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तकलीफ़

 


नाश्ते की टेबल पर रेनू सबको नाश्ता परोस रही थी और उसके चेहरे पर थकान साफ़ नज़र आ रही थी। तभी सोनू कहता है —

“रेनू, नाश्ता करके तुम एक-दो घंटे सो लेना। गुड़िया तब तक अपने दादा-दादी के साथ खेल लेगी।”

रागिनी (सास):
“क्यों? रात को चौकीदारी कर रही थी क्या, जो सुबह-सवेरे सोएगी? घर की बहू जब तक सोए, अच्छा थोड़े ही होता है।”

सोनू:
“माँ, जब तक सोती है क्या? आपको भी पता है गुड़िया रात को उठ-उठकर खेलती है और फिर घंटों बाद सोती है। तो रेनू को भी जागना पड़ता है। मेरी सुबह ऑफिस होती है, इसीलिए वह मुझे भी नहीं जगाती। इसी वजह से उसकी नींद पूरी नहीं हो पाती। तो थोड़ी देर सुबह सो लेगी तो उसकी भी सेहत ठीक रहेगी।”

माँ:
“बेटा, यह तो हर माँ की कहानी है। तुझे क्या लगता है, तू ऐसे ही बड़ा हो गया? सिर्फ जन्म देना ही अगर कोई मापदंड होता तो यूँ ही ‘माँ’ का इतना मान नहीं बढ़ जाता। बच्चे को जन्म देने के बाद उसे अपने सारे सुख-सुविधाओं की बलि देनी पड़ती है। यूँ ही नहीं सब कहते हैं ‘माँ बनना’ इतना आसान नहीं होता।”

सोनू:
“माँ, मुझे ऑफिस के लिए देर हो रही है। आपसे मैं शाम को बात करता हूँ। आप ज़रा दो घंटे गुड़िया को संभाल लेना।”

यह बोलकर सोनू निकल जाता है।

इधर नाश्ता खत्म करके रेनू अपने कमरे में सोने चली गई। गुड़िया को दादी के पास देकर रेनू आराम करने लगी। सास तो गुस्से से उबल रही थीं और बड़बड़ाती हुई राजेश जी से कहती हैं —
“ये आजकल की लड़कियाँ! पहले ससुराल आकर पति को अपने वश में करती हैं और फिर धीरे-धीरे पूरे घर को अपनी नौकरी पर लगा देती हैं। कर भी क्या सकते हैं, जब अपनी कोख का जना ही इनके पल्लू से बँध जाए। ये तो फिर भी पराई है।”

राजेश जी बोले —
“अरे रागिनी, क्यों ऐसी बातें कर रही हो? सालों पहले जब मैं अपनी माँ की बात मानता था और तुम्हारी नहीं, तुम तब भी रोती थीं। कहती थीं कि मेरे जैसे ‘श्रवण कुमार’ को शादी ही नहीं करनी चाहिए थी। पर अब जब तुम्हारा ‘श्रवण कुमार’ अपनी पत्नी की परवाह कर रहा है, तो वह भी तुमसे सहन नहीं हो रहा?”

रागिनी जी:
“चुप रहो जी, आपको तो बस मौका चाहिए मेरे खिलाफ बोलने का। पता नहीं मेरी किस्मत इतनी खराब क्यों है! पहले पति परवाह नहीं करता था और अब बेटा भी परवाह नहीं करता।”

फिर गुड़िया की तरफ देख कर बोलीं —
“तू भी बन जाना अपनी माँ की तरह ड्रामेबाज।”

राजेश जी:
“अरे, इसे क्यों गलत पट्टी पढ़ा रही हो? लाओ इसे मेरे पास दो। अब दो घंटे मैं खेलूँगा इसके साथ, ताकि मम्मी अच्छी नींद कर सके। पता नहीं ऐसा कौन सा जादू किया है इस रेनू ने सब पर, सब इसके ही गुणगान करते रहते हैं।”

कुछ देर बाद राजेश जी ने गुड़िया को सुला दिया। इसे देखकर सास बोलीं —
“हो गई नींद पूरी? चाहे तो और 2 घंटे सो ले, क्योंकि गुड़िया तो सो रही है।”

रेनू:
“नहीं मम्मी जी, मैं खाना बनाने जा रही हूँ। अगर गुड़िया उठे तो आवाज़ लगा देना।”

