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खिड़की

 कमरे में आते ही जैसे ही उसकी नजर बंद खिड़की पर पड़ी चेहरे पर मुस्कुराहट आ गई। "अरे! इस कमरे में दो-दो खिड़कियाँ" मुँह से "वाह" निकल ही गया। खिड़की और उसका तो जैसे चोली-दामन का साथ है।

शुभम जब उसे देखने आए थे सभी ने कुछ देर के लिए उसे अकेला छोड़ दिया था ताकि दोनों बातचीत कर अपनी सहमति दे सके। उसकी सहमति की तो किसी को जरूरत ही नहीं थी या यूँ कहे सहमति-असहमति देने का अधिकार ही नहीं था उसे। जो सब मिलकर तय करेंगे उसे वही मानना होगा। शुभम को अपनी ओर देखते देख कुछ असहज महसूस कर रही थी। उसने सिर्फ़ एक प्रश्न ही पूछा "क्या आपके कमरे में खिड़की है?" शुभम ने कोई जवाब नहीं दिया शायद उन्हें उसका प्रश्न ही अटपटा लगा होगा। इसके बाद उन दोनों के बीच कोई बात नहीं हुई। शुभम की हाँ से शादी तय हो गई। उसके लिए शादी कोई खुशी की बात नहीं थी वो तो एक बैरक से निकलकर दूसरे बैरक में जाने जैसी बात थी।

उसके जन्म के साथ ही उसकी माँ का स्वर्गवास होना एक अत्यंत दुखद घटना थी। पर इसके लिए उसे ही दोषी ठहराया गया। क्या नन्ही सी जान भी किसी की मौत की जिम्मेदार हो सकती है? फिर कौन चाहेगा कि उसके सिर से माँ का साया न हो। पिता ने तो उसे कभी गोद में लिया ही नहीं। दादी के लिए भी वह मनहूस ही थी। उसे वह इसी नाम से पुकारा करती थी। जब स्कूल में दाखिला हुआ तब पता चला कि उसका नाम खुशी है वरना तो वह अपना नाम मनहूस ही समझती थी पता नहीं क्या सोच कर उसका नाम खुशी रखा जिससे वह कोसों दूर थी।

माँ की गोद की जगह उसे काकी माँ की गोद मिली। जो उसे भरपूर प्यार देती थी। पहले तो वह तो काकी माँ को ही माँ समझती थी, पर थी तो वह घर की नौकरानी ही,फिर भी काकी माँ से उसे लगाव माँ से कम न था।

तीन साल की उम्र होगी जब काकी माँ ने बताया कि उसकी नई माँ आने वाली है वह बहुत खुश थी। माँ आएगी उसे भी गोद में लेगी, ढेर सारा प्यार करेगी।

"पापा के साथ गहनों से लदी गुलाबी साड़ी में आई माँ  बहुत सुंदर लग रही थी। बिल्कुल फिल्मी हिरोइन की तरह। उसने कुछ देर इंतजार किया सोचा माँ मुझे इशारें से बुलाएगी फिर गोद में बैठाएगी और बहुत सारा प्यार करेंगी। पर जब नहीं बुलाया तो वह स्वयं माँ की गोद में जाकर बैठ गयी।

"माँ ने तो उसे ऐसे हटाया जैसे उनकी गोद में कोई सांप बिच्छू आकर बैठ गया हो, और पापा भी उस पर बहुत नाराज़ हुए। उसके बाद आज तक माँ उसे कभी सुन्दर नहीं लगी।"

उसे बाहर जाकर खेलने की इजाजत नहीं थी। उसके कमरे की खिड़की ने ही उसका परिचय  बाहरी दुनिया से कराया

अब तो उसका पूरा समय खिड़की पर ही बीतता वहाँ से खेल का मैदान जो दिखाई देता था। बच्चों को खेलते झगड़ते देख कभी-कभी उनके बीच अपने को भी महसूस करती थी।

घड़ी पर नजर गई रात के ग्यारह बज रहे थे। गला भी सूख रहा था उठकर पानी पिया। खाली दिमाग न चाहते हुए भी अतीत में गोते लगाने लगता है।

