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एक रिश्ता ऐसा भी

 मेरे ससुर जी की उम्र सत्यासी वर्ष है और अभी भी वे जीवन ऊर्जा से भरे हुए हैं। हस्त रेखा विशेषज्ञ हैं। प्रतिदिन कई लोगों से संपर्क होता है। ना वे तन से कमजोर हुए हैं ना मन से ,और इन सब के पीछे उनकी सकारात्मक सोच, जीवन के प्रति दृष्टिकोण, जीवन ऊर्जा, यह सब बातें तो है ही ,लेकिन इसके अलावा एक  महत्वपूर्ण बात यह है कि जीवन के इस सांध्य प्रहर में कमल बाई उनका बखूबी साथ निभा रहे हैं ।उनकी सेहत, उनकी भावनाओं को समझने वाले ,आदरणीय कमल बाई  भी 86 वर्ष के हैं।

आज  से 40 वर्ष पूर्व मेरे सासु जी का निधन हो गया। मेरे सासूजी  ने अपने निधन के 8 माह पूर्व कमल बाई को बोला," मेरी तबीयत ठीक नहीं रहती, मेरे बच्चे छोटे हैं, मेरे घर पर थोड़ा काम कर लो" बाई उस वक्त एक स्कूल के बच्चों को लाना ले जाना करते थे। बाई ने बच्चों को देखकर हां भर दी, और 8 महीने सासू जी के सामने घर का काम किया ।जिस दिन मेरे सासूजी शांत हुए ,कमल बाई चारों बच्चों को रात भर गले से लगाकर बैठी रहे ।बच्चों में मन लग गया। घर का सभी काम करते। बच्चों की फरमाइश पूरी करते, और इसके साथ ही मेरे ससुर जी ,जिन्हें हम पापा कहते हैं, उनका भी ध्यान रखते। घर की देखभाल भी करते । समय गुजरता रहा। चारों बच्चों की शादी में उनका पूरा योगदान रहा। धीरे धीरे वह हमारे घर के सदस्य की तरह ही बन गए।

35 वर्ष पूर्व जब मैं शादी होकर आई, तब से मैंने उन्हें जाना। मैं शासकीय सेवा में थी। मेरे दोनों बच्चों की  देखभाल, परवरिश प्यार ,सभी कुछ उन्होंने दिया। पापा और बाई के पवित्र रिश्ते, समर्पण, सहयोग, अपनापन परिवार के प्रति उनका प्रेम ,सभी बच्चों से उनका वात्सल्य, यह सब देख कर अभी भी विश्वास नहीं होता कि भगवान दुनिया में इतने अच्छे लोग भी बनाता है। बाई पूरी तरह से प्यार अपनेपन ईमानदारी और समर्पण से भरी हुई है। आज पापा और बाई दोनों बुजुर्ग हैं ।पापा अपने स्वतंत्र आवास में रहते हैं ।हम उन्हें कहते भी हैं" चलो हमारे साथ "लेकिन वे मना करते हैं। बाई भी साथ में रहते हैं और जीवन के इस संध्याकाल में दोनों एक दूसरे का साथ इस तरह निभा रहे हैं कि मेरे पास शब्द नहीं है।

इतने वर्षों में एक दिन के लिए भी बाई यहां वहां नहीं जाते। पापा बाई का ख्याल रखते हैं, बाई पापा का ख्याल रखती है। पापा को कब कौन सी चीज लगेगी, बाई एक पल के लिए भी नहीं भूलती है। बीमार होने पर भी सेवा में कोई कमी नहीं आती।

बाई के भैया, भाभी, भतीजे भतीजी, बहनें  सभी हैं। सभी घर आकर मिलकर जाते हैं। बहुत ही स्नेह  रखते हैं ।

आज से 40 वर्ष पूर्व बाई हमारे यहां पर आए और अभी तक हमारे साथ हैं। हम सब भी उनका बहुत सम्मान करते हैं ।वह भी हम सबको बहुत प्यार करते हैं। मुझे आश्चर्य होता है कि आज से 40 वर्ष पूर्व "लिव इन रिलेशनशिप" की अवधारणा को मेरे ससुर जी ने स्वीकार किया। कोई कानूनी रिश्ता नहीं है, कोई और अवैधता नहीं है ,सिर्फ प्यार और समर्पण का रिश्ता है।  पापा के लिए यह रिश्ता संध्या का उजाला है ।

हम सबके हृदय में, सभी पारिवारिक जनों के दिल में, समाज में, हर जगह सभी इस रिश्ते का सम्मान करते हैं।

मैं सोचती हूं ,अगर ईमानदारी से किसी भी चीज का निर्वहन किया जाए तो निश्चित ही वह एक दिन बहुत ही बेहतर रूप में सभी के सामने आएगी।

हम सब बच्चों ने भी हमारे पापा की भावनाओं का सम्मान किया। सदैव बाई का आदर किया। मैं  अभी किसी भी विधुर को देखती हूं  तो मुझे हमेशा लगता है कि एक भावनात्मक जुड़ाव की आवश्यकता हर उम्र में महसूस होती है। विधुर व्यक्ति को

 जिन से भी  भावनात्मक संबल मिलता हो, उनके साथ जुड़कर रहना चाहिए ।इस काम में बच्चों ने भी अपने माता-पिता का साथ देना चाहिए। जिस तरह हमारे माता पिता हमारी हर भावनाओं का सम्मान करते हैं, हम को प्यार करते हैं, हमारी जिद को पूरा करते हैं, उसी प्रकार बच्चों ने भी अपने माता-पिता के उत्तरार्ध को समझ कर जो भी उचित हो ,उन्हें करने देना चाहिए। बहुत से बच्चे माता पिता के पुनर्विवाह पर रोक लगाते हैं, नाराज हो जाते हैं, लेकिन यह  अच्छी बात नहीं है। सभी को अपना जीवन सदैव सदैव  जीने का हक है। पापा के जीवन से हमने यही सीखा है। सभी के लिए मेरा यही संदेश है कि जीवन के  सांध्य प्रहर में अगर किसी को उजाला मिल रहा हो, तो इससे अच्छी बात नहीं हो सकती।

यह सब लिखते समय मेरे दिल में बहुत सारे प्रश्न हैं ? बाई के लिए मेरी आंखों में आंसू है। प्यार और समर्पण से भरे इस रिश्ते को मैं अपने दिल से नमन करती हूं ।


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