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संयम

 अन्वी आज कुछ ज्यादा ही उत्साहित थी। कारण भी था—शादी के बाद पहली बार उसकी बड़ी बहन साक्षी अपने पति विवेक और ससुराल वालों के साथ मायके आने वाली थी। अन्वी अपने कमरे से आंगन तक पंद्रहवीं बार दौड़कर दरवाज़ा देख आई थी।

“अरे अन्वी! वो भाग कर कहीं नहीं जा रहे, घर ही आ रहे हैं,” माँ शोभा ने मुस्कुराते हुए कहा।
“इतना भागदौड़ छोड़ो और मेरी मदद करो जरा।”

अन्वी ने तुरंत कहा, “माँ… मैं सोच रही थी इस बार जीजू से ढेर सारी बातें करूँगी। पिछले को तो दीदी ने बताया था कि वो बहुत शांत रहते हैं, पर मैं बोल-बोलकर उन्हें हंसा दूँगी।”

शोभा ने उसे आँखें दिखाईं।
“मैंने सुना है कि विवेक ज़्यादा बोलते नहीं। तुम ज़रा संयम से रहना, ज्यादा नखरे मत करना कहीं। पहली बार आ रहे हैं, छवि खराब मत करना।”

अन्वी होंठ फुलाकर बोली, “माँ, जीजा-साली में मज़ाक नहीं होगा तो किसमें होगा? और फिर चुप रहने वाले लोग तो मुझे बोरिंग लगते हैं!”

“बस, एक यही बात है जिसमें तू मेरी नहीं मानने वाली…” शोभा बड़बड़ाती हुई किचन में चली गई।

शाम को गाड़ी आंगन में आकर रुकी।
घर में हल्की सी हलचल फैल गई।
साक्षी, विवेक और उनकी माँ अनुराधा उतरे।

प्यारी-प्यारी सुखद औपचारिकताओं के बीच अन्वी बार-बार विवेक के पास जाकर बातचीत शुरू करने की कोशिश करती—
“जीजू, आपने ट्रैवल में क्या-क्या देखा?”
“जीजू, दीदी तो कहती है आप खाना अच्छा बनाते हैं।”
“जीजू, ऑफिस में लोग बहुत परेशान करते हैं क्या?”

विवेक बस शालीनता से— “हाँ”, “हाँ ठीक”, “अच्छा”— जैसे छोटे जवाब देकर मुस्कुरा देते, और फिर चुप हो जाते।

अन्वी मन ही मन झुंझला उठी—
“ये तो सच में बहुत बोरिंग इंसान हैं!”

जब उसे कोई बात करने वाला नहीं मिला तो वह विवेक की माँ अनुराधा के पास जा बैठी।

“आंटी जी, क्या जीजू हर जगह इतने कम बोलते हैं? यहाँ तो जैसे मुँह सिल गया हो। मेरी सहेली के जीजा जी बहुत मज़ाक करते हैं। घूमने ले जाते हैं। इतना इंजॉय कराते हैं कि वह कहती है कि जीजू ही उसकी बेस्ट फ्रेंड हैं। पर मेरे जीजू तो… बस चुप ही चुप!”

अनुराधा हँस दीं,
“अरे बेटा, भाषण तो तुमने ऐसे दे दिया जैसे कोर्ट में गवाही दे रही हो।”

अन्वी ने होंठ सिकोड़ते हुए कहा, “मैंने तो आज तक इतने शांत इंसान नहीं देखे। लग रहा है जैसे उन्होंने हंसी-मज़ाक की कसम नहीं खाई।”

अनुराधा ने प्यार से अन्वी का सिर सहलाया।
“बेटे, बिना जाने किसी के बारे में राय बनाना आसान होता है। विवेक कम बोलते हैं, ये सही है… पर दिल के बहुत साफ हैं। दूसरों की खुशी के लिए वह जो कर सकते हैं, करते हैं। और एक दिन तुम खुद समझ जाओगी कि उनके जैसे लोग कितने अनमोल होते हैं।”

