बेटा, बहू की बहुतों कहानी हमनें पढ़ी, बहू बेटा बुजुर्ग माँ, बाप को तंग करते है आश्रम भेज देते है, हाँ ये सही है इसमें दो राय नही, कभी नही करनी चाहिए, अगर बहू दूसरे घर की है पर बेटा तो अपना वो कैसे कर सकता है अपने ही जन्म दाता के साथ
पर, पर बात दूसरी ओर की भी देखें
बड़ी, खुशी से लोग बेटे की शादी कई लड़कीयाँ ढुढ़ने के बाद एक पसंद करने के बाद करते हैं,
पर क्या बहू आने के बाद वो बहू को बेटी की तरह रखते हैं?? कहते है सबों से बहू तो बेटी जैसी है, किंतु, किंतु, क्यों नही कहते हमारी बेटी है,
बेटी जैसा ही बना देती हैं बहुत अच्छा होता है पर बहू कितनी भी अच्छा बनाए मीन मेख निकालने से बाज नही आते, बहुत अंतर करते हैं बहू, बेटी में, अगर बेटा बहू की तरफदारी कर दे तो जोरू का गुलाम,, बेटा कभी बहू को घुमाने और बाहर खाना खिलाने ले जाए तो घर के लोग मुँह फूला कर
बैठे रहेगें यहाँ तक की खाना भी बहू ही आकर बनाएगी यही सोचकर,
क्या बहू को बेटी की तरह तब्बजो नही दे सकते क्यों उस पर सौतेला व्यवहार करते है, वो अपनी माँ, बाप भाई, बहन पूरा परिवार छोड़ कर अपना घर ही समझ कर आई है ससुराल, पर हर बात पर ओलहना, ताने, यही मिलती है, बहुत तो इस कदर नीच काम करते है की बहू को मार देते है या मरने के लिए मजबूर कर देते है मेरे आँखो की सामने की बात है, इस बात में केवल अनपढ़ लोग नही पढ़े लिखे की मात्रा भी उतनी ही होती है,
दोस्तों हम सब आज उम्र के पड़ाव में है जहाँ ज्यादातर सास ससुर बन गए है, तो क्या हमें अपने व्यवहार में बहू को बेटी समझने की समझ रखनी चाहिए, केवल बहू से उम्मीद न करे, उसके लिए भी सोचे, कुछ लोग हो सकता है बेटी जैसा व्यवहार करते हो पर सभी नही करते है
मैं भी कभी बहू थी कुछ तो बेटी वाली दुलार मिली थी और कुछ वही बहू वाली बात,
अगर बहू से बेटी वाली उम्मीद करते है तो
बहू को बेटी बनाकर रखें, घर में खुश नुमा मौहोल जरूर रहेगी
जिनकों ठीक न लगे वो माफ करना
जिन्हें ठीक लगे वो जवाब जरूर देना,,
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.ए पोस्ट मै कई साल पहले लिखकर डाली थी फेसबुक,
पर कुछ लाइन अभी जोड रही हूँ,
मां के दाह संस्कार के दिन बात चली, बडो ने बताया नियम, विधि विधान ,कि बहू जितनी नहाए, और बेटी जितनी खाए, दिवंगत आत्मा को प्राप्त होता है,
मैने कह दिया ऐसा क्यों बहु ही क्यों बार बार नहाए, और बेटी दमभर खाए, ए सरासर गलत है, बेटी क्यों कष्ट न करे मां के बहू को ही क्यों चुना जाता है कष्ट के लिए,
फिर से बहू ही तकलीफ करे, ऐसे क्यों भई, ऐसा नियम कानून बनाने वाले हमेशा से बहू को सुख नही तकलीफ देने की सही का कानून बना कर गए,
पर समय बदल रहा, बेटी भी मुख अग्नि देने लगी है,
कंधा देने लगी है मां बाप को उसी तरह बहू को दिल से स्वीकार करो, खुद की आगे की खुशहाल जीवन के लिए,
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