नीलम,एक उमदा स्वभाव की धनी लडकी. माँ बाबा की एकलौती संतान होने से जरा ज्यादा ही लाडली. उसकी कोई भी बात बिना किसी शर्त या रोकटोक के मंजूर होना आम बात थी. माँ बाबा ने कभीभी उसपर कोई बंधन नहीं लगाये. बचपन से लेकर युवावस्था तक वह अपने सपने अपने अंदाज में जीती रही.माँ बाबा ने दी इस आजादी का नीलम ने भी कभी गलत उपयोग नहीं किया.
काॅमर्स से पोस्ट् ग्रॅज्यूएशन करने के बाद एक कंपनी में अच्छे ओहदे पर उसकी नौकरी लगी. सब कुछ मन मुताबिक होने पर माँ बाबा ने उसकी शादी करने कि सोची. रिश्ते तो बहुत आये. उनमें से उन्मेष का रिश्ता सबको पसंद आया. उन्मेष की दो बहने थी. एक की शादी हो चुकी थी तो दुसरी उससे छोटी थी. घर में माॅं बाबा और दादी थी. सबकुछ ठीकठाक देखकर शादी हो गयी और नीलम ससुराल आ गयी.
ससुराल में निलम इस तरहा घुलमिल गयी जैसे दुध में शक्कर. दस दिनों में ही उसने सबकी पसंद नापसंद जान ली. सबके मना करने के बावजूद वह किचन में हाथ बॅंटाने लगी. सासू माॅं और दादी को तो वो अपनी परछाई लगने लगी. ननंद उन्नती तो उसके आगे पीछे घूमती रहती और उससे कई ब्युटी टिप्स लेती रहती. कुलमिलाकर निलम ने अपने स्वभाव से सबका दिलं जीत लिया.
शादी के दस दिन बाद दोनों उटी घुमने गये. उटी में दोनो में अच्छी बाॅंडींग बनी. एक दूसरे का स्वभाव, पसंद नापसंद, अनेक बाते जानकर दोनो और एकदूसरे के करीब आये. आठ दिन पंख लगाकर उड गये.
उन्मेष, कल वापस जाना होगा... उन्मेष की बालों में उंगलिया फेरते निलम बोली.
हाॅं यार... और थोडे दिन रूकना था
छुट्टियाॅं खत्म होने को आई...फिर आए़गे..
हरसाल घुमने जाया करेंगे..
हाॅं जी जरुर जाएंगे.. पर पहले यहाॅ़ से कुछ खरीददारी करते हैं ना...
ठीक है... कुछ यादें बटोंर के चलते है.
दोनों बाजार के लिये निकलते है. निलम ने ससुराल में सबके लिये खरीदारी की. सासूमाॅं और दादी के लिये साडी, आनंद उन्नती के लिये कुर्ती, ससुरजी के लिये नेहरू जॅकेट और घर में सजाने के लिये वंदनवार.
अरे यार चलो... हो गयी शाॅपिंग... उन्मेष बोला.
एक शाॅपिंग हुई एक बाकी है...
अब क्या बाकी है...हाॅटेल जाकर पॅकिंग भी करनी है.
उन्मेष, मुझे मेरे घरवालों के लिये भी खरीदारी करनी है?
अब उनके लिये क्युं...? सारा तो है उनके पास...उकताकर वो बोला.
सारा तो तूम्हारे घर भी है फिर भी दिया ना सभी के लिये कुछ ना कुछ...
शादी हो गयी यार अब ये मायका... मायका...करना छोड दो...कहकर वो बाहर निकल गया. निलम को उसकी दकियानुसी सोच पर गुस्सा आया पर यह सही समय न था बोलने के लिये इसलिये वह चूप रही. निलम ने दुकानदार से कुछ कहा और बाहर निकल आयी.
बाहर उन्मेष एक पेड के नीचे फोन पे बात कर रहा धा.
चलो, उसने उसे आवाज दी.
उन्मेष उसकी तरफ देखे बिना चलने लगा. हाॅटेल पहुंचकर दोनों अंदर आये .
निलू,बॅग कहाॅं है?
कौनसी?
जो अभी सामान खरीदा था वो?
तुम्हींने तो कहा था... शादी हो गयी अब मायका मायका करना छोड दो...इसलिये कुछ नहीं खरीदा....
क्या मजाक है यार अब मैं घरवालों को क्या बताऊंगा..
इसमें बताना क्या... शादी होने के बाद जब लडकी अपने घर के लिये कुछ नहीं ले सकती तो लडके पर भी ये बात लागु होनी चाहिए ना...चलो छोडो... पॅकिंग करते हैं...
उन्मेष थोडी देर चुपचाप बैठा रहा. फिर उठकर उसके करीब आया और उसका हाथ हाथों में लेकर बोला,
साॅरी, निलम जिस तरहा से मेरा परिवार तुम्हारा है उसी तरहा तुम्हारा परिवार भी मेरा हुआ... तुम मेरे परिवार का ध्यान रखती हो तो मुझे भी तुम्हारे परिवार का ध्यान रखना होगा...साॅरी यार पहली बार शादी की है ना....
और कितनी शादियाॅं करनी है...निलम खिलखिला उठी.
मेरे कहने का मतलब है धीरे धीरे सीख जाऊंगा यार... चलो लेकर आते है सामान. निलम खुशी से उससे लिफ्ट गई.
मेरा तुम्हारा जब हमारा बन जाता है तो जिंदगी सही मायने में गूलजार होने लगती है.
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