Skip to main content

कुछ रंग प्यार के ऐसे भी

 सुधा और दिलीप बहुत खुश नजर आ रहे हैं। रक्षाबंधन का पावन त्यौहार आने वाला है और बेटी सृष्टि, नाती मिवान और बेटा शुभम भी बेंगलुरु से आने वाला है ।दोनों पति-पत्नी ने बच्चों के लिए तैयारी में कोई कसर बाकी नहीं रखी है। घर की साफ सफाई ,राशन सब कुछ ला कर रखा है। बच्चे आते हैं तो घर में बहुत रौनक हो जाती है। नन्हे से मिवान  से पूरा घर महक उठता है। सुधा और दिलीप अपने जीवन के उत्तरार्ध में जिंदगी को अपने हिसाब से बहुत बेहतर तरीके से जी रहे हैं ।

सुधा एक शिक्षिका हैं और दिलीप शिक्षा विभाग में अकाउंटेंट है। दोनों ने अपने बच्चों को प्यार भरी परवरिश दी है। प्यारा सा घर बनाया है। पर यह प्यारा सा घर  22 वर्ष पुराना हो गया है ।दोनों बच्चे चाहते हैं, घर में थोड़ा परिवर्तन हो जाए। अपने मम्मी पापा को प्यार से समझाने की कोशिश करते हैं। पापा किचन छोटा है इसके बीच की दीवार को तोड़कर डाइनिंग रूम बना लेते हैं ....हाल में आपने बहुत बड़ा दीवान लगा लिया है... इसलिए हाल छोटा नजर आता है ..इस पलंग को हटा देते हैं ...और भी कुछ छोटे-छोटे परिवर्तन करना चाह रहे हैं… आपका फ्रिज भी पुराना हो गया है ...इसको भी बदल दीजिए... और घर पर बहुत ज्यादा सामान है इसको कम कीजिए। किचन क्राकरी नई ले लीजिए। सुधा और दिलीप बच्चों की सभी बातों को मानने के लिए तैयार नहीं है। उनकी अपनी आदत बन गई है। वह हाल से दीवान नहीं हटा सकते ...क्योंकि शाम को स्कूल से आने के बाद सुधा सोफे पर लेटती हैं और दिलीप दीवान पर ....उनकी बड़ी बहन जब भी आती है वह भी दीवान पर ही सोती है। बच्चे जो परिवर्तन चाह रहे हैं, वे  उन दोनों को पसंद नहीं आ रहे हैं.... ऐसा नहीं है कि वे बच्चों का मन नहीं रखना चाहते.... पर उन दोनों की आदत हो गई है, उन चीजों के साथ और उसी में भी अपना कंफर्ट महसूस करते हैं.....

उनके घर में ऊपर एक रूम भी बना हुआ है, लेकिन उसमें  नलों में बराबर पानी नहीं आता ,अतः जब भी शुभम  और उसकी पत्नी आते हैं.... पानी की परेशानी हो जाती है.... सुधा और दिलीप ने अपने बच्चों  के साथ ऊपर एक अच्छा कमरा और तीसरी मंजिल पर एक पानी की टंकी रखने का मन बनाया है... ताकि बच्चे जितने भी दिन आए खुशी-खुशी रह सके ....ऊपर का कमरा आधुनिक रूप से बनाने  की योजना है... और वैसे ही तैयारी चल रही है, पर नीचे का फेरबदल पति पत्नी के गले नहीं उतर रहा,... रक्षाबंधन का पर्व उत्साह पूर्वक मना लिया.... बच्चे चले गए .... दिलीप अपनी पत्नी सुधा से कहने लगे"

मैं नीचे कुछ भी परिवर्तन पसंद नहीं करूंगा... ऊपर का कमरा उनके अनुसार बनाने के लिए तैयार हूं" "सुधा ने कहा "अच्छा कुछ भी परिवर्तन नहीं करेंगे, आप कोई टेंशन मत लो, बच्चे हमारा भला ही चाहते हैं, वे चाहते हैं कि  मम्मी पापा अपने जीवन का शेष समय बहुत ही अच्छे से गुजारे... इसलिए वह परिवर्तन चाहते हैं.. लेकिन अगर हम पसंद नहीं करेंगे... तो उन्हें इस बात की शिकायत भी नहीं है। सुधा ने अपने पति को प्यार से समझाया, और कहा कि यह तो हमारा और हमारे बच्चों का प्यार का रंग है ,और कुछ रंग प्यार के ऐसे भी होते हैं।


