अपने जवान भतीजे अक्षय की मौत के चार महीने बाद मायके आई मधु जी बहुत ही हतप्रभ थी अपनी भतीज बहु अंबिका के माथे पर सुहाग बिंदी देखकर।
मधु जी जरा पुराने विचारों की है, उन्हें लगता है कि पति के जाने के बाद न तो पत्नी कोई बनाव श्रंगार कर सकती है,न ही अच्छा पहन सकती है।वो एक स्त्री होकर भी एक स्त्री की वेदना को नहीं समझती है।
वो नही समझती है कि अंबिका की उम्र ही क्या है, शादी को नौ साल ही हुए है,जब उस पर ये दुखों का पहाड़ टूट पड़ा है ,दो छोटे बच्चे हैं , जिनके सर पर पिता का साया तो रहा नही, यदि माँ भी दिन-रात गम मे डूबी रही तो बच्चों को कौन संभालेगा। क्या एक बिंदी लगाने भर से ये साबित होता है कि उसे कोई दुःख नही...
मधु जी अंबिका के हाथों में रंगीन चूड़ियां व माथे पर लाल बिंदी बर्दाश्त नही कर पा रही है,एक दिन रात के खाने के बाद वो अपने भैया व भाभी से कहती है...
ये क्या भैया अक्षय को गुजरे साल भर भी नही हुआ और आपने बहु को बिंदी व बनाव श्रंगार की इजाजत दे दी,ये समाज क्या कहेगा.. लोग क्या कहेंगे...
काफी गंभीर रहने वाले गौतम जी जिनका ह्रदय पहले ही से ही बेटे की मौत से द्रवित है, अपनी बहन मधु से कहते हैं,देख मधु मैं समाज की परवाह नही करता ,ये समाज जब कहां था जब हमने बेटा, और अंबिका ने अपना सुहाग खो दिया। कौन आया था, हमें संभालने ।मेरे मासूम पोते - पोती पलक व प्रखर के सिर से पिता का साया उठ गया।दोनों मासूम अपनी माँ की सूनी आंखों में थोड़ी खुशी व हंसी ढूंढते हैं।
एक दिन जब नन्ही पलक ने अपनी मांँ के माथे पर बिंदी लगा कर कहा मम्मी बिंदी लगा लो आप पर बहुत अच्छी लगती है। तब अंबिका की रूलाई ने मेरा कलेजा फाड़ दिया, और मैंने और तेरी भाभी ने फैसला किया कि यदि एक छोटी सी बिंदी मेरे बच्चों के चेहरे पर मुस्कान ला सकती है तो क्यों नहीं...
और अक्षय भी तो सभी की खुशी चाहता था। इसके आगे वो कुछ न कह सके,उनका गला रुंध गया ।
तब उनकी पत्नी सरोज ने अपनी नन्द मधु से कहा दीदी हम अक्षय को पहले ही खो चुके हैं, अब अंबिका ही हमारी बेटी है और दोनों बच्चे हमारी जिंदगी को रोशन करने वाले चिराग..
अब इन्हीं की खुशियां ही हमारे जीने का मकसद है
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