राजेश जी:
“हाँ बहू, तू जा। मैं बुला लूँगा तुझे।”

दोपहर को सभी कॉपी कर सो जाते हैं। गुड़िया खेल रही होती है। रेनू भी गुड़िया के साथ खेल रही होती है। शाम को गुड़िया सोती है, तो रेनू की भी आँख लग जाती है। सास गुस्से में खुद ही चाय-नाश्ता बना कर खा लेती हैं।

कुछ देर बाद सोनू आ जाता है और माँ को अकेले चाय-नाश्ता खाता देख रेनू के बारे में पूछता है।

माँ:
“सो रही है। तूने सुबह कहा था उसे सोने को, तो मैंने गुड़िया को अपने पास ही रखा। बेटा, अब तो मुझे लगता है मुझे सारे काम फिर से करने की आदत डालनी पड़ेगी। पता नहीं अब खाना भी खुद बनाकर ही खाना पड़े।”

सोनू कमरे में जाकर देखता है कि रेनू और गुड़िया सो रहे हैं। उसने रेनू को धीरे से जगाया और बाहर आने का इशारा किया।

सोनू:
“यह क्या रेनू! मानता हूँ तुम्हारी नींद पूरी नहीं होती, पर इसका मतलब यह तो नहीं कि तुम जब चाहो सो जाओ और माँ को सारे काम करने पड़ें। आखिर उनकी भी उम्र हो गई है, उन्हें भी तो आराम की ज़रूरत है।”

रेनू:
“मुझे माफ कर दीजिए। पूरी दोपहर खेलने के बाद गुड़िया शाम को सोई और उसे सुलाते-सुलाते कब मेरी आँख लग गई, कुछ पता ही नहीं चला।”

सास (गुस्से में):
“हाँ, पता भी कैसे चलेगा तुझे! तुझे तो यह पता है कि सास तो है, कर ही लेगी सब कुछ। अरे तेरी सास तो कितनी भली है जो तेरी तकलीफ़ समझती है। अगर मेरी सास होती ना, तब तुझे पता चलता।”

राजेश जी:
“हाँ बहू, इनके साथ होती ना तब तो तुम कब की अलग हो गई होती जैसे यह हुई थी, क्योंकि सास की बातें सुनने की इनमें हिम्मत नहीं थी। तुम तो फिर भी सुन लेती हो।”

रागिनी जी:
“क्या बोल रहे हैं आप?”

राजेश जी:
“रागिनी, जो जैसा होता है, वह पूरी दुनिया को वैसा ही देखता है। मेरी माँ तो तुमसे डरती थी। अरे, एक कप चाय के लिए भी तुम उन्हें कितना सुनाती थीं! और आज अपनी बहू पर अत्याचार कर रही हो। मत भूलो, तुम्हें भी बुढ़ापा होना है। अभी तो शरीर साथ दे रहा है, कल न दे तब एक कप चाय के लिए कहीं तरसना न पड़े।

क्योंकि हमारा व्यवहार हमारे सामने वाले को अच्छा या बुरा बनाता है। किस जमाने में जी रही हो तुम, पता नहीं। वह जमाना गया जब सास के अत्याचार बहू सर झुकाकर सहती थी। अब तो अगर बहू ने पलटकर अपने पर हुए अत्याचार का जवाब दे दिया तो पूरा बुढ़ापा ही नरक बन जाएगा।

अरे, बहू को अपना मानोगी तो वह भी तुम्हें दिल से अपनाएगी। आज उसकी तकलीफ़ तुम देखोगी तो वह कल तुम्हारी तकलीफ़ समझ पाएगी। वरना जाकर वृद्धा आश्रमों के चक्कर लगाकर आओ, तब पता चल जाएगा।”

रेनू:
“पापा जी, क्या आप मुझे ऐसी बहू समझते हैं?”

राजेश जी:
“बहू, तुम ऐसी नहीं हो। वृद्धाश्रम में आने वाले हर बुजुर्ग सिर्फ बेटे या बहू की वजह से ही नहीं होते, कुछ अपनी वजह से भी होते हैं। हम सामने वाले की तकलीफ़ अगर नहीं समझेंगे तो वह भी क्यों समझेगा?”

रागिनी जी को अपनी गलती का एहसास हो चुका था। वह रेनू के पास गईं और उसे गले से लगा लिया।


लेखक : अज्ञात


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