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मेरी बहु मेरा गुरूर

रश्मि...जब से वो घर में आयी ना, पूरा घर झिलमिला सा गया। चेतन के माँ पापा को हमेशा से एक बेटी चाहिए थी, मगर इसे किस्मत का खेल ही कहिये कि चेतन के बाद उनकी कोई औलाद हुई ही नही। चेतन को उन्होंने बहुत लाड़ प्यार से पाला था, आखिर उनका इकलौता बेटा जो था। मगर हेमा जी और मुकेश जी के मन की चाहत हमेशा एक टीस की तरह उनके दिल में रही कि काश एक बेटी तो होती, पर जब से रश्मि आयी है उनकी ये मुराद पूरी हो गयी है, रश्मि को तो आज तक लगा ही नही कि वो घर की बेटी नही बहु है। रश्मि को आज भी याद है वो दिन जब चेतन अपने मम्मी पापा के साथ उसे देखने आया था, तब हेमा जी ने जिस तरह भरी आंखों से उसे गले लगाया वो समझ गई कि वो एक घर छोड़ कर दूसरे घर ही जा रही है। "चेतन जा ना, क्यों नही जा रहा तू, आज तो संडे है और तू लैपटॉप पर लगा है देख मैंने टिकट भी बुक कर दी है।" हेमा जी चेतन से बोली। "पर माँ मेरी कल बहुत इम्पोर्टेन्ट मीटिंग है, देखो माँ टाइम नही मेरे पास, मैं अगले हफ्ते ले जाऊंगा ना।" चेतन ने लैपटॉप में नजर गड़ाए हुए कहा। हेमा जी ने रश्मि के चेहरे पर आई मायूसी को भांप लिया। "ठीक है, तो एक काम कर तू अपना और पापा का खाना बाहर से आर्डर कर दे, मैं और रश्मि जा रहे है फ़िल्म देखने।" हेमा जी ने उठते हुए कहा। "मगर माँ, आप तो कभी पिक्चर जाती नही।" चेतन ने हैरानी से पूछा। "अब जाऊंगी, अपनी बेटी के साथ ...तू लैपटॉप पर काम कर।" हेमा जी मुस्कुराते हुए बोली। "अरे मैंने क्या बिगाड़ा है तुम्हारा, मैं भी चलूंगा।" मुकेश जी भी उठ खड़े हुए। "बेटा तुम बैठो, औऱ वो क्या कहते है उसको....हां पिज़्ज़ा...पिज्जा आर्डर कर लेना अपने लिए।" मुकेश जी मुस्कुराते हुए उनके साथ चले गए। और बिचारा चेतन उनको जाते हुए देखता रहा। हेमा जी के तो पैरो को पंख लग गए थे, रश्मि के रूप में उन्हें एक नई सहेली जो मिल गयी थीं। वही मुकेश जी को बेटी मिल गयी,चेतन का तो काम ही ऐसा था कि उसे अपने मम्मी पापा के साथ ज्यादा समय बिताने को नही मिलता,उसका एक ही सपना था ग्रीन कार्ड पाना, वो अमेरिका में बसने के सपने देखता था, इसीलिए दिन रात काम मे डूबा रहता था। जब से रश्मि आयी है हेमा जी और मुकेश जी की जिंदगी में चहल पहल हो गयी, अभी थोड़े समय पहले की बात थी मुकेश जी के घुटनो में बड़ा दर्द रहता था, रश्मि ने अब सख्त हिदायत दे दी, दिन भर tv के आगे बैठना बन्द और अब से मॉर्निंग वाक और योगा शुरू। शुरुआत में तो उन्होंने थोड़ी आनाकानी की, पर अब रश्मि कहाँ आसानी से पीछा छोड़ने वाली थी, आखिर दोनों को  उसकी बात माननी ही थीं। वही चेतन भी बहुत खुश था कि चलो मम्मी पापा का दिल लगा रहता है, अब वो बेफिक्र हो अपने सपने को पूरा कर सकता है। "माँ.... रश्मि... पापा.... !!"