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मदद

 "शोभा बिटिया!. कब आई ससुराल से?"

दो घर छोड़कर पड़ोस में रहने वाले कुंती काकी ने दरवाजे पर कदम रखते ही सामने रसोई में अपनी भाभी की मदद करती शोभा को देख टोक दिया।

"आइए बैठिए काकी!.शोभा कल ही अपने ससुराल से आई है।"

शोभा की मांँ कुंती काकी को देख खुश हुई और वहीं पड़ी खाट पर चादर बिछा उन्हें बैठने का आग्रह कर बैठी।

रसोई का काम छोड़ शोभा ने भी आकर कुंती काकी के पांव छुए..

"खुश रहो बिटिया!.बहुत दुबली लग रही हो,.लगता है ससुराल वाले तुम्हारा ख्याल नहीं रखते।"

काकी की बात को मुस्कुराकर नजरअंदाज करती शोभा फिर से अपनी भाभी की मदद करने रसोई में चली गई लेकिन शोभा की मांँ कुंती काकी को अपने दिल का दर्द सुनाने लगी..

"सही कह रही हो काकी!.कहने को तो भरा-पूरा ससुराल है,.लेकिन शोभा को घर के काम में मदद करने वाला वहां कोई नहीं है।"

"क्यों?.सास-जेठानी तो होगी ना!"

"सब हैं!.लेकिन हाथ बंटाने वाला कोई नहीं!.घर का सारा काम मेरी फूल सी बच्ची के माथे मढ़ा रहता है।"

इतना बताते शोभा की मांँ का गला भर आया।

सारी बात सुनने के बाद कुंती काकी को शोभा की मांँ से बहुत ज्यादा सहानुभूति हुई..

"यह तो बहुत गलत बात है!.तुम शोभा की सास को कुछ कहती क्यों नहीं?"

"कहना तो चाहती हूंँ काकी!.लेकिन"..

"लेकिन क्या?"

"शोभा मना कर देती है!.और मैं भी रिश्तेदारी की बात सोच ठहर जाती हूंँ।"

"शोभा क्यों मना करती हैं?.शोभा को दिन भर घर के कामों में अकेले खटना अच्छा लगता है क्या?"

कुंती काकी को आश्चर्य हुआ।

"अब मैं क्या बताऊं काकी?.आप ही कुछ समझाइए शोभा को।"

शोभा की मांँ की सहमति पाकर काकी ने रसोई की ओर झांका लेकिन सामने कुंती काकी के लिए चाय की प्याली लिए शोभा पहले से ही हाजिर थी।

कुंती काकी ने शोभा के हाथ से चाय की प्याली ले लिया..

"शोभा बिटिया!.ससुराल में तुझे दिन भर घर के काम में लगे रहना अच्छा लगता है क्या?.देख कैसी हो गई है तूं।"

कुंती काकी ने शोभा की बांह पकड़ अपने करीब बैठा लिया। लेकिन शोभा ने अपनी तरफ से कुंती काकी को समझाना जरूरी समझा..

"अपने घर का काम तो करना ही पड़ता है ना काकी!"

"लेकिन तेरी सास भी तो रहती है घर में!.उसे भी तो कुछ करना चाहिए ना?.और अगर वह खुद कुछ मदद नहीं कर सकती तो अपनी सास से एक नौकरानी रखने को कह दे."

"ऐसा थोड़ी होता है काकी!" शोभा हंस पड़ी।

"क्यों नहीं होता?. घर के लोग करना चाहे तो जरूर होता है।"

काकी अपनी बात पर अड़ गई लेकिन शोभा ने उनसे पूछ लिया..

"ऐसा कभी आपके घर में हुआ है काकी?.आप अपनी बहू के साथ अपने घर के कामों में हाथ बंटाती हैं?" शोभा का सवाल सुन मोहल्ले भर के बहूओं की शिकायत कर उनमें कमी निकालने वाली कुंती काकी तनिक सकपका गई लेकिन अगले ही पल उन्होंने शोभा के उस सवाल को टालना चाहा..

"अरे!.मेरी बहू को तो आदत है घर के सारे काम करने की।"

कुंती काकी की चालाकी देख शोभा अपनी मांँ की ओर देख मुस्कुराई..

"वैसे मेरे इस घर में मेरी भाभी को भी आदत है घर के सारे काम करने की क्योंकि मेरी मांँ भी कभी रसोई में जाकर अपनी  बहू की मदद नहीं करती!.है ना मांँ?"

इस बार शोभा ने सवालिया निगाहों से अपनी मांँ की ओर देखा और बेटी की बात सुनकर शोभा की मांँ मुस्कुराई..

"हांँ!.मेरी बहू भी बहुत कर्मठ है!.कभी रसोई या घर के किसी काम में मेरी मदद नहीं मांगती और सच कहूं तो बहू के आने के बाद मैं तो तिनका उठाकर भी कुछ नहीं करती।"

"देखा काकी!.अब आप ही बताइए जब मेरी खुद की मांँ अपनी बहू को अपने घर के कामों में कोई मदद नहीं करती फिर मैं उस घर की बहू होकर भला अपनी सास से घरेलू कामों में मैं कोई मदद कैसे मांग सकती हूंँ?"

शोभा की बात सुनकर कुंती काकी के साथ-साथ शोभा की मांँ भी निशब्द हो गई!. लेकिन शोभा ने मुस्कुराते हुए अपनी बात पूरी की..

"वो क्या है ना काकी कि,.जिस दिन से घर के लोग अपनी बहूओं की सुख-सुविधा की सोच उनकी मदद करने लगेंगे उसी दिन से उनकी बेटियों को भी ससुराल में मददगार मिलने लगेंगे।"

घरेलू कामों में कभी अपनी बहू की मदद न करने वाली कुंती काकी और शोभा की मांँ एक-दूसरे का मुंँह देखती रही कुछ कह ना सकी!...लेकिन सामने रसोई में मौजूद अक्सर ननंद से घरेलू कामों में मदद पाने वाली शोभा की भाभी आज ननंद से सहानुभूति पाकर मन ही मन गदगद हुई।


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