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महादान

 रात गुजारने के लिए बड़ी मुश्किल से उसे एक कोना मिल पाया लेकिन नींद तो जैसे रूठी हुई थी।और मन पीछे भाग रहा था ।

वह इतना तो कमा लेता था कि तीनों को कभी भूखा नहीं सोना पड़ा।पर कुछ महीने से बेटे का स्वास्थ्य ठीक न होने से परेशान था। आराम न लगने से डॉ ने बड़े शहर में इलाज के लिए कहा ।डॉ की सिफारिश से शहर के सरकारी अस्पताल में इलाज तो शुरू हो गया ।पत्नी को तो बच्चे के साथ रहने की जगह मिल गई उसके पास इतने पैसे भी नहीं किसी होटल में रूक सके।धर्मशाला दूर थी। आने जाने में काफी खर्च हो जाता।दवाइयों और खाने के लिए पैसे भी बचाकर रखना है।

सुनिए!!आवाज सुन पलटकर देखता है।

"भाईसाब क्या आप रामपुर के रहने वाले हो।"

"जी हाँ, पर आप कौन ?"

"क्या आप रिक्शा चलाते हो ?"

"हाँ, आप मुझे कैसे जानते हो ?"

"क्या आप मुझे पहचानते हो ?"

"नहीं भाईजी मैं तो पहली बार इस शहर में आया हूँ।बेटे के इलाज के लिए।"

"याद कीजिए आपने कभी किसी को कुछ दिया है।"

"भाईजी क्यों मजाक करते हो,मैं गरीब अपना परिवार भी मुश्किल से चला पाता हूँ किसी को क्या दूंगा।"

"आप पैसों से गरीब हो सकते हो पर दिल के अमीर हो।"

"दिल की अमीरी से न पेट भरता और न ही जरुरतें पूरी होती भाईजी।"

"एक बार मुझे गौर से देखो क्या कुछ भी याद नहीं आ रहा।"

"नहीं, मैंने आपको पहले कभी नहीं देखा।"

"अच्छा बताओ चार साल पहले तुमने रामपुर में किसी को खून दिया था।"

कुछ सोचते हुए "हाँ, दिया था ।मैं अपने साथी को देखने अस्पताल गया था । तभी डॉ साब ने कहा एक मरीज को खून की जरुरत है क्या तुम दे सकते हो। एक दिन पहले ही साथी को खून देने के लिए जांच कराई थी उससे तो हमारा खून नहीं मिला ,पर उस मरीज से मिल गया।"

"वह मरीज मैं हूँ।तुमने खून देकर मुझे दूसरा जन्म दिया है।देने वाला भले ही भूल जाए पर लेने वाला कभी नहीं भूलता।मैं तुम्हारे चेहरे को कभी नहीं भूल सकता।

ठीक होने पर मैनें डॉ साब से तुम्हारे बारे में पूछां तो वे तुम्हारा पता और नाम नहीं बता पाये सिर्फ इतना कहा कि रिक्शा चलाते हो।"

"हाँ वे हमें नहीं जानते।"l

"मैनें बहुत ढूढ़ा पर तुम नहीं मिले।मैं हर साल रामपुर जाता था सिर्फ तुमसे मिलने, हर रिक्शे वाले में तुम्हारा चेहरा तलाशता।"

"पर क्यों ?"

"मैं कोई एहसान नहीं चुकाना चाहता था। क्योंकि मैं नहीं चाहता तुम्हारे ऊपर कोई मुसीबत आए पर अब ईश्वर की मरजी।"

"आप अपना सामान उठाइये और चलिए मेरे साथ।"

"लेकिन क्यों ?"

"मुझे अपना फर्ज निभाना है।आपने मुझे नया जीवन दिया अब मैं आपके बेटे का इलाज कराउंगा।

"आप सच कह रहे है।"

"मैं तभी से हर तीन महीने में रक्तदान कर रहा हूँ।और करता रहूंगा रक्तदान सिर्फ दान ही नहीं अभयदान जीवनदान भी है।"

"अभी तक तो सिर्फ पढ़ा था भाईजी पर आज मालूम हुआ कि 

    " रक्तदान महादान क्यों है"


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