मई की चिलचिलाती धूप में बारह तेरह साल का साहिल सड़क के किनारे अपने ठेले पर मिट्टी के घडे बेचने बैठा था.
पिछले पाँच छह दिनों से पिताजी की तबीयत खराब होने की वजह से वह ठेला नहीं लगा पाये थे. इसलिए सुबह सबेरे ही माँ ने उसे घडे बेचने के लिए मनाया.
साहिल, आज तुम बैठोगे क्या ठेले पर? माँ ने थाली में कल के बचे चावल पर नमक और मिर्च पावडर डाल कर उसे देते हुए बोला.
माँ, आज भी दाल या सब्जी नहीं क्या?
बेटा,बाबुजी ठीक हो जाएंगे ना तब वो ले आएंगे बेटा या आज अगर मुझे किसी मॅडम ने कुछ दिया खाने को तो तेरे लिए लेती आऊंगी, कहते हुए माँ की आँखे भर आई. वो बाहर ठेले के पास आकर आँखे पोंछने लगी.
माँ, चल निकलते है.जल्दी जाऊंगा तो दो घडे ज्यादा बेच पाऊंगा.
माँ करूणामयी आँखो से उसे देख मुस्कुराई.
दोनों ठेले को ढकेलते ढकेलते बाजार के अपने नियत स्थान पर लेकर आए.
बेटा, ये यहाँ नीचे पानी की बोतल रखी है प्यास लगी तो पी लेना.
हाँ माँ.
और बेटा,आज कम से कम तीन घडे बेचने का प्रयास करना..घर में शाम के खाने के लिए ना अनाज है और ना ही आटा...रूंधे गले से साहिल के सर पर हाथ फेरकर अपने कलेजे के टुकडे को धुप में खडा कर माँ बर्तन, कपडे का काम करने बँगलों की ओर चल पडी.
भरी गर्मी में नन्हीं सी जान आने जानेवालों को घडा खरीदने के लिये गुहार लगाने लगी.
वो हमेशा अपने बाबुजी के साथ ही आया करता था.बाबुजी को घडे बेचते देखता था.
उनके साथ वो भी आवाज लगाता था...
बाबुजी, घडा लिजिये, हमारा घडा पानी जल्दी ठंडा करता है.
मगर आज वो अकेले ही भरी गर्मी में आने जानेवालों को घडा खरीदने के लिये गुहार लगाने लगा.
काका, लिजीये ना घडा... मॅडम लिजीये ना घडा...
मई की तेज धूप के कारण बाजार में भीड़ भी नाम मात्र थी.
गुहार लगाते लगाते उसका गला सुखता तो वह नीचे रखी बोतल से पानी पी लेता. बोतल का पानी भी लगभग खत्म होने पर था.
शाम के चार बजने को आ रहे थे मगर अभी तक एक भी घडा बिका नहीं था.
साहिल का चेहरा, सारा बदन पसीने से तरबतर हो गया था. आज घर का चुल्हा कैसे जलेगा ये सोच के उसका नन्हा दिल धडकने लगा.
पिछले कुछ दिनों से पिताजी की तबियत ठीक ना होने से वो घडे बेचने नहीं जा पाये. माँ को भी पगार मिलने में वक्त था. जो थोडा बहुत उधार लिया था वो बाबुजी की दवाई पर खर्च हुआ. आज अगर घडा नहीं बिका तो शाम को खाना कैसा बनेगा... बाबुजी को खाना नहीं मिला तो उनकी तबियत और बिगड जायेगी... नन्हें कंधो पर आई घर की जिम्मेदारीयों ने उसे समय से समय से पहले ही बडा बना दिया था.
शाम ढलते ढलते बाजार में चहल पहल बढने लगी थी. साहिल के दिल में आशा जगने लगी. वो दुगुने उत्साह के साथ आने जानेवालों से गुहार लगाने लगा.
ऐ लडके कितने का दिया ये घडा? सुनते ही साहिल की आँखे चमक उठी.
चाचा,ये देड सौ का और ये एक सौ साठ का..
क्या लूट मचा रखी है.. देख 50 में देता है तो दे दे दो ले लूंगा...
50 में... चाचा इतना कम में तो नही दे सकता.
तो फिर रख अपने पास... कहकर आदमी चला गया.
दिनभर के इंतजार के बाद एक ग्राहक आया था मगर...साहिल रूआंसा हो उठा. इतने में उसे दूर से माँ आती दिखाई दी.
आज के खाने का इंतजाम करने के लिए कम से कम तीन घडे बेचने के लिए माँ बोली थी...और एक भी घडा बेच नहीं पाया. उसका गला सुख गया.. होंठ थरथराने लगे.
क्या हुआ...साहिल.. साहिल...माँ ने उसे हाथ लगाया. बदन बुखार से तप रहा था.
माँ, एक भी घडा नहीं बिका... माँ उसे कलेजे से लिपटाकर रोने लगी. आजूबाजू धीरे धीरे भीड इकठ्ठा होती गई. एक हाथ ने एक सिक्का उसकी तरफ उछाला... भीड से कई हाथों से सिक्के उछले...
बेबस माँ ने पैसे इकठ्ठे किये कुल एक सौ साठ रूपये रूपये थे.
दिन भर की कडी धूप में झुलसे बचपन को आखिर उसका इनाम मिल गया.
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