चेतन लगभग चिल्लाते हुए आया। "क्या हुआ?" माँ ने पूछा। "माँ मेरा US का वीसा लग गया है अब मैं अगले हफ्ते ही अमेरिका जा रहा हूँ, कंपनी मुझे 2 साल के लिए अमरीका भेज रही है।' चेतन की खुशी की कोई सीमा ही नही थी। "देखना माँ मैं जल्द ही वहाँ आप तीनों को बुला लूंगा, हम तीनों वहाँ साथ ही रहेंगे।' चेतन ने मां को गोल गोल घुमाते हुए कहा। "बेटा, तू रश्मि को ले जा। हम बाद में आते रहेंगे।" पापा ने कहा। "नही पापा, अभी पॉसिबल नही, पर मैं जल्द ही आप लोगो का वीसा लगवाने की कोशिश करता हूँ। जल्द ही हम सब अमेरिका में होंगे" चेतन ने चहकते हुए कहा। चेतन की तैयारियां शुरू हो गयी, रश्मि का मन उदास था मगर वो ये सोच कर खुश थी कि आखिर चेतन का सपना सच होने जा रहा है। "रश्मि, मैं बहुत खुशकिस्मत हूँ कि तुम मेरी जिंदगी में हो, मैं जल्द ही तुम्हे अपने पास बुला लूंगा।अपना ख्याल रखना" चेतन ने रश्मि को गले लगाते हुए कहा। सब एयरपोर्ट पर उसे छोड़ने गए। रश्मि भीगी आंखों के साथ उसे विदा कर आई। रश्मि के प्रति हेमा जी मुकेश जी का प्यार और बढ़ गया, कब वो उनकी बहू से बेटी और न जाने कब वो बेटा बन गयी पता ही नही चला। "पापा, आपने फिर से चॉकलेट खाई, कितनी बार मुझे आपको मना करना पड़ेगा, आप सच में ना, उस बिट्टू के बच्चे को बताती हूँ वही रोज चॉकलेट ला कर देता है न आपको।" रश्मि ने गुस्से में कहा। मुकेश जी ने बचपना दिखाते हुये कान पकड़ लिए, रश्मि चाह कर भी अपनी हंसी रोक नही पायी। कहने को सब सही था मगर कुछ था जो सबको खटक रहा था। चेतन को अमेरिका गए 8 महीने से ज्यादा हो गए, वो कोई न कोई बहाना बना कर वीजा टालता रहा। "माँ मुझे समय दो,यहाँ आप सब कैसे रहेंगे? मैं जल्द ही कुछ इतजाम करता हूँ, माँ रश्मि भी आपके साथ ही आ जायेगी। मैं फ़ोन रखता हूँ, मुझे काम है।" चेतन ने कहा। धीरे धीरे सबके मन मे एक फांस घिरने लगी, मगर तीनो एक दूसरे के सामने चट्टान बने रहते। चेतन का फ़ोन भी आजकल कम हो गया। डेढ़ साल बीत रहा था। इसी दौरान रश्मि का मुंहबोला भाई अमेरिका गया। "रश्मि दी, मुझे आपसे  कुछ बहुत जरूरी बात करनी है।" पुष्पक ने कहा। "हाँ बोलो पुष्पक।" रश्मि ने कहा। "दी, प्लीज आप खुद को संभालिएगा, जो मैं बता रहा हूँ।" पुष्पक ने जब कहा तो रश्मि का दिल धक से रह गया। "दी, जीजू ने यहाँ किसी अमेरिकन लड़की से शादी कर ली है और वो उसी के साथ रह रहे है।" पुष्पक ने जैसे ही कहा रश्मि को लगा दुनिया गोल गोल घूम रही है वो गश खा  कर गिर गयी। "चेतन, जो मैंने सुना सब सच है क्या? तुझे शर्म नही आई