सुबह का समय था। घर में चहल-पहल थी। रीना चाय की ट्रे लेकर आँगन में आई ही थी कि तभी सास-ननद का रिश्ता निभाने का बेमिसाल नज़ारा सामने आया।
“छोटी भाभी! तुम भी अजीब हो। तनिक भी तमीज़ नहीं है तुम्हें। बाबूजी के सामने पल्लू सर पर रखकर जाना चाहिए। और तो और, उनके सामने ही बैठकर चाय पीने लगी, खाना भी वहीं ले लेती हो! बेशर्मी की भी हद होती है। मायके से सब शर्म-लिहाज उठाकर लाई हो क्या?”
यह कटाक्ष था मनीषा का, जो कि राजीव की बहन और रीना की ननद थी। उसका स्वभाव तेज-तर्रार और ज़बान हमेशा बेबाक।
रीना सुनकर चुप रह गई। उसने सोचा—“हर बार बकवास का जवाब देना ठीक नहीं। घर में शांति बनी रहे, यही अच्छा है।”
घर में सास नहीं थीं। कई साल पहले उनका देहांत हो चुका था। पापा जी—रामलाल जी—अपनी दोनों बहुओं को हमेशा बेटी की तरह मानते थे।
बड़ा बेटा मोहन और उसकी पत्नी सविता परिवार का सहारा थे। सविता बहुत ही नेक और शांत स्वभाव की महिला थी। जब वह इस घर में आई थी, तब मनीषा और छोटा बेटा राजीव बहुत छोटे थे। सविता ने ही माँ बनकर सबकी परवरिश की। मनीषा और राजीव, दोनों उसे “माँ” कहकर पुकारते थे।
अब छोटा बेटा राजीव की शादी हो चुकी थी और रीना घर की नई बहू थी।
हर महीने मनीषा अपने मायके आ जाती। उसकी शादी पास ही हुई थी और पति बैंक में नौकरी करते थे। बैंक जाते वक्त ही उसे मायके छोड़ देते और शाम को ले जाते।
उस दिन भी वह आई और आते ही रीना पर बरस पड़ी।
रीना ने संयमित स्वर में कहा—
“देखिए मनीषा दीदी, पापा जी तो हमारे पिता जैसे हैं। जब उन्हें कोई आपत्ति नहीं है, तो आप क्यों कूद रही हैं? हम सब पापा जी के साथ बैठकर खाते-बतियाते हैं ताकि माँ जी की कमी महसूस न हो। आप तो उल्टा रंग में भंग डालती रहती हैं।”
इतना कहकर रीना उठकर अपने कमरे में चली गई।
रीना की बात से मनीषा तिलमिला गई। वह गुस्से में पापा जी के पास गई—
“पापा, अब मैं इस घर नहीं आऊँगी। देखिए ज़रा, छोटी भाभी कैसे मुझसे ऊँची आवाज़ में बात करती है। बड़ी भाभी ने तो आज तक मुझसे ऐसा लहजा नहीं अपनाया। ये तो हमारे सिर पर चढ़ रही है।”
रामलाल जी चुपचाप सुनते रहे, फिर गहरी साँस लेकर बोले—
“मनीषा, ये क्या कह रही हो? तमीज़ और संस्कार की बातें करने से पहले खुद आईने में झाँक लो। रीना तुम्हारी भाभी है। जिस तरह तुम्हारी माँ इस दुनिया में नहीं है, उसी तरह उसके पिता भी अब नहीं रहे। इसलिए मैं उसे बेटी जैसा स्नेह देता हूँ।
बड़ी भाभी सविता ने तो अपनी जवानी होम कर दी तुम्हारे पालन-पोषण में। तुम्हारी शादी से लेकर राजीव की शादी तक, सब ज़िम्मेदारियाँ उसने निभाईं। क्या तुमने कभी सोचा, उसकी जगह कोई और होती तो इतना सब करती?”
रामलाल जी का स्वर अब तेज़ हो गया—
“जब तुम्हारी शादी हुई थी, चौक-चालन का रस्म भी तुम्हारे भैया-भाभी ने निभाया। मैं विधुर था, मेरे बस की बात नहीं थी। और अब रीना आई है तो वह भी पूरे घर का ध्यान रखती है। सविता का ख़याल रखती है। मुझे कितना भाग्यशाली महसूस होता है कि मुझे इतनी अच्छी, सलीकेदार बहुएँ मिलीं।
तुम्हें क्या ज़रूरत है उनके जीवन में दखल देने की? अपना घर-बार सँभालो। यहाँ आकर चौधराइन मत बनो। सोचो, अगर तुम्हारी कोई छोटी ननद होती और वह तुम्हारे साथ ऐसा करती, तो क्या तुम सह पातीं?”
पापा जी के शब्दों ने मनीषा को भीतर तक हिला दिया। उसका चेहरा लाल पड़ गया। बौखलाहट में उसने पैर पटके और बोली—
“ठीक है, अब से मैं नहीं आऊँगी इस घर में।”
वह तुनककर निकल गई।
रीना अपने कमरे में बैठी यह सब सुन रही थी। जब उसने पापा जी के मुँह से अपने लिए इतने प्रेम और विश्वास के शब्द सुने, तो उसकी आँखें भीग गईं।
उसने सोचा—“ससुर जी ही नहीं, बल्कि माँ भी हैं मेरे लिए। कितनी खुशकिस्मत हूँ कि मुझे इतना नेकदिल ससुर मिला है।”
उस दिन के बाद रीना का मन और भी गदगद हो गया। उसने और भी ज़्यादा मन लगाकर घर संभालना शुरू किया।
बड़ी भाभी सविता ने रीना को गले लगाया और कहा—
“देख बहन, तूने बिल्कुल सही किया। कभी-कभी ननदें बहुओं को नीचा दिखाकर अपना दबदबा बनाए रखना चाहती हैं। तूने सम्मान से जवाब दिया, यही ठीक है। पापा जी भी तुझ पर गर्व करते हैं।”
रीना ने भावुक होकर कहा—
“दीदी, सच कहूँ तो माँ के जाने के बाद मैंने कभी सोचा नहीं था कि मायका जैसा अपनापन कहीं मिलेगा। लेकिन इस घर में पापा जी और आप दोनों ने वह कमी पूरी कर दी।”
धीरे-धीरे मनीषा को भी एहसास हुआ कि उसने गलत किया। पर तब तक रीना घर में अपनी जगह बना चुकी थी।
रीना रोज़ ईश्वर को धन्यवाद देती—
“धन्य हूँ मैं, जो मुझे इतना नेकदिल पापा जी और माँ जैसी भाभी मिली। सचमुच, ससुर सिर्फ पिता नहीं, सास भी हो सकते हैं।”
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