उसे स्कूल में डाल दिया गया। स्कूल उसे हमेशा ही अच्छा लगा वहाँ उसे हँसने बोलने, उछलकूद करने की बंदिशें नहीं होती थीं। माँ दिनों दिन फूल रही थी उसे लगता था माँ बहुत सारा खाना खाती है। आज सोचती हूँ तो हँसी आती है। माँ के पेट में दर्द हो रहा था उन्हें अस्पताल ले जाया गया जब काकी माँ ने बताया कि उसका छोटा भाई आया है।

पाँच साल की उम्र में पहली बार भाई को लेकर सपने देखना शुरु किया  लेकिन ये नहीं जानती थी कि सपनों का हकीकत से दूर का रिश्ता होता है। माँ जब भाई को अस्पताल से लेकर आई कपास से नाजुक छोटे छोटे हाथ पैर देखकर छूने की इच्छा हुई। पर पूरी न हो सकी माँ उसे लेकर कमरे में चली गई। देखना, छूना तो दूर उसे कमरे में जाने की भी इजाजत नहीं थी। इस बार फिर खिड़की ने उसका साथ दिया। जिससे वह भाई को देखा करती थी।उसका हाथ पैर चलाना तरह तरह का मुँह बनाना, अँगड़ाईया लेना,सोते सोते मुस्कुराना उसे आनंदित कर देता था। भाई जब घुटने-घुटने चलने लगा तो वह साये की तरह उसके साथ रहती कहीं उसे चोट न लगे इसका पूरा ध्यान रखती यह देख माँ ने भाई के साथ रहने की इजाजत दे दी। उसके लिए यह पहली खुशी थी जो मिली थी भाई उसके लिए एक अनमोल खिलौने से कम नहीं था।

जैसे जैसे भाई बड़ा हो रहा था उसका रिश्ता भी उतना प्रगाढ़ होता गया। उसे यदि किसी से अपनापन मिला तो वो भाई है। शादी में सबसे ज्यादा खुश और विदाई में सबसे ज्यादा दुखी भी वही था। सोचते हुए आँखें भर आईं।

शुभम की तस्वीर पर नजर पड़ते ही "जानते हो शुभम तुम्हें दूल्हा के रूप में देखने में भी खिड़की ने ही मदद की। उस समय खिड़की से वह दूसरा संसार देख रही थी।"

घर से विदा होते हुए वह भावुक हो उठी थी। उसने  चारों ओर नजरें घुमाई माँ, काकी माँ,भाई  सभी के चेहरे उतरे हुए थे। भाई अपने आँसू छुपाने की असफल कोशिश कर रहा था।

पर पापा कहीं नहीं दिखाई दिये। मन ने कहा "अच्छा हुआ पापा की मनहूसियत तो विदा हो जाएगी।"

घर से विदा होते समय वह अपनी खिड़की को आखिरी बार पलट कर देखती है।

पर वह खिड़की सूनी नहीं थी। दो आँसुओं से भरी आँखें उसके साथ थीं। क्या वह सच था? लगता है वे आँखें अभी भी उसका पीछा कर रही थी।

रात के बारह बजे शुभम ने कमरे में प्रवेश किया। चारों ओर नजर घुमाई फिर जाकर खिड़की खोल दी। खिड़की खुलते ही ताजी हवा के झौंके से कमरे में ताजगी भर गई।

शुभम उसे पकड़कर खिड़की पर ले गया आसमान में चमकते चाँद को देखते हुए बोला "वो आसमान का चाँद है और तुम  मेरा। जिस तरह उस चाँद ने आसमान को रोशन किया उसी तरह तुमने मेरी जिन्दगी रोशन की है। मेरी पूरी कोशिश होगी तुम्हारी चमक और मुस्कुराहट कभी कम न हो" कहते हुए बाँहों में भर लिया। आज फिर खिड़की ने उसके जीवन में खुशियाँ भर दी थी। चँद्रमा का प्रकाश खिड़की के रास्ते शनैः शनैः उसके जीवन में प्रवेश कर रहा था।


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