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दीप जगमगाये

     एक बड़ी सुंदर कॉलोनी थी वसंत विहार। वहां लगभग 30-35 घर थे  । किसी का बेटा तो किसी के बेटा बहू दिन भर के लिए अपने अपने आफिस या काम पर चले जाते थे।घर के बुजुर्ग अकेले रह जाते। सब  बुजुर्ग साथ मिलकर शाम     को बाहर निकलते और एक दूसरे के साथ समय बिताते ।अपने सुख-दुख बाँटते।ऐसे ही दिन गुजर रहे थे ।

एक दिन उस कॉलोनी  में एक नया परिवार आया जिसमें बुजुर्ग दंपत्ति उत्तमजी और उमाजी अपने बेटे बहू आलोक-आभा और  पोते पोती युग-प्रज्ञा के साथ  थे ।कुछ दिनों में उत्तमजी और उमाजी भी सब के साथ घुलमिल गए । सप्ताह के छह दिन तो वो  सबके साथ मिलते जुलते, लेकिन  रविवार के दिन  नहीं आते थे ।उनके बिना सबको बहुत ही सूना सूना लगता था।

   एक रविवार की शाम सब साथी मिलकर उनके घर गए तो सबने देखा कि उनके घर का वातावरण बहुत ही पवित्र था। वे सपरिवार पीले वस्त्र धारण करके बैठे थे। गायत्री माता की प्रतिमा के सामने इक्कीस दीपक जल  रहे थे।सब एक स्वर में गायत्री मंत्र का पाठ कर रहे थे।उत्तमजी ने अपने साथियों को देखा और बैठने के लिए कहा। सभी बुजुर्ग महिलाएं एवं पुरुष बैठ गए। उन्हें भी अच्छा लगने लगा ।गायत्री मंत्र  पूर्ण होने पर उन्होंने महामृत्युंजय मंत्र का पाठ किया। उसके बाद मां गायत्री की आरती की ,भजन गाये और सब को प्रसाद दिया ।

     उमाजी ने सबको बताया कि हम हर रविवार को शाम को दीपयज्ञ करते हैं। सब की खुशहाली की प्रार्थना करते हैं ।इसलिए हम रविवार की शाम को  आप सबसे मिलने नहीं आ पाते हैं । धूप और दीप की सुंगंध से पूरा घर महक रहा था ।दीपों की ज्योति के प्रकाश से सब अभिभूत हो रहे थे।  सब ने इस के बारे में विस्तार से बताने को कहा।इतने में उनकी बहू आभा सबके लिए नींबू का शर्बत ले आयी ।

    उत्तमजी ने अपने सभी साथियों की मन की उत्सुकता को शांत करते हुए  दीपयज्ञ के बारे में बताया कि  शाम को एक दो या जितनी भी इच्छा हो उतने दीपक जलाकर  गायत्री मंत्र का बारह बार या चौबीस बार पाठ करते हुए स्वाहा कहकर पीले अक्षत छोड़ते जाते हैं , उसके बाद महामृत्युंजय मंत्र का तीन ,सात या बारह पाठ करते हैं। इसमें  ज्यादा समय नहीं लगता है केवल आधे घंटे में सब हो जाता है। लेकिन हम उसके बाद भी कुछ भजन गाते हैं और रविवार को हम सब घर में रहते हैं इसलिए हम संध्या काल को इस प्रकार से दीपयज्ञ करते हैं।अक्षत को बाहर चिड़ियों के लिए बिखेर देते है।

      उनकी बातें सुनकर सबके मन में अलग अलग विचार चल रहे थे। सब विदा लेकर अपने अपने घर गए।दूसरे दिन जब उत्तमजी और उमाजी आए तो कुछ लोगों ने कहा कि हम भी  अपने घर में दीपयज्ञ करना चाहते हैं।

     अब सभी  सुविधानुसार बारी बारी से  साथियों को आमंत्रित कर अपने अपने घर में महीने के एक एक दिन दीपयज्ञ करने लगे। सब मिलकर  भजन गाते ।उसके बाद आपस में सुख दुख की बातें करते। कभी किसी के यहां नाश्ता कर लेते, कभी चाय पी लेते।  ऐसा बंधन नहीं था कि कुछ खिलाना पिलाना ही है । वह अपनी अपनी इच्छा और सुविधा से करते थे ।

    अब उन सबका तनाव और अकेलापन दूर हो गया। रात को नींद भी अच्छी आने लगी ।धीरे-धीरे उनके घर के बच्चे भी इसमें शामिल होने लगे। इस प्रकार से पूरे कॉलोनी में एक-एक घर में पूरे महीने यह क्रम चलने लगा। 

    सभी आध्यात्मिक चर्चा करते ,कहानियां कहते।उनके बच्चों को भी आनंद आता ।

     लॉकडाउन के समय भी सब ऑनलाइन  एक दूसरे के घर के दीप यज्ञ में शामिल रहते थे। इस तरह से रोज एक दूसरे के बारे में हाल चाल भी पता चलता था। अगर कोई बीमार है तो उसके लिए सब मिलकर प्रार्थना करते थे। घी के दीप जलाते जिससे घर की वायु में ऑक्सीजन बढ़ती थी।

    सभी के परिवार के सदस्य  मिलकर चर्चा करते और आसपास के जरूरतमंद लोगों की सहायता करते। इस तरह  उत्तमजी के परिवार के आने से कॉलोनी का वातावरण बहुत ही अच्छा हो गया ।बच्चे भी अच्छे संस्कार सीखने लगे।

    कॉलोनी के घरों में  संध्या को दीप जगमगाते ।परिवारों के मध्य स्नेह और सद्भाव का उजाला बढ़ता गया।


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