बखूबी जाना चाहती हो तो जा सकती हो , मैं तुम्हे नहीं रोकूंगा चारू? रोज रोज की किचकिच से फ्रस्ट्रेशन हो गया है यार ! कभी माँ की शिकायत, कभी ईशा की ? तुम बहू हो घर की , सब कुछ तुम करती हो घर में, इसके बावजूद भी तुम घर छोड़कर जाने की धमकी देती हो न ! चिढ़ आता है मुझे , पूरा ख्याल रखता हूँ तुम्हारा। फिर भी नुक्ताचीनी , हद है भई। देखो तुम्हारी अपनी मनमर्जी, जो ठीक लगे किया करो ।मुझे इन औरतों के चक्कर में ना ही घसीटो तो बेहतर ?
पवन का यह दलील सुन नखशिख तक जल भुन गई है चारू | कहाँ मायके का आरामतलब जिंदगी , कहाँ यहाँ ससुराल की जिंदगी? सब कुछ खुद से करते रहो , बड़ी ननद हर तीज त्योहार में दोनों बच्चों के साथ आ पधारती हैं लेकिन क्या मजाल कि अपने जूठे बर्तन उठा सींक पर रखे । उनके बच्चे भी आते हैं तो पूरा घर में उधम मचा कर रख देते हैं। सास दोनों ननद की तिकड़ी बन जाती और उन लोगों की सेवा टहल करने की बांदी बन जाती मैं, बड़ी ननद अपने ससुराल में घर के काम से जी चुरातीं थीं इसलिए होली , दीवाली , हरियाली तीज में बच्चों समेत चली आतीं है । ननदोई सीधे साधे हैं ननद के दांव पेंच समझ नहीं पाते हैं?
चार दिन बाद होली आनेवाली है , घर के पचासों काम हैं । होली के एक दिन पूर्व ननद आयेंगी और मायके में खा पीकर पिकनिक/ त्योहार मना कर चल देंगी।
मैं यह कहना चाहती हूँ कि पर्व त्योहार का समय है , घर के काम में सब लोग मेरी मदद कर दिया करें । आप अपनी माँ से कहेंगे तो जरूर समझेंगी , अगर मैं कहती हूँ तो उन्हे बुरा लग सकता है ?
इसी बात को लेकर चारू अड़ी हुई है कि आप या तो एक रसोईया का इंतजाम कर दीजिए या मम्मी जी से सबको कोऑपरेट करने के लिए कहिए या मुझे मायके भेज दीजिए। हर फेस्टिवल के समय तीन तीन अल्टीमेटम सुनाती चारू, बिचारी की बात को पवन तवज्जो ही नहीं देता? उनके बेडरूम की बात वहीं रह जाती , मतलब "ढाक के तीन पांत " ।
इस बार चारू पूरी तरह से अडिग है , आर या पार!
कमर में दर्द रहता है पर पवन उसके कमर में आयोडेक्स लगा देता है , प्यार से सिर पर हाथ भी फेरता पर अपनी माँ और बहनों को कुछ कह नहीं पाता ? क्या करे समझ से परे हैं ये तीनों स्त्रियाँ !सोचता है कि इन तीन रिश्तों के बीच सैंडविच बनता जा रहा है ।
हमारी शादी को चार साल बीत गए हैं , माँ भी सब घर गृहस्थी की बागडोर चारू को सौंप निश्चिंत हो गई है ।लेकिन घर में छोटे छोटे कामों की लिस्ट भी लंबी है । सुबह के चाय से लेकर रात के खाने तक की व्यवस्था करना एक अकेली जान के लिए कितना मुश्किल है , वही जानती है ।
अब माँ से मुझे साफ-साफ बात करनी होगी , माँ नहीं मानती है तब अलग घर किराए का ले कर चारू के साथ रहने चला जाऊंगा । ऐसा करने से सब की सब खुश तो रहेंगी।
माँ ! कुछ बहुत जरूरी और अहम बात कहनी है ।
हाँ हाँ बेटा कहो ! चारू की तबियत ठीक नहीं रहती है , कमर में बहुत दर्द रहता है और चार दिन के बाद होली भी आ रहा है । सोचता हूँ कि उसे लेकर किराए के घर में ले
शिफ्ट हो जाता हूँ। तबियत खराब होने की वजह से खाना बनाने में दिक्कत हो रही है उसे।
होली में दीदी को यहाँ आने से मना कर दो, ऐसा करो तुम और स्निग्धा होली मनाने दीदी के ससुराल चली जाओ । दीदी जीजाजी और भगीना भगीनी को नानी व मौसी का साथ मिल जाएगा।
अरे बेटा !
क्या कह रहे हो तुम ? हम क्यों अपनी बेटी के ससुराल जाएं परब मनाने ? होश ठिकाने में है न तुम्हारा !
भला देखो तो ! कोई माँ त्योहार को सेलिब्रेट करने बेटी के ससुराल जाती है क्या ? मैं तो कभी ना जाऊं अपना घर द्वार को बिसरा के कहीं भी !
सुन बचवा /बिटवा मेरी बहू भी कहीं ना जावेगी , ना तू कहीं जाएगा ? जहाँ तक कनक के आने का सवाल है , उसे मना करती हूँ यहाँ आने से , कह देती हूँ कि अपने तीज त्योहार अपने घर ही मनाया करे , मायके में नहीं।
जब आना हो उसे , गर्मी की छुट्टी में आया करे ।
अभी समधिनजी को फोन लगाती हूँ बेटा ! तुमने मेरी आँखे खोल दी है , मैं भूल गई थी जिस तरह से मेरी बहू चारू मेरे घर की शोभा है इज्जत है वैसे ही कनक भी अपने ससुराल की बहू होने के नाते वहाँ की इज्जत है।
हेलो समधनजी ! सादर चरण स्पर्श।
जी समधिनजी , जी आपसे कुछ कहने के लिए आपको फोन लगाया है मैंने।
जी कहिए न!
होली करीब आ रही है, इसलिए कल बेटी के ससुराल में फल मिठाई गुझिया व कपड़े भिजवा रही हूँ पवन के हाथों ।
कनक की पहली होली है ना !मैंने अपनी बेटी को मिसगाइड किया है समधिनजी , आपसे सहृदय हाथ जोड़कर क्षमा मांगती हूँ । कनक आपकी ही बहू -बेटी है , आपके घर की श्रृंगार है । पिछले अनगिनत त्योहारों को बहू के साथ ना मनाने की टीस के लिए दिल से माफी चाहती हूँ । फोन पर अपने समधिन जी से कहते कहते चारू की सास फफककर रो पड़ती हैं।
उधर कनक की सास भी अपनी समधिन की बातों से द्रवित हो कह पड़ी हैं , समधिन जी कोई बात नहीं ! आपने मेरा मान सम्मान मेरी खुशी मेरी बहू को लौटा दिया है , इसलिए अब मलिन न हों आप ! धन्य हो गई मैं जिसे इतनी अच्छी समधिन मिली हैं।
पवन प्रसन्नचित्त है कि उसके द्वारा फेंका गया पासा एकदम सही निशाने पर जा लगा है और आनन फानन में माँ ने दूसरे दिन ही तुरंत एक रसोइए का प्रबंध किया है। पवन भी सोच रहा है रिश्तों को संभालने के लिए झूठ भी बोलना पड़े तो क्या हर्ज है ।
माँ भी खुश , बीबी भी खुश और बहन भी खुश।
पूरे चार साल के बाद चारू भी गर्भवती है इसलिए माँ पूरा ध्यान रखती है अपनी बहू का ।
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