“रश्मि, तुम्हारी माँ (मम्मी/माँजी) के लिए परेशान हो जाती हूँ। अब इस उम्र में इतना काम उनके बस का नहीं है। तुम अपने बच्चों को भी माँ के सहारे छोड़कर अपनी सहेलियों के साथ घूमने निकल जाती हो। तुम्हें यह तो समझना चाहिए कि इतने छोटे बच्चे अब वो नहीं संभाल सकतीं। तुम्हें तो अच्छी तरह पता है उनके घुटनों में कितनी तकलीफ रहती है। ज़रा देर ज़्यादा खड़ी रहती हैं तो रात में सो नहीं पातीं।”
महेश जी ने अपनी बेटी रश्मि को कमरे में आराम से सोफे पर टेक लगाकर आँख बंद कर आराम करते देखा तो रहा नहीं गया और बोल दिए।
“पापा, मैं मायके आराम करने आती हूँ, काम करने नहीं। वो माँ हैं, अपनी बेटी के लिए इतना नहीं कर सकतीं? वैसे भी माँ घर का काम हमेशा से ही अपने आप करती हैं।” रश्मि ने लापरवाही से जवाब दिया।
महेश जी को रश्मि से ऐसे ही जवाब की उम्मीद थी क्योंकि वह हमेशा से स्वार्थी स्वभाव की थी। माँ से हर काम की उम्मीद रखती, लेकिन खुद कभी उनकी कोई मदद नहीं करती। वह हमेशा अपनी पत्नी पार्वती जी को समझाते रहते —
“रश्मि से भी थोड़े-बहुत काम करवाया करो, तो तुम्हें भी आराम मिलेगा। सब काम अकेली ही करती रहती हो, परेशान हो जाती हो। इसी बहाने से रश्मि सीखेगी और तुम्हारी मदद भी हो जाएगी। घर के काम सभी को आने चाहिए।”
“अरे, क्या करना है जी! अभी यहाँ है तो रहने दो अपनी मर्जी से। बाकी ससुराल जाकर तो चूल्हा-चौका संभालना ही है।” पार्वती जी, महेश जी की नाराज़गी से रश्मि को बचाने के लिए कह तो देतीं, लेकिन उन्हें पता था कि अगर रश्मि से कुछ भी कहेंगी तो वो सुनने वाली नहीं, उल्टे उन्हें ही सुना देगी।
महेश जी और पार्वती जी एक बेटे अथर्व और एक बेटी रश्मि के माता-पिता हैं। दोनों बच्चे हमेशा से बाहर रहकर पढ़े-लिखे। वहाँ हॉस्टल में तो हर काम खुद ही करते थे, लेकिन घर आते ही किसी काम को हाथ नहीं लगाते। बेटा अथर्व तो फिर भी माँ की तकलीफ समझकर काम कर लेता, लेकिन बेटी रश्मि किसी के कुछ भी कहने से माँ की तकलीफ नहीं समझती। बस अपने कमरे में पड़ी म्यूज़िक सुनना, घूमना-फिरना, मौज-मस्ती करना — यह सब उसकी आदतों में शामिल था।
कोई कुछ कहता तो उसका यही जवाब होता —
“सबकी माँ करती हैं, आपकी अनोखी नहीं कर रही हैं। अपने बच्चों के लिए ही तो कर रही हैं।”
तो पार्वती जी कुछ नहीं कहतीं। “जैसे भी होता, खुद ही कर लेती हूँ। ससुराल जाकर खुद ही सुधर जाएगी। मेरे पास कितने दिन रहना है।”
लेकिन महेश जी हमेशा टोका करते। “वो शादी से पहले जैसी थी, शादी के बाद तो और भी ज़्यादा आलसी हो गई। ससुराल में भी कोई जिम्मेदारी नहीं उठाना चाहती। जिम्मेदारियों से बचने के लिए जब जी चाहे बच्चों को लेकर चली आती है, बच्चों को माँ के भरोसे छोड़कर उसकी मौज-मस्ती चालू रहती है।”
