Skip to main content

स्टोर रूम

 रमन अंदर आया तो पूरे स्टोर रूम में शादी में बांटने के लिए बने लड्डुओं से भरी टोकरियां,पेठे,भुजिया,मट्ठी से भरे बर्तन पड़े थे.मैदे और चीनी की बोरियां,रिफाइंड के कैंटर.

तेल,घी,बेसन की अजीब सी महक पूरे स्टोर रूम में थी.स्टोर रूम में एक तरफ बिछी थी एक पुरानी सी चौकी.उसपर एक नया चादर डला था.कुछ फूल तोड़कर बिखेरे हुए थे.और चौकी के एक कौने पर नई नवेली दुल्हन नन्दा बैठी थी सजधज कर चेहरे पर घूंघट लिए. आज रमन और नन्दा के विवाहबन्धन में बंधने के बाद की पहली रात थी.और ये रात स्टोर रूम में मिठाईयों और नमकीन की मिली जुली महक के बीच गुजरनी थी.

मां पिताजी के जल्दी गुजर जाने के बाद रमन को बड़े भइया सुबोध ने पाला पोसा था.पढ़ाई के साथ साथ वो मेडिकल स्टोर में भैया की मदद किया करता था.भाभी को देवर रमन का साथ मे रहना शुरू से पसन्द नही था. एक तो छोटा मकान ऊपर से एक आदमी के लिए अलग से सारी व्यवस्था.दो कमरों के मकान में एक कमरा भैया भाभी का था तो दूसरे में उनके तीनो बच्चे सोते थे.रमन हॉल में गद्दा बिछाकर सोता था.

पर शादी के बाद तो एक कमरा चाहिए था.भैया ने भाभी को समझाया था कि कम से कम पहली रात के लिए वो रमन और नन्दा को अपना कमरा दे दे.पर भाभी टस से मस नहीं हुई.और अंत मे स्टोर रूम में ही जगह बनाकर चौकी लगाई गई थी.

रमन की रेलवे में क्लर्क की नोकरी लगे अभी दो महीने ही हुए थे.उसे अपना सरकारी क्वार्टर मिलने में चार पाँच महीने का समय लगने वाला था.पर रमन दुखी था कि वो तो हर हालात में खुद को समायोजित कर सकता था पर नन्दा क्या सोचेगी.ये रात तो जीवन मे दोबारा आने वाली नही थी.नन्दा  के दिमाग में आखिर कैसी तस्वीर उसकी और उसके घर वालो की बनने वाली थी.

स्टोर रूम का दरवाजा अंदर से सही से बन्द भी नही होता था इसलिए जैसे तैसे उसे बन्दकर रमन नन्दा की तरफ बढ़ा.चौकी पे नन्दा के बगल में वो चुपचाप बैठ गया था.दरवाजा सटने के बाद तो महक और भी दमघोंटू हो गयी थी.बेहद शर्मिंदगी महसूस कर रहा था रमन.

नन्दा और रमन वेसे पुराने मित्र थे.स्नातकोत्तर के दो साल दोनो साथ ही थे कॉलेज में.फिर शादी में एकदूसरे के लिए कपड़ो और गहनों की खरीद दोनो ने साथ साथ की थी.

रमन ने फिल्मों में देखा था कई बार कि कैसे पहली रात दुल्हन का घूंघट उठाया जाता है।

उसी अंदाज में वो अभी धीरे से घूंघट पीछे सरका ही रहा था कि अचानक स्टोर रूम का दरवाजा खुला और सारे बच्चे,मेहमान और भैया भाभी खिलखिलाते हुए अंदर आ गए.

रमन भौचक था.सारे लोग बस उसे देख हंसे जा रहे थे.इधर जिसे वो नन्दा समझ रहा था वो तो बगल के फ्लैट वाली भाभी थी.

"मेरे बुद्धू देवरजी आपकीं ये भाभी इतनी कठोर भी नही कि आपकीं इस रात्रि को यूं स्टोर रूम में बीत जाने दूं."

"हा रमन जब तक तुम्हे तुम्हारा सरकारी घर नही मिल जाता तब तक हमारा कमरा ही तुम्हारा बेडरूम रहेगा."

"और चाचू इस पूरी प्लांनिंग में नन्दा चाची भी बराबर से शामिल है."

रमन को अब सारा माजरा समझ आ गया था.उसे थोड़ी शरम भी आ रही थी और वो अंदर अंदर खुश भी था.

भाभी उसे कमरे के अंदर तक छोड़ने की रस्म पूरी कर चुकी थी.पूरा कमरा रजनी गन्धा के फूलों की खुश्बू से नहाया हुआ था.पलंग को बड़े नायाब तरीके से सजाया था.

बीच में दुल्हन के लिबास में नन्दा कितनी अलग लग रही थी.बेहद बातूनी स्वभाव की एक लड़की लाजवंती के पौधे की तरह खुद को खुद में समेटे बैठी हुई थी.

रमन बेहद आनन्दित था कि उसके वैवाहिक जीवन का आरम्भ एक खुशनुमा माहौल में हो रहा था.


