दो भाइयों की एक बहन थी सलोनी । गांव में मिडिल तक ही स्कूल था।इसलिए सलोनी आठवीं तक ही पढ़ पायी। उसकी दादी हमेशा कपड़ों पर सुंदर सुंदर कढ़ाई करती रहती थी।सलोनी को भी उन्होंने यह सिखाया।सलोनी के हाथों में बहुत सफाई थी।दादी उससे कहती "लाड़ो लड़कियों को कोई न कोई हुनर जरूर आना चाहिए ।"
सलोनी उनकी बात सुनकर हँस देती।
फिर उसकी शादी हो गई।वह नए परिवार में आई।यहां घूंघट करने की प्रथा थी। सलोनी को घूँघट में काम करने में बहुत परेशानी होती थी ।वहां पानी की भी समस्या थी ।उन्हें बहुत दूर पानी लेने जाना पड़ता था। धीरे-धीरे पड़ोस की हमउम्र बहुओं राजी और बरखा से उसकी मित्रता हो गई।तीनों पक्की सहेलियाँ बन गईं।तीनों साथ साथ पानी लेने जाती। खाली समय में खूब बातें करती।
दोपहर को वो खाली रहती थीं।एक बार सलोनी अपने मायके गयी थी तो अपने साथ कपड़े और धागे लेकर आई थी ।यहां भी कुछ ना कुछ बनाते रहती थी।परिवार बढ़ने से आर्थिक परेशानी होने लगी।
सलोनी ने सोचा" घर में रहते हुए मैं अपने सिलाई कढ़ाई के हुनर को आगे बढ़ा कर अपने पति का सहयोग कर सकती हूं।" उसने रंग बिरंगे धागों से कपड़ों पर सुंदर कढ़ाई की और बैग, थालपोश, टेबल क्लॉथ बनाएं ।उस गांव में विदेशी पर्यटक घूमने आते रहते थे। सलोनी अपने बनाये समान बाजार की एक महिला शंकरी को बेचने के लिए दे देती थी। विदेशी पर्यटक उसकी चीजों को देखकर बहुत ही पसंद करते थे और उसे हाथों हाथ ले लेते थे ।शंकरी सलोनी से कहती थी "तुम और ज्यादा चीजें बनाकर देना।पर्यटक और लेना चाहते हैं।"
सलोनी उसकी बात सुनकर
सोचने लगी कि मैं अकेले तो और ज्यादा नहीं बना पाऊंगी। मेरी सहेलियां काफी समय घर में खाली रहती हैं। उसी दिन उसने राजी और बरखा से कहा "क्या तुम लोग भी सिलाई कढ़ाई का काम करोगी ?इससे समय भी अच्छा गुजरेगा और थोड़ी बहुत आमदनी हो जाएगी।मैं अपने पैरों पर खड़ी हूं ।तुम भी हो सकती हो ।"
उसकी सहेलियां उसकी बात मान गई ।सलोनी ने उन्हें सब सीखा दिया।धीरे धीरे आसपास की अन्य महिलाएं भी यह सब जानकर प्रभावित होने लगी और अपने हुनर बढ़ाने लगीं।उन सबके साथ मिलकर सलोनी ने एक छोटा सा समूह " सखी" बना लिया। सब मिलकर दोपहर को एक साथ बैठकर सुंदर सुंदर कढ़ाई करतीं ,कपड़े रंगतीं,सिलाई करतीं ,एक दूसरे से सुख दुख की बातें करतीं, लोकगीत गातीं। इस प्रकार उनका यह समूह और काम बढ़ता ही गया।
विदेशी पर्यटक आते और उनके सामान लेकर अपने देश जाते । उनके रिश्तेदार उनसे अपने लिए भी ऐसी चीजें लाने को कहते। उन्हीं में से एक पर्यटक लिज़ा ने सलोनी को सलाह दी कि तुम विदेशों में अपना सामान भेजो । मैं इसमें तुम्हारी सहायता करूंगी। सलोनी ने अपनी सहेलियों से बात की। सब तैयार हो गई ।इस तरह से उनका सामान विदेशों में भी प्रसिद्ध होने लगा।
उदयपुर में हस्तकला के सामानों की प्रदर्शनी का आयोजन हुआ। जिसमें सलोनी ने भी भाग लिया और वह प्रथम आई ।
हाथों में सुई और धागा सलोनी की पहचान बन गयी।
दो सहेलियों के साथ शुरू किया उसके काम की प्रसिद्धि आस-पास के गांव में भी फैलने लगी। वहां की महिलाओं ने भी उस समूह में जुड़ने की इच्छा जाहिर की।सलोनी ने उन गांवों में जाकर समूह बनाकर सबको इस काम में जोड़ लिया।अब सब आत्मनिर्भर होने लगी और अपने पैरों पर खड़ी हो गई ।
उन्होंने गांव में ही पानी की व्यवस्था भी कर ली। अब उन्हें दूर दूर तक पानी लेने नहीं जाना पड़ता था जिससे उनका समय और मेहनत बचने लगा ।उनके घर की सास और दादी सास भी अपनी रुचि बतातीं ।उन्हें पारंपरिक नमूने सिखाती।इनके अनुभव का लाभ सबको मिलने से चुनरी,घाघरा आदि भी बनाने लगी।
पुरुषों ने भी उनका साथ दिया।उन्हें लंबे घूँघट से आजादी मिली।अब केवल सिर पर पल्ला लेने लगीं।
सलोनी की छोटी सी कोशिश ने उन सबका जीवन बदल दिया। आज सलोनी किसी परिचय की मोहताज नहीं है। उसका "सखी "समूह तो देश विदेश में बहुत प्रसिद्ध हो गया है।सलोनी को कई पुरस्कार मिले हैं।
मन में कुछ करने की इच्छा हो और लगन से उसे किया जाए और अगर उसमें सहेलियों का साथ मिल जाए तो फिर उन्हें आगे बढ़ने से कोई नहीं रोक सकता ,सब आसमान छू ही लेती हैं।
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