ज़रा सी भी माँ को परेशान देखती तो कह देती —
“क्या माँजी, मैं ससुराल से थक-हार कर यहाँ आराम करने आती हूँ और आप अपना रोना लेकर बैठ जाती हो। सब लड़कियों की मायके में यही हाल रहता है।”
महेश जी का बेटा-बहू दूसरे शहर में रहते थे। लेकिन तीज-त्योहार पर आते रहते। बहू जब भी आती तो सास को आराम करने के लिए कहती रहती।
इस बार रश्मि दीपावली के त्यौहार पर अपने बच्चों के साथ मायके आ गई। तभी उसका भाई-भाभी भी आ गए। भाभी छवि ने उसे देखते ही कहा —
“जीजी, आप दीपावली पर यहाँ आ गईं और जीजा जी और आपकी सासु माँ इतने बड़े त्यौहार पर घर में अकेले हैं? तीजा-त्यौहार पर तो घर-परिवार के सभी सदस्य साथ हों तभी अच्छा लगता है।”
“मुझे अपने मायके आने के लिए किसी की परमिशन की ज़रूरत नहीं है। यह मेरा घर है, मेरा पूरा हक है। जब तक मेरे मम्मी-पापा हैं, तब तक मुझे यहाँ आने से कोई नहीं रोक सकता।” रश्मि ने तुनकते हुए छवि से कहा।
“छवि ने तुमसे ऐसा तो नहीं कहा। सिर्फ तुम्हें अपनी जिम्मेदारियाँ समझाई हैं। यह लोग बाहर से त्यौहार मनाने हमारे पास आए हैं और तुम अपने घर का त्यौहार छोड़कर अपने सास-ससुर को अकेला छोड़कर मायके आ गई हो। माता-पिता से इतना ही प्यार है तो अपनी माँ का दर्द क्यों नहीं समझती? अब इस उम्र में उन्हें आराम चाहिए। तुम बेटी होकर भी उनका दर्द नहीं समझती। लोग तो कहते हैं बेटियाँ माँ का दर्द बखूबी समझती हैं। तुम्हारी माँ कभी शिकायत नहीं करतीं, लेकिन मुझे पता है वो कितना परेशान हो जाती हैं।
यह तुम्हारा घर हमेशा रहेगा, लेकिन इसी तरह तुम सबकी तकलीफ़ों को नज़रअंदाज़ करके सिर्फ अपनी खुशी के बारे में सोचती रहीं तो हमारे ना रहने पर तुम्हारा मायका जरूर खत्म हो जाएगा।”
महेश जी ने बड़े दुखी सुर में रश्मि को समझाते हुए कहा।
रश्मि, महेश जी की बातें सुनकर सोचने पर विवश हो गई कि सच में वो कितनी स्वार्थी हो गई थी कि कभी अपनी माँ का दर्द ही नहीं समझ सकी। माँ का फर्ज़ है अपने बच्चों के सुख-दुख का ध्यान रखना, तो क्या बच्चों का फर्ज़ नहीं है कि अपने माता-पिता के दुख-दर्द को समझकर उनका हाथ बँटाएँ?
उसने महेश जी से कहा —
“आज तक मैंने जो भी किया उसके लिए माफ़ी चाहती हूँ पापा, लेकिन आगे से कभी ऐसा नहीं होगा। मैं आपको और माँ को परेशान नहीं करूंगी। आपने और भाभी ने सच ही कहा कि मुझे अपने घर का त्यौहार छोड़कर यहाँ नहीं आना चाहिए था। मैं हमेशा काम से बचने के लिए यहाँ भाग आती हूँ और माँ को परेशान करती हूँ।”
इतना कहकर रश्मि वापस जाने की तैयारी करने लगी। और इस बार उसे किसी ने रोकने की कोशिश नहीं की क्योंकि हर कोई उसके व्यवहार से परेशान हो चुका था।
लेखक : अज्ञात
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