रश्मि को हम सब को इतना बड़ा धोखा देते हुए। क्या इस दिन के लिए हमने तुझे पाला पोसा पढ़ाया बड़ा किया।" मुकेश जी गुस्से में बोले जा रहे थे। "पापा, आपने कुछ अलग तो नही किया, जानवर भी बच्चे पैदा करते है, बड़ा करते है लेकिन जब उनको उनकी मंजिल मिल जाती है वो अपनी राह चले जाते है, पापा मेरे सपने बहुत बड़े है, आप मां और रश्मि कभी भी उनको समझ नही पाओगे।मैं जल्द ही डिवोर्स पेपर भेज दूंगा" चेतन ने कहा। मुकेश जी को लगा सब कुछ चेतनाशून्य हो गया। घर मे एक मातम सा छा गया। कुछ दिनों बाद जब रश्मि के पिताजी रश्मि को लेने आये तो उसने उनके साथ जाने से मना कर दिया। "पापा, मैंने कभी ये महसूस नही किया कि मैं कभी अपने घर से दूर आयी हूँ, ये मेरा घर है ये मेरे मम्मी पापा है मैं कैसे इन्हें छोड़ कर जा सकती हूँ। चेतन ने जो किया बहुत गलत किया मगर आज मैं इन्हें छोड़ कर जाती हूँ तो जिंदगी भर मैं खुद को माफ नही कर पाउंगी।" रश्मि ने दृढता से कहा। मुकेश जी हेमा जी ने भी उसे बहुत समझाया पर वो टस से मस नही हुई। रश्मि ने भी जॉब शुरू कर दी, अब वो उस घर का बेटा बन चुकी थी, तीनो अपने अंदर ढेर सारा दर्द समेटे खुद को संभालने की कोशिश कर रहे थे, हेमा जी की आँखे रश्मि को देख भर आती। "लगता है हमने पिछले जन्म में जरूर कोई पुण्य किये थे जो रश्मि हमारी जिंदगी में आई, वो मेरी बहु नही मेरा बेटा है मेरा गुरुर है।" मुकेश जी ने हेमा से कहा। धीरे धीरे जिंदगी पटरी पर दौड़ने लगी। एक रात मुकेश जी ऐसे सोये की अगले दिन उठ न सके। "चेतन, पापा नही रहे।" रश्मि बस इतना ही कह पायी। 2 मिनट की चुप्पी के बाद जो चेतन ने कहा उसकी कल्पना रश्मि सपने में भी नही कर सकती थी।चेतन ने आने में अपनी असमर्थता जता दी, हेमा जी ने रश्मि की आंखों को पढ़ लिया। धीरे धीरे सब रिश्तेदार इक्ट्ठा हो गए। ये निर्णय हुआ कि चेतन का चचेरा भाई सुदीप मुखग्नि देगा। अर्थी सज चुकी थी। मुकेश जी अपनी अंतिम यात्रा पर थे। मुखग्नि का समय आया, जैसे ही सुदीप आगे आया हेमा जी ने उसका हाथ पकड़ लिया। "ये अंतिम अधिकार तो सिर्फ एक बेटा ही निभा सकता है औऱ जब मेरा बेटा यहाँ है तो कोई और क्यों ये करेगा?" हेमा जी ने कहा। "रश्मि...... अपने बाबूजी को मुखग्नि तुम ही दोगी।" हेमा जी ने कहा। दूर कहीं आसमान में मुकेश जी एक मुस्कुराहट के साथ अपने बेटे को अपना आखिरी कर्तव्य निभाते देख रहे थे। दोस्तो, ये कहानी एक सच्ची घटना पर आधारित है। ससुराल कभी घर नही बन सकता.... बहु कभी बेटी नही बन सकती....सास कभी माँ नही बन सकती इन सब बातों को झुठलाते हुए रश्मि ने एक बहु से बेटे के सफर को तय किया।


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