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जीवन के रंग

 प्रिया बड़बड़ाते हुए सूटकेस में कपड़ें रख रही थी। मुकुल ने उसे बिना कुछ कहे ही टिकट पकड़ाई। क्योंकि वह जानता था इस समय कुछ भी कहना आ बैल मुझे मार ही होगा। टिफिन उठाया और चुपचाप दुकान के लिए निकल गया।

प्रिया के चचेरे भाई की बेटी की शादी थी। छुट्टियाँ होने से बच्चे भी उत्सुक थे शादी में जाने को। प्रिया भी बहुत खुश थी, शादी के बहाने सभी रिश्तेदारों से मुलाकात जो हो जाती है। पर साथ में मुकुल के न जाने से उसका मन उदास था।

वहाँ पहुँचकर भी वह चुप-चुप सी थी। जबकि दूसरी बहनें पिंजरे से मुक्त पंछी की तरह चहचहाते हुए उड़ान भर रही थी।

"ओफ्फो! प्रिया दीदी, आपका इस तरह मुँह लटकाना बिल्कुल अच्छा नहीं लग रहा। जीजा जी नहीं आए तो क्या हुआ?"

"मेरे मायके में शादी हैं न, उनके रिश्तेदारों में होती तो वहाँ जाते न।"ताना मारते हुए बोली।

"अरे प्रिया! तुम अकेली आई हो दामाद जी नहीं आए क्या ?"

गुस्से से "बुआ जी आपके दामाद जी को कमाने से फुरसत मिले तब न आए।"

"दीदी आपको जीजा जी के बारे में ऐसा नहीं बोलना चाहिए आखिर कमाते भी तो आप लोगों के लिए ही न।"

"तू तो जीजा जी की चमची जो ठहरी।"

"ऐसी बात नहीं दीदी मेरी जीजा जी से बात हुई थी। उन्हें भी अफसोस है शादी में न आ सकने का। अभी तो उनका सीजन चल रहा है यहाँ आना मतलब कम से कम चार दिन दुकान बंद रखना। इन चार दिन में कितने ग्राहक कम हो जाएंगे। सीजन की कमाई के कारण ही तो साल भर का खर्च चल पाता है।"

"और फिर बच्चों को, आपको कितने अच्छे कपड़ें भी दिलवाए है। उपहार भी तो कितना अच्छा भेजा है।"

"आजकल तू तो बड़ी बड़ी बातें करने लगी है प्रज्ञा।"

"अच्छा दीदी, बताओ चाय पिओगी या ठंडा।

"सिर भारी हो रहा है तू तो चाय ही ले आ।"

प्रज्ञा के चाय लेने जाने के बाद वह चारों ओर नजर दौड़ा रही थी। तभी उसने देखा एक सुन्दर सी लगभग तीस-पैंतीस साल की युवती एक व्हील चेयर को लिए चली आ रही थी। उस व्हील चेयर पर एक युवक बैठा था वह भी सुन्दर था। पर उसकी नजर तो उस युवती पर थी। मैरून रंग की साड़ी उस पर गोल्डन बार्डर उस पर खूब जंच रही थी। जेवर भी उसने ज्यादा नहीं पहने थे कान में झुमके और लम्बा सा मंगलसूत्र बस। पर सबसे बड़ा गहना तो उसकी मुस्कुराहट थी,जो उसकी सुन्दरता में चार चाँद लगा रही थी। वह उस व्हील चेयर वाले से हँस- हँस कर बातें कर रही थी। प्रिया सोच रही थी  कौन होगा वह उसका, हो सकता भाई हो या कोई रिश्तेदार। उसे उस व्यक्ति पर तरस आ रहा था। उमर भी ज्यादा नहीं, बेचारा चल फिर भी नहीं सकता। सोचती भी जा रही थी और नजरे उस युवती का पीछा भी कर रही थी। उसने व्हील चेयर को एक टेबिल के पास रोका और फिर एक प्लेट में खाना लेकर आई। और अपने हाथो से उसे खाना खिलाने लगी। ओह! लगता है हाथ भी काम नहीं करते। उसे दया आने लगी उस व्यक्ति पर। वह इतने प्रेम से उसे खाना खिला रही थी जैसे एक माँ अपने बच्चे को खिलाती है। इतना मातृत्व भाव जरूर कोई बहुत नजदीकी होगा। बार बार मुँह का पोछना मनुहार करके खिलाना। अब तो उसे उत्सुकता होने लगी इन दोनों के रिश्ते के बारे में जानने की। वैसे भी मानव मन तो खोजी होता ही है।

