा ही होता है। जब किसी बुजुर्ग की मृत्यु होती है, तब उसका अंतिम संस्कार उसका बड़ा बेटा करता है या फिर छोटा बेटा करता है। बीच वाले बेटे को अंतिम संस्कार करने का कोई अधिकार नहीं होता, ना ही उसकी पत्नी को किसी रस्म में भाग लेने का अधिकार होता। इसीलिए तेरी सास का अंतिम संस्कार तेरा जेठ अनिल ही करेगा और उनके लिए गोग्रास का खाना तेरी जेठानी या फिर देवरानी ही बनाएगी। तुझे और तेरे पति को उनकी किसी रस्म में भाग लेने का अधिकार नहीं है।”

ताई सास की बात सुनकर अपर्णा को गुस्सा आ गया।

भरा-पूरा परिवार था अपर्णा का। उसके पति तीन भाई थे। तीनों भाई मिलजुलकर एक ही घर में रहते थे। सबसे ऊपर वाली मंजिल पर उसके जेठ-जेठानी अपनी बेटी-बहू के साथ रहते थे। बीच वाली मंजिल पर उसका देवर-देवरानी अपने दोनों बेटों के साथ। नीचे वाली मंजिल पर अपर्णा अपने पति और सास के साथ रहती थी। उसके ससुर कुछ समय पहले ही भगवान को प्यारे हो गए थे।

कुछ समय पहले उसकी सास को आधे शरीर में फालिज मार गया था, जिसके कारण उनके आधे शरीर ने काम करना बंद कर दिया था। अस्पताल में डॉक्टरों ने बहुत कोशिश की उन्हें ठीक करने की, परंतु उनकी कोशिशों के बावजूद भी वे ठीक न हो सकीं। मजबूर होकर डॉक्टरों ने हाथ जोड़कर कहा —
“घर ले जाकर इनकी सेवा करो। अस्पताल में इन्हें रखने से कोई फायदा नहीं है क्योंकि हमारी कोई भी दवाई इन पर असर नहीं कर रही। अस्पताल में ज़्यादा दिन रुकने के कारण ये दुखी हो गई हैं। अपनों के बीच रहेंगी तो खुद को अपनों के साथ देख कर खुश रहेंगी।”

डॉक्टर की बात सुनकर जब हर्ष उन्हें घर लेकर आया, तब उसकी बड़ी बहन नीतू बड़ी भाभी से बोली —
“भाभी, आप मम्मी को ऊपर वाली मंजिल पर रहने दो। वहाँ पर ये आराम से रहेंगी। नीचे रहेंगी तो इन्हें देखने के लिए रोज़ाना अनेक लोग आएंगे, जिनसे यह परेशान हो जाएंगी।”

यह सुनकर बड़ी भाभी बोली —
“दीदी, मैं तो वैसे ही ब्लड प्रेशर और शुगर के कारण बीमार रहती हूँ। उनसे सेवा नहीं होगी। आप ऐसा करो, इन्हें छोटी देवरानी के पास बीच वाली मंजिल पर रहने दो। वहाँ पर इन्हें कोई भी परेशान नहीं करेगा।”

बड़ी भाभी की बात सुनते ही छोटी भाभी बोली —
“दीदी, मेरे छोटे-छोटे बच्चे हैं और घर का पूरा काम है। मैं उनकी सेवा कैसे करूंगी? उनकी सेवा करने के लिए तो दिन-रात एक आदमी चाहिए। आप इन्हें मछली दीदी के पास छोड़ दो, उनके बच्चे तो वैसे भी समझदार हो गए हैं।”

इतना सुनकर नीतू की आँखों में आँसू आ गए।

यह देखकर अपर्णा बोली —
“दीदी, आप परेशान मत हो। मम्मी को मेरे पास रहने दो, मैं मम्मी की सेवा करूंगी। यदि आने-जाने वाले लोग इन्हें परेशान करेंगे तो मैं उन्हें आपके भैया के पास बैठा दिया करूंगी। आप बिल्कुल भी दुखी मत हो। यह मेरी दूसरी माँ हैं। मैं इनकी जी-जान से सेवा करूंगी।”

अपर्णा की बात सुनकर नीतू खामोश हो गई। उन्होंने अपनी मम्मी को अपर्णा के कमरे में लिटा दिया। अपर्णा और उसके पति हर्ष दिन-रात अपनी मम्मी की सेवा करते। उन्हें प्यार से बच्चे की तरह नहलाते, सुबह-शाम उनके कपड़े बदलते, अपने हाथों से दिन में कई-कई बार उन्हें खाना खिलाते। दोनों को दिन-रात इतनी सेवा करते देख कर कई बार हर्ष की आँखों में आँसू भी आ जाते थे। तब अपर्णा प्यार से उनके आँसू पोछ देती थी।

