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कर्ज़

 "माँ! गाँव की बड़की माई शायद अब अलग खाना बनाने लगी हैं, बीमार भी रहने लगी हैं, सूरज है यहां अपने गांव का, वही बता रहा था"

बेटे ने ऑफिस से आते,एक खबर की तरह बड़े ही आराम से कहा था कल, पर मेरे दिल में एक हलचल सी मच गई, उनसे मिलने की

"अरुण! मुझे तू गाँव ले चल" ऑफिस के कारण, थोड़ी ना नुकुर के बाद बेटा साथ आने को तैयार हो गया। हम आज निकल गए हैं गाँव के लिए। गाड़ी आगे और मेरा मन तीस साल पीछे चल पड़ा

"नयकी दुल्हिन! ई साड़ी है तुम्हरे लिए, अउर ई पांच सौ रुपया रख लो, भर महीने तुम्हारे काम आएंगे"

"ई हम कैसे रख लें दीदी, भाई साहब भी केतना मेहनत से ई पैसा जोड़ते हैं"

"अरे, भगवान की दया से सब ठीक चल रहा है, अउर तुम फिक्र मत करो, भगवान तुम्हारा भी सब ठीक कर देंगे"

दीदी का आशीर्वाद ही है, जो हमारी स्थिति बहुत सुधर गई है आज। जब ब्याह कर आई थी मैं, तो उसी साल गाय के लिए चारा काटते वक़्त पति का हाथ कट गया था। कहने को दीदी चचेरी जेठानी थी। पर हर सम्भव मदद की हमारी। हमारी जमीन भी उनसे काफी कम थी। पहनने से लेकर ओढ़ने तक के कपड़े दीदी ही दे दिया करती थी। अरुण की पढ़ाई भी काफी हद तक दीदी के कारण ही हो पाया था। यही सब सोचते हुए घर आ गया था। उम्र से ज्यादा अपनो की अवहेलना चेहरे पर झलक रही थी। दालान के बगल में छोटे से कमरे में लेटी हुई थी। उनके बच्चे हमें देख, अनदेखा कर दालान के बाहर ही बैठे हुए थे

"दीदी, कुछ खाना खाया है आपने?

खांसते हुए उठ बैठी। हमें देख कर बहुत खुश हुई

"अरे, नयकी दुल्हिन, यहां कइसे..?

"आप ही से मिलने आये हैं दीदी, सुना कि अलग रहने लगी हैं?

"हम नहीं, बेटे बहु अलग रह रहे हैं हमसे..बीमार हो गए ना अब हम,और सबकुछ उनके नाम कर ही दिया, तो अब हमसे कोई स्वार्थ बचा नहीं उनका"

बुढ़ापे में उन्हें रोते हुए देख, मन कचोटता जा रहा था

"ई अरुण है ना? बेटा इतनी दूर से आ रहे हो, भूख लगी होगी, रोटी बनाये हैं, खाओगे?

"नहीं बड़की माई! हम ठीक है, तुम तैयार हो जाओ, हम तुम्हें लेने ही आये हैं"

बेटे ने मेरे मन की बात बिना मेरे तरफ देखे ही कह दी। मेरे साथ साथ दीदी की आँखें भी भीग आई

"हम भी तो यही चाहते हैं.. कि वहां रहें जहां.. कोई बोलने बतियाने वाला हो। पर तुम परेशान तो नहीं हो जाओगे अपनी बड़की माई से?

होठों पर फीकी हँसी लाकर दीदी ने अरुण को देख कर कहा

"नहीं बड़की माई.. आपने जो हमारे लिए किया है, अगर उसे छोड़ भी दे तो आप हमारे लिए मेरी माँ जितनी ही पूजनीय हैं"

दीदी ने अरुण के सर पर हाथ रख दिया, मेरी आँखें अभी भी भीगी हुई थी

हम चलने को हुए ही थे कि पीछे से उनके बड़े बेटे की आवाज सुनाई दी

"तुम तो कहती थी कि, जहां डोली में बैठ कर आई हूँ..मेरी अर्थी वहीं से उठेगी"

इस व्यंग को सुनकर, मेरे बदन में आग लग गई।मगर अरुण उन्हें गाड़ी में बिठाते हुए बोल पड़ा

"नहीं भैया!अर्थी तो वहीं से उठनी चाहिए,जहां उसे उठाने वाला कांधा हो!..चल माई"

बेटे ने मेरे दूध का कर्ज, ये कहकर आज उतार दिया था..!


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