"दीदी लीजिए। गरमागरम चाय।"

"प्रज्ञा वो सामने व्हील चेयर वाले और साथ में उस युवती को जानती हो कौन हैं।"

"वो लोग लड़के वालों की तरफ से हैं। मैं तो नहीं, पर करुणा भाभी जानती है उन सभी को।"

"करुणा भाभी जरा इधर तो आना।" सामने की ओर इशारा कर "आप उन्हें जानती है कौन है वो लोग।"

अरे! दूल्हा की बहिन है वो।"

"और जो साथ में है व्हील चेयर वाला वो कौन है।"

"वह दूल्हा का जीजा,यानि उसका पति।"

"क्या ?" इतनी जोर से बोली मानो बिजली का झटका लगा हो।

"अरे! अरे ! धीरे बोल कहीं सुन लिया तो।"

"शादी के कुछ समय बाद ही एक एक्सीडेंट में.. बात पूरी ही न कर पाई कि करुणा भाभी कि उन्हें बुलावा आ गया "अभी आती हूँ।" कहकर वह तो चली गई पर एक प्रश्न छोड़ गई। उस प्रश्न का उत्तर पाने के लिए वह व्याकुल हो उठी। मन में कई शंका आशंकाएँ जन्म लेने लगी। खाना खिलाने के बाद वह युवती अपने पति को रिश्तेदारों के बीच में छोड़कर फिर उस टेबल के पास आई। टेबल पर पर्स रखकर अब अपने लिए खाना लाई।

उस युवती से बात करने का इससे अच्छा मौका कोई हो ही नहीं सकता सोचकर प्रिया भी अपनी खाने की प्लेट लेकर उसी टेबल पर जा बैठी। दोनों ने मुस्कुराकर एक दूसरे का अभिवादन किया। खाना लगभग आधा खतम हो गया और प्रिया बातचीत शुरु ही नहीं कर पा रही थी। ऐसे तो वह कुछ जान ही नहीं पाएगी कल शादी में व्यस्तता के चलते तो बात होना और भी मुश्किल है।आज ही पूछना होगा उधेड़बुन को विराम देते हुए बात शुरु कर ही दी।

"आप दूल्हे की बहिन है न।"

"जी "संक्षिप्त सा उत्तर दिया

"अभी जिन्हें आप खाना खिला रही थी वो आपके पति हैं।"

"जी हाँ।"कहते हुए मुस्कुरा दी

"क्या परेशानी हैं उन्हें?" हिचकिचाते हुए प्रिया ने पूछ ही लिया।"

"उनकी रीढ़ की हड्डी में प्राब्लम है।"

"क्या शुरू से या कोई....."

प्रिया के जानने की उत्सुकता को देखते हुए बोली

"शादी के छः महीने ही हुए थे। उस दिन मेरी प्रेग्नेंसी की पॉजिटिव रिपोर्ट आई थी। सब बहुत खुश थे खासकर मेरे पति तो बहुत ही ज्यादा। उसी दिन फैक्ट्री जाते समय  एक गाड़ी ने इनकी गाड़ी को पीछे से ठोकर मार दी। एक्सीडेंट तो भयानक था ही ये बच तो गये पर रीढ़ की हड्डी में ऐसी चोट लगी कि निचला भाग पूरी तरह बेकार हो गया। कोई और अंग होता तो शायद ट्रांसप्लांट भी हो जाता पर यहाँ तो कोई गुंजाइश ही नहीं थी।" 

"लेकिन खाना तो आप खिला रहीं थीं।"

"वह हाथ हिला तो सकते है पर कोई काम नहीं कर सकते।"

"आप बहुत हिम्मत वाली है।आप चाहती तो दूसरी शादी...."

