रात के बारह बजे थे. मैं ऑटो की तलाश में था . कईयों से पूछा मगर कोई जमनापार आने को तैयार नहीं था . रेलवे स्टेशन से बाहर में रोड पर आ गया था . हल्की-हल्की बारिश हो रही थी . कई ऑटो खड़े थे मगर सब मना कर रहे थे . तभी एक ऑटो आकर रुका मेरे सामने .
"अरे! भाई , जगतपुरी पत्थर मार्किट चलोगे ?" मैंने ऑटो रुकते ही पूछा .
"काहे नहीं चलेंगे , धंधा करने आए हैं हम , कोई मटरगश्ती करने नहीं ." मैं औरत का स्वर सुनकर चौंक गया था . मैंने बड़े गौर से देखा . बाल तो लड़कों की तरह ही कटे हुए थे .
"कितना लोगे ?" मैंने औरत को नजरअंदाज करते हुए कहा .
"जो मीटर दिखायेगा दे देना . फालतू का खाने की अपनी आदत नहीं और न फ़ालतू बात सुनने की . बैठो !" उसके बोलने में जैसे आदेश था . मैं अपना सूटकेस अंदर रख के बैठ गया . उसने ऑटो स्टार्ट किया और माता सुंदरी कालेज की तरफ मोड दिया .
"अरे! इधर इलाका ठीक नहीं है . दूसरी तरफ से ले लो ." मैंने एहतियात के तौर पर कहा .
"हा हा हा ...औरत हूँ इसलिए कह रहे हैं आप ? साहब ! इस् दुनिया के कितने ही मर्द धूल चाट चुके हैं . इस शब्बो पर हाथ डालना आसान नहीं है ." वह बोली .
"बहुत बहादुर हो तुम ? मर्द जात से डर नहीं लगता क्या ?" मैंने सवाल दागा .
"साहब ! मर्द को औरत ही जनती है . उस से क्या डरना . अल्लाह कसम दो तीन के भी बस में आने वाली नहीं हूँ . फिर भी अगर कोई बात हुई तो क्या ले जायेगा कोई . धरती है ...जो बोएगा सो काटेगा ." अब तक ऑटो आई टी ओ की सड़क पर आ गया था .
"पहली बार किसी औरत को रात में ऑटो चलाते देखा है . क्यों रिस्क लेती हो तुम ?" मैंने पूछा .
"काहे का रिस्क साहब . भूख का इश्क ....सब डर दूर कर देता है . वैसे भी जब औरत किसी की इज्जत लूटती है तो फिर कोई बच नहीं सकता . अपने को कोई साला मर्द मिला ही नहीं . हर रात ढूंढती हूँ … सब फट्टू ही मिलते हैं . एक रात का खसम नहीं चाहिए . जो भी मर्द मिला ...कोई भी जात धर्म का मैं शादी करेगी पर उसको मेरा ही नहीं मेरे घर का भी होना पडेगा ." वह पूरे आत्म विश्वास से बोले जा रही थी .
"शब्बो ....याने की मुसलमान हो, तो फिर किसी से भी शादी क्यों ? तुम्हारे लोग क्या मान जायेंगे ? बबाल नहीं होगा ?" मैंने पूछा .
"मजहब, मुल्ला और मौलवी क्या खाने को देने आते हैं . बाप ने माँ को तलाक दिया तब कोई आया क्या ? मैं अपने भाई बहिनों को खुद पालती हूँ ...उनका बाप हूँ मैं . मेरा घर है और मेरा कायदा चलेगा !" वह रेडलाईट को जंप करते हुए बोली .
"तब तो बहुत बोल्ड हो तुम ." मैंने उसकी तारीफ़ करते हुए कहा .
"बोल्ड ज़माना बना देता है साहब ! मर्द भी किसी कुत्ते के माफ़िक देखता है , जब तक डरो वो भौंकता है ...काटने को दौड़ता है . मुझे छेड़ के क्या अपना रेप करवाना है किसी को ...मैं साला खुद ही कपडे खोल दूँगी . बड़ों-बड़ों कि पुंगी बज जाती है ." उसने ऑटो आंबेडकर गेट के अंदर करते हुए कहा .
"अरे! तुम चाहो तो यहीं छोड़ दो , मैं चला जाऊँगा ." मैंने कहा .
"हा हा हा ...घर तक छोड़ दूँगी . मुझे मालूम है आप बिस्तर तक नहीं ले जाओगे . दाढ़ी में सफेदी और आपकी बात आपकी जहनी हालत बता रही है . आपसे कोई डर नहीं है ." वह गली में ऑटो घुसाते हुए बोली .
"बस इधर राईट लेकर तीसरी गली ." मेरे कहते ही उसने फिर ऑटो घुमा दिया . गली के बाहर मेरे कहने पर ऑटो रोक दिया .
"कितना हुआ ?" वह झुक कर मीटर देखने लगी . मैंने रौशनी में देखा . उसकी उम्र बाईस -पच्चीस साल ही होगी .
"नाईट चार्ज मिलाकर एक सौ पैंसठ हुआ ." वह बोली .
मैंने अपना सूटकेस बाहर निकाला और जमीन पर रख दिया . पर्स से दो सौ का नोट निकाला और उसके हवाले कर दिया . वह अपने जेब में नोट रख बकाया देने लगी तो मैंने कहा -
"रख लो ! वो लोग तो ढाई सौ और तीन सौ माँग रहे थे ."
"मेरा ईमान मुझे इजाजत नहीं देता साहब . औरत हूँ उगालदान नहीं हूँ ." और उसने मेरे हाथ पर पैंतीस रुपये रख दिये .
"बहुत शुक्रिया शब्बो जी . आपने मेरी मदद की ."
"हा हा हा ...मेरा काम है साहब ! आपसे बात करते रास्ते का पता ही नहीं चला . आप अच्छे इंसान हैं ." वह मुस्कुराते हुए बोली .
"आदमी का डर उसे अच्छा बना देता है . सच तो ये है कि मैं ही डर रहा था तुमसे ."
"हा हा हा ...." वह ऑटो से उतरी और मेरे गले लग गई .
"ये आँखें हैं साहब..... गोलियाँ नहीं हैं ....औरत हूँ ...आँखें चार नहीं करती पर चार आँखें रखती हूँ ...अल्लाह हाफ़िज़ ." मेरा हाथ अचानक से उसके सिर पर पहुँच गया था .
जहां बातचीत में खुलापन होता है, वहां
ReplyDeleteअपनेपन की भावना पैदा होने लगती है।
धर्म ,जाति,ऊंच -नीच कुछ भी काम का नहीं रहता।