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जनता का सेवक

 एक राजा अपने देश की आन्तरिक स्थिति जानने के लिये वेश बदलकर घूमते हुए एक नगर में पहुँचे, वहाँ के एक हवलदार से बातचीत के उद्देश्य से मार्ग पूछा तो हवलदार ने  अकड़कर कहा–'मूर्ख! मैं सरकारी कर्मचारी हूँ, मेरा काम रास्ता बताना नहीं है। राजा ने नम्रतापूर्वक कहा–यदि सरकारी आदमी भी किसी यात्री को रास्ता बता दे तो कुछ हर्ज नहीं है ? खैर कोई बात नहीं, मैं किसी दूसरे से पूछ लूँगा, पर इतना बता दीजिये कि आप किस पद पर कार्य करते हैं ? हवलदार ने ऐंठते हुए कहा–अन्धा है क्या, मेरी वर्दी को देखकर पहचानता नहीं कि मैं कौन हूँ? राजा ने कहा–शायद आप पुलिस के सिपाही हैं। उसने कहा–नहीं, उससे ऊँचा। राजा–तब नायक हैं? हवलदार–उससे भी ऊँचा। राजा–हवलदार हैं? हवलदार ने कहा–हाँ, अब तू जान गया कि मैं कौन हूँ, पर तू इतनी पड़ताल क्यों कर रहा है, तू कौन है ?

         राजा ने कहा–मैं भी सरकारी आदमी हूँ। हवलदार ने सकपकाते हुए पूछा क्या तुम सिपाही, नायक, हवलदार हो ? राजा ने भी उसी अंदाज में कहा–उससे भी ऊँचा। दरोगा, सूबेदार, कप्तान से भी ऊँचा। अब तो हवलदार घबराने लगा, उसने पूछा–तब

आप मन्त्रीजी हैं? राजा ने कहा–भाई, बस एक सीढ़ी और बाकी रह गयी है। अब हवलदार ने गौर से देखा तो सादे वेश में राजा को पहचान लिया, वह गिड़गिड़ाते हुए क्षमा–दया माँगने लगा। राजा ने मीठी वाणी में ही कहा–पद की दृष्टि से तुम चाहे कुछ भी हो, पर व्यवहार की कसौटी पर बहुत नीचे हो। यदि ऊँचा बनना चाहते हो तो पहले मानव बनो, सहनशील और नम्र बनो, अपनी ऐंठ कम करो, क्योंकि तुम जनता के सेवक हो।


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