"हिम्मत होती नहीं परिस्थितियों को देखकर आ जाती है

इन्होंने तो मुझसे कहा था मैं तुम्हें पति का कोई सुख नहीं दे सकता अभी पूरा जीवन पड़ा है एबार्शन करा लो और तलाक लेकर नया जीवन शुरू करो।"

"फिर "

"हादसा तो किसी के भी साथ हो सकता है यदि यही सब मेरे साथ हुआ होता तो क्या आप मुझे छोड़ देते ?और एबार्शन की तो कल्पना भी नहीं कर सकते यह हमारी प्यार की निशानी और इस घर का वारिस है। मेरे इस जवाब पर कुछ नहीं बोले।

मैं किसी भी कीमत पर इन्हें छोड़ने तैयार नहीं थी।आखिर हमने शादी में सात जन्मों तक जीने मरने की कसमें खाई है। इतनी जल्दी मैं हार नहीं मानने वाली थी। शरीर भले ही साथ नहीं दे रहा था पर दिल और दिमाग से तो पूरी तरह तंदुरुस्त हैं।"

वह बोलती जा रही थी प्रिया मंत्रमुग्ध सुनती जा रही थी।

"पापा जी के कंधों पर फैक्ट्री का पूरा भार आ गया था

बेटी भी थोड़ी बड़ी हो गई थी। और ये मानसिक रुप से अपने आप को परिस्थितियों के अनुकूल ढाल चुके थे। तो सोचा पापाजी की कुछ सहायता की जाए इन्हें फैक्ट्री जाने के  लिए तैयार किया मैं तो साथ जाती ही थी। यह बताते जाते मैं काम करती जाती धीरे-धीरे सारा काम समझ और सीख लिया। अब तो हम सब मिलकर काम करते हैं।"

"क्या ? आपके मन में कभी नहीं आता भगवान ने आपके साथ बुरा किया।"

"नहीं, क्योंकि मेरा मानना है कि यहाँ हर किसी का जन्म किसी न किसी विशेष कार्य के लिए हुआ है। ईश्वर ने मुझे इस लायक समझा इसलिए यह जिम्मेदारी दी।और फिर कहते है न पति पत्नी गृहस्थी रुपी गाड़ी के दो पहिए होते है यदि एक पहिया कमजोर हो तो दूसरे को मजबूत होना चाहिए और आपसी सामंजस्य होना भी बहुत जरुरी है कहते हुए उसका चेहरा आत्मविश्वास से चमक रहा था।"

"आप इतनी खुश रहती हैं कि कोई भी आपकी परेशानी नहीं समझ सकता।"

"मैं खुश रहती नहीं हूँ वास्तव में खुश हूँ।"

"ऐसे कैसे।"

"एक बात बताओ? औरत को खुश होने के लिए क्या चाहिए?" प्रिया को असमंजस में देख

"मैं बताती हूँ मेरे पति मुझे बहुत प्यार करते हैं प्यार ही नहीं मान सम्मान भी देते है।दूसरों के सामने मेरी तारीफों के पुल बांधते हैं। पति की आँखों में अपने लिए इज्ज़त, परवाह इससे ज्यादा एक औरत और क्या चाहती है।"

प्रिया के प्रश्न खत्म नहीं हुए थे पर उसकी प्लेट खाली हो चुकी थी वह उठकर चली गयी प्रिया की प्लेट तो आधी भरी हुई थी पर खाने की इच्छा खत्म हो गई थी।

प्लेट को एक ओर खिसकाकर उसने मुकुल को फोन लगाया। उसे मुकुल से ढेर सारी बातें करने का मन हो रहा था पर ग्राहक होने के कारण मुकुल ने कहा बाद में बात करते हैं आज उसे मुकुल की इस बात पर बिल्कुल भी गुस्सा नहीं आया।उसने मुकुल से "आई लव यू एन्ड मिस यू" कह फोन रख दिया। खुशी से पलकें भीग गईं थी। अब वह भी पंख खोल बहनों के साथ उन्मुक्त उड़ान भरने तैयार थी। होली के पहले ही जीवन खुशियों के रंगों से भर गया था


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