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आखिर चार लोग क्यों कहेंगे

 बिदाई के बाद ससुराल के रीति और रस्मों से काफी थक गई थी मंजुला, सोचा कि थोड़ा आराम कर लूं। जैसे ही अपने कमरे में जा कर लेटी सास ने आकर कहा-"अरे बहू चलो बाहर लोग मिलने आये है, देखेंगे कि बहू सो रही है तो क्या कहेंगे" मंजुला थकान को किनारे कर के मेकअप ठीक कर सास के पीछे-पीछे चल दी। मुँह दिखाई शुरू हुई, गलती से थोड़ा सा घूँघट सरक गया तो तुरंत चाची सास ने आ कर कहा-"बहू घूँघट ठीक कर लो चार लोग देखेगें तो क्या कहेंगे कि देखो बहू को घूँघट लेने का भी सहूर नही है। चुप चाप मंजुला ने घूँघट गले तक खींच लिया, गर्मी में इतना भारी घूँघट रखना मजबूरी हो गई थी।

मंजुला ने सोचा कि ये चार लोगों वाली बात चार दिन की ही होगी क्योंकि नई बहू को लोग ज्यादा ध्यान देते है। लेकिन ये तो रोज का ही हो गया। हर बात पे चार लोगों की नजर गड़ी रहती थी। मंजुला ने सोचा कि इस बारे में अपने पति दिनेश से बात करु  लेकिन कुछ सोच के चुप ही रही।

एक दिन मंजुला ने दिनेश से बाहर घूमने जाने की बात कही, सास को भनक लग गई तो तुरंत आ कर कहा-"अरे अभी तो कुछ ही महीने हुए है शादी को ऐसे बाहर जाओगे तो चार लोग यही कहेंगे कि देखो शादी को साल भर भी नही हुआ और मिया बीवी चल दिये घूमने। मन मार कर रह गई मंजुला। अपने पति के साथ चाय भी नही पी सकती थी बैठ के क्योंकि अगर कोई देख लिया तो क्या कहेगा। छत पर जाती ये सोच के कि बाहर जाने नही मिलता कम से कम छत पर ही ठंडी हवा ले लू लेकिन वहाँ भी चार लोगों की नजरें दिखाई देती।

समय अपनी गति से चलता जा रहा था। मंजुला और दिनेश के प्यार की निशानी भी इस दुनिया मे आने वाली थी। उस समय भी चार लोग अपनी राय देने आ जाते "अरे बहू काम-धाम किया कर दिन भर आराम करेगी तो बड़ी दिक्कत आएगी बाद में" इतनी तकलीफ के समय भी आराम का नाम ही नही था, क्योंकि चार लोगों की नज़रे अभी भी उसी पर थी।

कुछ महीनों की तकलीफ के बाद एक नन्ही सी परी खुशी उसकी गोद मे आ गई। पूरा परिवार बहुत खुश था। मंजुला के पास अब दोहरी जिम्मेदारी आ गई थी, घर भी संभालना था और नन्ही परी को भी। चार लोग आ-आकर बता जाते कि बहू को ये खिलाओ ये मत खिलाओ। नतीजा ये हुआ कि शरीर कमजोर हो गया।

दो महीने बाद मंजुला कि बुआ सास सीढ़ियों से गिर गई थी इस कारण मंजुला की सास उनकी देख रेख करने चली गई। अब तो मंजुला पर मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ा। एक तो पहले से कमजोर शरीर उस पर घर भी संभालना और खुशी को भी। उस पर दिनेश को ऑफिस के काम से बाहर जाना पड़ गया। मंजुला कभी खाना बनाती कभी भूखे सो जाती, कभी सुबह का खाना ही रात में गरम कर के खाती। बर्तन अब चार टाइम की  जगह एक ही बार धुले जाते। नींद किसे कहते है वो तो भूल ही गई थी।

कुछ समय बाद जब सास वापस आई घर की हालत देख के बड़बड़ाना शुरू कर दिया "अरे ऐसे रखते है घर, चार लोग देखेंगे तो क्या कहेंगे कि कैसी बहू है घर भी व्यवस्थित नही रखती। सास की बात सुन कर मंजुला का पारा गरम हो गया, अब तक जितना कुछ अपने अंदर दबाई थी आज सब एक साथ बाहर आ गया "माँ जी किसने हक दिया है चार लोगों को कहने का, जब मैं भूखी प्यासी थी तब तो चार लोग नही आये ये देखने की बहू भूखी है, दिन भर काम करते और खुशी को संभालते थक जाती थी तब तो चार लोग नही आये मदद करने, दिन भर और रात भर सो नही पाई तब तो चार लोग नही आये तो अब किस हक से और क्यों आएंगे चार लोग। जब ये चार लोग किसी के दुख तकलीफ में साथ नही दे सकते तो इन्हें कोई हक नही है किसी कि ज़िन्दगी में दखल देने का। अरे हम घर मे कुंडी लगा के  रखते है कि कोई भी हमारी मर्ज़ी के बिना हमारे घर मे ना आये वैसे ही हमारे जिंदगी में भी एक दरवाजा होता है तो क्यों कोई बिना मर्ज़ी के हमारे ज़िन्दगी में ताक-झाँक करने आएगा। माँ जी माफ करना लेकिन उन चार लोगों को अब कोई हक नही है कुछ कहने या देखने का........


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