Comments

Popular posts from this blog

दामाज बेटा बन जाता है पर बहू पराये घर की रहती है

  "अरे भाईसाहब (ननदोई) इतनी सुबह सुबह ?" "मम्मी पापा ने बुलाया था.कुछ जरूरी काम है." प्रमोद ने रश्मि को रूखा सा उत्तर दिया. "आ गये बेटे. बहू खड़े खड़े क्या बातें कर रही हो जाओ चाय बना लाओ." "जी मम्मी जी" रश्मि चाय बनाते हुए सोच रही थी ऐसी क्या बात हो सकती है जो भाईसाहब को सुबह बुलाया.कल रात उसे सास ससुर के कमरे से खुसुरफुसुर की आवाजें आ रही थी.मन में उठी किसी अनहोनी की आशंका को झटक कर वह चाय ले कर ड्रॉइंग रूम में गई. "बहू नाश्ता जल्दी बना देना.हमें काम से जाना है." "मम्मी जी कहाँ जाना है ?" "आकर बताते है तुम नाश्ते की तैयारी करो." रश्मि ने सास ससुर और प्रमोद को नाश्ता दिया.कुछ देर में तीनो तैयार हो कर चले गये और रश्मि घर के काम निपटाने लगी. ये थी रश्मि. शर्मा परिवार की इकलौती बहू.रश्मि की शादी रूपेश से हुए एक साल हो गया था.रूपेश की एक बड़ी शादीशुदा बहन कंचन और एक छोटी बहन काजल  जो कॉलेज में पढ़ती है.रूपेश दूसरे शहर में नौकरी करता था.उसकी इच्छा थी कि रश्मि  मम्मी पापा की देखभाल के लिए उनके साथ रहे.रश्मि ने भी रूपेश की इच्...

घर के लक्ष्मी का सम्मान

  "रवि... सुनिए ना... मुझे आपसे कुछ ज़रूरी बात करनी थी। वो मेरे पैरों में बहुत सूजन आ रही है और कमर में भी..." सुमन ने रात के सन्नाटे में, करवट बदलते हुए अपने पति रवि से कहने की कोशिश की। उसकी आवाज़ में एक दबी हुई कराह थी। रवि ने झल्लाहट में अपनी आँखों से बांह हटाई और मोबाइल की स्क्रीन पर समय देखा। रात के साढ़े ग्यारह बज रहे थे। "सुमन, प्लीज यार! अभी ऑफिस की टेंशन कम नहीं है जो तुम घर की रामायण शुरू कर देती हो? सुबह से शाम तक घर पर रहती हो, आराम ही तो करती हो। माँ बता रही थीं कि आजकल तुम दोपहर में दो-तीन घंटे सोती हो। फिर भी थकान? और ये पैरों में सूजन वूजन सब वहम है, थोड़ा वॉक किया करो। अब सोने दो, कल मेरी बहुत बड़ी प्रेजेंटेशन है।" रवि ने कंबल मुंह तक खींच लिया और दूसरी तरफ करवट ले ली। सुमन की आँखों में आए आंसू अँधेरे में ही जज़्ब हो गए। वह क्या बताती कि जिसे उसकी सास 'दोपहर की नींद' कहती हैं, वह असल में छत पर पापड़ और अचार सुखाने की चिलचिलाती धूप वाली मेहनत होती है। रवि को सच सुनना ही नहीं था, क्योंकि उसके लिए माँ का कहा पत्थर की लकीर था। सुमन ने चुपचाप एक दर्द न...

हकीकत

  सुमन के हाथों से शादी की मेहंदी भी नहीं उतरी थी कि उसके साथ सुधा जी ने उसे पूरी तरह से काम में झोंक दिया। सुबह से शाम हो जाती, लेकिन सुधा जी के काम तो मानो पूरे ही नहीं होते थे। जैसे ही सुमन आराम करने के लिए अपने कमरे में जाती, वैसे ही सुधा जी कहतीं, "बहू, जरा मेरे सिर में तेल की मालिश कर दो" या "कपड़े प्रेस कर दो"। कोई न कोई बहाना बनाकर पहले से ही तैयार रखतीं। सुमन कुछ भी नहीं बोल पाती और झट से काम पर लग जाती—आखिर नई-नई बहू जो ठहरी! सुमन के पति रोहित दूसरे शहर में नौकरी करते थे। शादी के लिए भी कम ही छुट्टियाँ मिली थीं, इसलिए शादी के आठ दिन बाद ही अपने काम पर लौट गए। तभी एक दिन… "अरे बहू, कब तक सोती रहेगी? कितना समय हो गया है, आज तुम्हारे ससुर जी ऑफिस के लिए भी निकल गए और तूने चाय तक नहीं बनाई। आगे से ध्यान रखना, समझ गई? ठीक चार बजे उठ जाना, क्योंकि तेरे ससुर जी सुबह छह बजे ही निकल जाते हैं। बहुएं तो काम के लिए ही तो लाई जाती हैं, एक लौटी बहू हो, नहीं बताएंगे तो कैसे सीखोगी? बड़े-बूढ़ों की कदर करना सीखो," सुधा जी नसीहत देतीं। "मुझसे गलती हो गई मांजी...