एक दिन सुबह के वक्त जब अपर्णा ने उन्हें चाय पिलाकर रसोई में बर्तन रखकर वापस उनके पास आई तो अपनी सास को देखकर उसकी चीख निकल गई। उसकी चीख सुनकर हर्ष कमरे में आया तो उसने देखा कि उसकी मम्मी उन्हें छोड़कर हमेशा के लिए पंचतत्व में विलीन हो गई थीं।

उनके मरने की खबर सुनकर जेठानी, देवर-देवरानी, ननद-नंदोई और परिवार के सभी लोग घर पर इकट्ठा हो गए। रो-रोकर बुरा हाल था।

तब नीतू ने उन्हें समझाते हुए कहा —
“भैया-भाभी, आप रो मत। आपने तो उनकी बहुत सेवा की थी। अब उन्हें अंतिम सफर पर भेजने की तैयारी करो।”

यह सुनकर जब अपर्णा अंतिम बार अपनी सास को स्नान कराने लगी तो उसकी ताई सास ने उसका हाथ पकड़ लिया और बोलीं —
“तुम अपनी सास को हाथ मत लगाओ। बीच वाली बहू का हाथ लगाना मना होता है। तुम्हारी जेठानी और देवरानी ही इन्हें अंतिम स्नान कराएंगी और वे दोनों मिलकर ही इनके लिए 13 दिन तक गोग्रास का खाना बनाएंगी।”

यह सुनकर अपर्णा को गुस्सा आ गया। वह अपनी ताई सास से बोली —
“यह तो फैसला होकर ही रहेगा। ऐसा ही आपने तब किया था जब पापा गए थे। उस वक्त भी पापा की सेवा मैंने ही की थी। तब मैं शर्म के मारे कुछ नहीं बोली थी, परंतु अब मैं चुप नहीं रहूंगी। जब जीते-जी इनकी सेवा मैंने और मेरे पति ने की, तो मरने के बाद मैं इनको हाथ क्यों नहीं लगा सकती? क्या बीच वाली बहू अछूत होती है? जिन देवरानी-जेठानी ने इन्हें अपने पास रखने से भी मना कर दिया था, जीते-जी कभी इनका हाल-चाल भी नहीं पूछा था, आज वे दोनों इन्हें अंतिम स्नान क्यों कराएंगी? और क्यों इनके लिए गोग्रास का खाना बनाएंगी?

भाभी ने जब मम्मी को हाथ नहीं लगाया, तो अब क्यों? मम्मी जब ठीक थीं, तब वे दुखी होकर कई बार मुझे बताती थीं कि कभी-कभी जब वे बड़े भैया-भाभी और छोटे भैया-भाभी से मिलने जातीं और उनसे कुछ खाने को कहतीं, तब भैया-भाभी उन्हें कहकर खाना देने से इनकार कर देते — ‘जब तुम बीच वाले भाई के पास रहती हो, फिर खाना हमसे क्यों मांगती हो? हमारा खाना खत्म हो गया, अपर्णा के यहाँ पर खा लेना।’ यह सुनकर मम्मी दुखी हो जाती थीं।”

नीतू की बातें सुनकर उसकी बड़ी भाभी और छोटी भाभी की नज़रें शर्मिंदगी के कारण झुक गईं।

यह देखकर उसकी ताई बोलीं —
“तुम्हारी बातें सुनकर मेरी आँखें खुल गईं। मुझे सच्चाई का पता नहीं था। जो जीते-जी अपने माता-पिता की सेवा नहीं करते, ऐसे लोग ही अछूत होते हैं। उन्हें अपने माता-पिता के अंतिम संस्कार की सभी रस्मों से वंचित कर देना चाहिए ताकि और लोगों को उनसे अपने माता-पिता की सेवा करने की प्रेरणा मिले।

वैसे तो हमारे समाज में यह नियम था कि अपने माता-पिता को मुखाग्नि छोटा या बड़ा भाई ही देता है, बीच वाला भाई नहीं। लेकिन तुम्हारे बीच वाले भैया-भाभी ने जिस तरह से तुम्हारे मम्मी-पापा की सेवा की, उसने मुझे अपना फैसला बदलने पर मजबूर कर दिया। अब तुम्हारी मम्मी को अंतिम स्नान अपर्णा ही कराएगी, उनके निमित्त का खाना भी अपर्णा ही बनाएगी और उनका अंतिम संस्कार हर्ष ही करेगा।”

फिर उन्होंने अपर्णा से माफी मांगते हुए कहा —
“बहुत बड़ा अन्याय हुआ। अछूत तो तुम्हारी देवरानी-जेठानी हैं, जिन्होंने जीते-जी अपनी सास की सेवा करने से इनकार कर दिया। मुझे माफ़ कर दे कि मैंने तेरा हाथ पकड़ लिया। चल, अब अपनी सास को अंतिम स्नान कर।”

ताई सास का फैसला सुनकर अपर्णा रोते हुए अपनी सास को अंतिम स्नान कराने लगी।


लेखक : अज्ञात


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