Skip to main content

दायित्व

 राशि अपनी मेड माला के इंतज़ार में बैठी थी। घर का सारा काम पड़ा हुआ था।

जैसे ही माला आयी राशि ने गुस्से में कहा- माला क्या घड़ी देखनी नहीं आती तुम्हें। कल भी देर से आई तुम और आज भी।

माला बोली- बीबीजी त्योहार का वक्त है ना। हर घर में काम बढ़ा हुआ है। इसलिए देर हो जा रही है।

ये सब तुम्हारे बहाने है, समझती हूँ मैं- राशि ने चिढ़कर कहा।

माला बिना कोई जवाब दिए काम में लग गयी।

काम खत्म करने के बाद माला ने कहा- बीबीजी आप हमें एक दिन पहले हमारा वेतन दे सकती है?

राशि ने पूछा- क्यों? क्या करना है?

बिटिया को नए कपड़े दिलाने है। कह रही थी विद्यालय में उसकी सब सहेलियां त्योहार के कपड़े खरीद चुकी है- माला बोली।

राशि ने हैरानी से कहा- तेरी बेटी विद्यालय जाती है?

माला आँखों में चमक भरकर बोली- हाँ बीबीजी। बहुत होशियार है हमारी बिटिया। हमेशा अच्छे नम्बर लाती है। नाम रोशन करेगी हमारा।

कितने पैसे कमा लेती है तू जो बेटी के लिए इतने बड़े-बड़े सपने देख रही है- राशि ने वितृष्णा से कहा।

माला ने कहा- बीबीजी ज्यादा बड़ा नहीं लेकिन एक छोटा सा सपना देखा है कि हमारी बिटिया हमारी तरह अनपढ़ ना रहे और सम्मान के साथ जिये सर उठाकर।

राशि बोली- मेरी मान तो उसे भी अब अपने साथ काम में लगा। तेरी आमदनी भी बढ़ेगी और बोझ भी कम होगा।

बीबीजी हम भूखे सो सकते है लेकिन अपनी बिटिया को अपनी जैसी ज़िन्दगी नहीं दे सकते, ये कहते हुए माला चली गयी।

राशि का बेटा अनिकेत अपनी माँ और माला की सारी बातें सुन रहा था।

माला के जाते ही उसने तेज़ आवाज़ में गाने चला दिए।

गाने की आवाज़ सुनकर राशि अनिकेत के कमरे में पहुँची और बोली- पढ़ाई के वक्त गाने क्यों सुन रहे हो तुम? दो दिन बाद आईएएस की परीक्षा है और तुम्हें मस्ती सूझ रही है?

अनिकेत ने कहा- मम्मा जैसे एक मेड की बेटी को हक़ नहीं कि वो पढ़-लिखकर सम्मान के साथ जिये, बड़े सपने देखे, वैसे ही एक क्लर्क के बेटे को भी ये अधिकार नहीं कि वो अधिकारी बनने के सपने देखे।

राशि बोली- तुम्हारा दिमाग खराब हो गया है क्या? किसकी तुलना किससे कर रहे हो।

अनिकेत ने जवाब दिया- मैं एक माँ की तुलना दूसरी माँ से कर रहा हूँ मम्मा।

जिस तरह आप चाहती है मेरी ज़िंदगी मेरा ओहदा पापा से ऊँचा हो, वैसे ही माला चाची भी तो चाहती है उनकी बेटी की ज़िन्दगी उनसे अच्छी हो।

फिर वो गलत और आप सही क्यों?

अनिकेत की बात सुनकर राशि को अपनी गलती का अहसास हुआ।

उसने अनिकेत से कहा- बेटे तुमने मुझे मेरी गलती का अहसास दिलाया। मुझे गर्व है कि मैं तुम्हारी माँ हूँ।

कल माला के आते ही मैं उससे माफ़ी मांग लूँगी।

अनिकेत ने कहा- मम्मा अगर सचमुच आपको अपनी गलती का अहसास है तो आप माफ़ी माँगने के साथ-साथ माला चाची को सहयोग दीजिये उनकी बेटी के सपने पूरे करने में।

मैं ऐसा ही करूँगी बेटे, ये कहकर राशि चली गयी।

अगले दिन माला को आने में फिर देर हो गयी।

वो डरी हुई राशि के पास पहुँची और देर से आने की माफी मांगी।

राशि ने कहा- कोई बात नहीं माला। तुम जल्दी से काम कर लो मुझे तुमसे कुछ बात करनी है।

सारे काम खत्म करके जब माला राशि के पास पहुँची तो राशि ने उसे एक पैकेट देते हुए कहा- ये तुम्हारी बिटिया के लिए नए कपड़े है मेरी तरफ से और साथ में तुम्हारा पूरा वेतन भी।

माला हिचकिचाते हुए बोली- बीबीजी इसकी क्या जरूरत थी।

राशि ने कहा- जरूरत थी माला। इसी बहाने मैं अपना अपराध कम करना चाहती हूँ जो मैंने कल किया तुम्हारे सपनों का मज़ाक उड़ाकर।

मुझे क्षमा कर दो।

बिटिया की पढ़ाई में कमी मत करना। मैं तुम्हारी हरसंभव मदद करूँगी तुम्हारे इस सपने को पूरा करने में।

राशि की बात सुनकर माला की आँखों में आँसू आ गए।

उसने कहा- बीबीजी हमने कोई बहुत अच्छा काम किया होगा कि आप हमें मिली। हम हमेशा आपके आभारी रहेंगे।