Comments

Popular posts from this blog

दामाज बेटा बन जाता है पर बहू पराये घर की रहती है

  "अरे भाईसाहब (ननदोई) इतनी सुबह सुबह ?" "मम्मी पापा ने बुलाया था.कुछ जरूरी काम है." प्रमोद ने रश्मि को रूखा सा उत्तर दिया. "आ गये बेटे. बहू खड़े खड़े क्या बातें कर रही हो जाओ चाय बना लाओ." "जी मम्मी जी" रश्मि चाय बनाते हुए सोच रही थी ऐसी क्या बात हो सकती है जो भाईसाहब को सुबह बुलाया.कल रात उसे सास ससुर के कमरे से खुसुरफुसुर की आवाजें आ रही थी.मन में उठी किसी अनहोनी की आशंका को झटक कर वह चाय ले कर ड्रॉइंग रूम में गई. "बहू नाश्ता जल्दी बना देना.हमें काम से जाना है." "मम्मी जी कहाँ जाना है ?" "आकर बताते है तुम नाश्ते की तैयारी करो." रश्मि ने सास ससुर और प्रमोद को नाश्ता दिया.कुछ देर में तीनो तैयार हो कर चले गये और रश्मि घर के काम निपटाने लगी. ये थी रश्मि. शर्मा परिवार की इकलौती बहू.रश्मि की शादी रूपेश से हुए एक साल हो गया था.रूपेश की एक बड़ी शादीशुदा बहन कंचन और एक छोटी बहन काजल  जो कॉलेज में पढ़ती है.रूपेश दूसरे शहर में नौकरी करता था.उसकी इच्छा थी कि रश्मि  मम्मी पापा की देखभाल के लिए उनके साथ रहे.रश्मि ने भी रूपेश की इच्...

घर के लक्ष्मी का सम्मान

  "रवि... सुनिए ना... मुझे आपसे कुछ ज़रूरी बात करनी थी। वो मेरे पैरों में बहुत सूजन आ रही है और कमर में भी..." सुमन ने रात के सन्नाटे में, करवट बदलते हुए अपने पति रवि से कहने की कोशिश की। उसकी आवाज़ में एक दबी हुई कराह थी। रवि ने झल्लाहट में अपनी आँखों से बांह हटाई और मोबाइल की स्क्रीन पर समय देखा। रात के साढ़े ग्यारह बज रहे थे। "सुमन, प्लीज यार! अभी ऑफिस की टेंशन कम नहीं है जो तुम घर की रामायण शुरू कर देती हो? सुबह से शाम तक घर पर रहती हो, आराम ही तो करती हो। माँ बता रही थीं कि आजकल तुम दोपहर में दो-तीन घंटे सोती हो। फिर भी थकान? और ये पैरों में सूजन वूजन सब वहम है, थोड़ा वॉक किया करो। अब सोने दो, कल मेरी बहुत बड़ी प्रेजेंटेशन है।" रवि ने कंबल मुंह तक खींच लिया और दूसरी तरफ करवट ले ली। सुमन की आँखों में आए आंसू अँधेरे में ही जज़्ब हो गए। वह क्या बताती कि जिसे उसकी सास 'दोपहर की नींद' कहती हैं, वह असल में छत पर पापड़ और अचार सुखाने की चिलचिलाती धूप वाली मेहनत होती है। रवि को सच सुनना ही नहीं था, क्योंकि उसके लिए माँ का कहा पत्थर की लकीर था। सुमन ने चुपचाप एक दर्द न...

हकीकत

  सुमन के हाथों से शादी की मेहंदी भी नहीं उतरी थी कि उसके साथ सुधा जी ने उसे पूरी तरह से काम में झोंक दिया। सुबह से शाम हो जाती, लेकिन सुधा जी के काम तो मानो पूरे ही नहीं होते थे। जैसे ही सुमन आराम करने के लिए अपने कमरे में जाती, वैसे ही सुधा जी कहतीं, "बहू, जरा मेरे सिर में तेल की मालिश कर दो" या "कपड़े प्रेस कर दो"। कोई न कोई बहाना बनाकर पहले से ही तैयार रखतीं। सुमन कुछ भी नहीं बोल पाती और झट से काम पर लग जाती—आखिर नई-नई बहू जो ठहरी! सुमन के पति रोहित दूसरे शहर में नौकरी करते थे। शादी के लिए भी कम ही छुट्टियाँ मिली थीं, इसलिए शादी के आठ दिन बाद ही अपने काम पर लौट गए। तभी एक दिन… "अरे बहू, कब तक सोती रहेगी? कितना समय हो गया है, आज तुम्हारे ससुर जी ऑफिस के लिए भी निकल गए और तूने चाय तक नहीं बनाई। आगे से ध्यान रखना, समझ गई? ठीक चार बजे उठ जाना, क्योंकि तेरे ससुर जी सुबह छह बजे ही निकल जाते हैं। बहुएं तो काम के लिए ही तो लाई जाती हैं, एक लौटी बहू हो, नहीं बताएंगे तो कैसे सीखोगी? बड़े-बूढ़ों की कदर करना सीखो," सुधा जी नसीहत देतीं। "मुझसे गलती हो गई मांजी...