तभी अनिकेत वहाँ आया और बोला- चाची आपको किसी का आभारी होने की जरूरत नहीं है।

हम सब एक-दूसरे पर एहसान नहीं कर रहे, बल्कि इंसान होने का अपना दायित्व निभा रहे हैं।

अनिकेत को ढ़ेर सारा आशीष देकर माला चली गयी।

और इधर अनिकेत राशि के गले लगते हुए कह रहा था- मम्मा मुझे गर्व है कि मैं आपका बेटा हूँ।


Comments

Popular posts from this blog

दामाज बेटा बन जाता है पर बहू पराये घर की रहती है

  "अरे भाईसाहब (ननदोई) इतनी सुबह सुबह ?" "मम्मी पापा ने बुलाया था.कुछ जरूरी काम है." प्रमोद ने रश्मि को रूखा सा उत्तर दिया. "आ गये बेटे. बहू खड़े खड़े क्या बातें कर रही हो जाओ चाय बना लाओ." "जी मम्मी जी" रश्मि चाय बनाते हुए सोच रही थी ऐसी क्या बात हो सकती है जो भाईसाहब को सुबह बुलाया.कल रात उसे सास ससुर के कमरे से खुसुरफुसुर की आवाजें आ रही थी.मन में उठी किसी अनहोनी की आशंका को झटक कर वह चाय ले कर ड्रॉइंग रूम में गई. "बहू नाश्ता जल्दी बना देना.हमें काम से जाना है." "मम्मी जी कहाँ जाना है ?" "आकर बताते है तुम नाश्ते की तैयारी करो." रश्मि ने सास ससुर और प्रमोद को नाश्ता दिया.कुछ देर में तीनो तैयार हो कर चले गये और रश्मि घर के काम निपटाने लगी. ये थी रश्मि. शर्मा परिवार की इकलौती बहू.रश्मि की शादी रूपेश से हुए एक साल हो गया था.रूपेश की एक बड़ी शादीशुदा बहन कंचन और एक छोटी बहन काजल  जो कॉलेज में पढ़ती है.रूपेश दूसरे शहर में नौकरी करता था.उसकी इच्छा थी कि रश्मि  मम्मी पापा की देखभाल के लिए उनके साथ रहे.रश्मि ने भी रूपेश की इच्...

घर के लक्ष्मी का सम्मान

  "रवि... सुनिए ना... मुझे आपसे कुछ ज़रूरी बात करनी थी। वो मेरे पैरों में बहुत सूजन आ रही है और कमर में भी..." सुमन ने रात के सन्नाटे में, करवट बदलते हुए अपने पति रवि से कहने की कोशिश की। उसकी आवाज़ में एक दबी हुई कराह थी। रवि ने झल्लाहट में अपनी आँखों से बांह हटाई और मोबाइल की स्क्रीन पर समय देखा। रात के साढ़े ग्यारह बज रहे थे। "सुमन, प्लीज यार! अभी ऑफिस की टेंशन कम नहीं है जो तुम घर की रामायण शुरू कर देती हो? सुबह से शाम तक घर पर रहती हो, आराम ही तो करती हो। माँ बता रही थीं कि आजकल तुम दोपहर में दो-तीन घंटे सोती हो। फिर भी थकान? और ये पैरों में सूजन वूजन सब वहम है, थोड़ा वॉक किया करो। अब सोने दो, कल मेरी बहुत बड़ी प्रेजेंटेशन है।" रवि ने कंबल मुंह तक खींच लिया और दूसरी तरफ करवट ले ली। सुमन की आँखों में आए आंसू अँधेरे में ही जज़्ब हो गए। वह क्या बताती कि जिसे उसकी सास 'दोपहर की नींद' कहती हैं, वह असल में छत पर पापड़ और अचार सुखाने की चिलचिलाती धूप वाली मेहनत होती है। रवि को सच सुनना ही नहीं था, क्योंकि उसके लिए माँ का कहा पत्थर की लकीर था। सुमन ने चुपचाप एक दर्द न...

हकीकत

  सुमन के हाथों से शादी की मेहंदी भी नहीं उतरी थी कि उसके साथ सुधा जी ने उसे पूरी तरह से काम में झोंक दिया। सुबह से शाम हो जाती, लेकिन सुधा जी के काम तो मानो पूरे ही नहीं होते थे। जैसे ही सुमन आराम करने के लिए अपने कमरे में जाती, वैसे ही सुधा जी कहतीं, "बहू, जरा मेरे सिर में तेल की मालिश कर दो" या "कपड़े प्रेस कर दो"। कोई न कोई बहाना बनाकर पहले से ही तैयार रखतीं। सुमन कुछ भी नहीं बोल पाती और झट से काम पर लग जाती—आखिर नई-नई बहू जो ठहरी! सुमन के पति रोहित दूसरे शहर में नौकरी करते थे। शादी के लिए भी कम ही छुट्टियाँ मिली थीं, इसलिए शादी के आठ दिन बाद ही अपने काम पर लौट गए। तभी एक दिन… "अरे बहू, कब तक सोती रहेगी? कितना समय हो गया है, आज तुम्हारे ससुर जी ऑफिस के लिए भी निकल गए और तूने चाय तक नहीं बनाई। आगे से ध्यान रखना, समझ गई? ठीक चार बजे उठ जाना, क्योंकि तेरे ससुर जी सुबह छह बजे ही निकल जाते हैं। बहुएं तो काम के लिए ही तो लाई जाती हैं, एक लौटी बहू हो, नहीं बताएंगे तो कैसे सीखोगी? बड़े-बूढ़ों की कदर करना सीखो," सुधा जी नसीहत देतीं। "मुझसे गलती हो गई मांजी...