अन्वी बस बिना समझे “हाँ-हाँ” कर के रह गई।


समय बीत गया।
चार साल गुजर गए।
अब उसी घर में खूब तैयारियाँ चल रही थीं—क्योंकि अन्वी की शादी की रस्में शुरू होने वाली थीं।

हर कोई भागदौड़ में लगा था—पंडाल वाले, हलवाई, सजावट, मेहमान, रिश्तेदारी—सभी को सँभालना था।
और इन सबके बीच एक चेहरा सबसे ज़्यादा व्यस्त था—विवेक का।

आज सुबह ही अन्वी साड़ी खरीदने से लौटी थी।
दरवाज़ा खुलते ही उसने देखा—

विवेक पंडाल में खड़े टेंट वाले को निर्देश दे रहे थे—
“ये लाइटें सामने लगाना, जोड़े के पीछे फूलों का काम जरा सफाई से हो… मेहमानों को धूप न लगे, पानी का इंतज़ाम आगे कर दो।”

हलवाई से बोले—
“भाई, मिठाइयाँ समय पर बन जायें… खीर थोड़ी गाढ़ी रखना, पापा को गाढ़ी पसंद है।”

अन्वी वहीं खड़ी रह गई, जैसे पैरों में जड़ें जम गई हों।

उसकी आँखें भर आईं।

विवेक बिल्कुल वैसे लग रहे थे—
जैसे घर का दामाद नहीं,
सगा बेटा—एक जिम्मेदार भाई।

शोभा और हरि (अन्वी के पिताजी) को वह किसी भी बात की चिंता नहीं करने दे रहे थे।
हर समस्या का समाधान उनके पास था, हर काम उनके बिना अधूरा।

रात को अन्वी अपने कमरे में बैठी थी, और उसकी आंखें अपने-आप भीग गईं।

“मैंने कितना गलत समझा था उन्हें… मैं कितनी छोटी सोच वाली थी।”

तभी साक्षी कमरे में आई।

“अरे! अभी से रो रही है? विदाई तो कल है।”
हँसते हुए उसने अन्वी के आँसू पोंछे।

अन्वी ने धीमे से कहा—
“दीदी… मुझे आज समझ आया कि जीजू जैसे लोग ही सच्चे रक्षक होते हैं। उन्होंने कभी दिखावा नहीं किया, कभी ज़बरदस्ती अच्छा बनने की कोशिश नहीं की… बस चुपचाप हमारा घर अपना बना लिया।”

साक्षी मुस्कुराई,
“हाँ, वो बोलते कम हैं… लेकिन निभाते बहुत हैं। याद है ना, माँ हमेशा कहती थीं—बोलने वाला नहीं, साथ देने वाला इंसान बड़ा होता है।”

अन्वी बोली—
“मैंने उन्हें बोरिंग समझा, लेकिन असल में वे बेहद संवेदनशील और बड़े दिल वाले इंसान हैं।
आज मुझे समझ आया कि रिश्ते शोर से नहीं,
नीरव समर्पण से बनते हैं।”

साक्षी ने बहन को गले लगा लिया।

अन्वी की आवाज़ काँपी—
“अब समझ में आया दीदी…
इंसान की कीमत उसकी बातों से नहीं,
उसके कामों से पहचानी जाती है।”

वह फिर बोली—
“दीदी… मैं कितनी खुशनसीब हूँ कि मेरे पास ऐसे जीजू हैं जो दामाद नहीं, हमारे घर के बड़े बेटे की तरह हैं। आज समझ आया कि चुप रहने वाले लोग कमज़ोर नहीं होते…
वे अपने दिल की आवाज़ कर्मों से देते हैं।”

साक्षी ने उसके सिर पर हाथ रखा।
“सब समझदारी वक्त के साथ ही आती है… पर तू सीख गई, यही बड़ी बात है।”

नीचे से विवेक की आवाज आई—
“अन्वी! कल की लिस्ट मेरे पास भेज देना… जो भी कमी है, मैं अभी देख दूँगा।”

अन्वी मुस्कुराई।
उस मुस्कान में आदर था, प्यार था और एक गहरी कृतज्ञता।

वह धीरे से बोली—
“जीजू… आप सिर्फ दीदी के नहीं, हम सबके कितने अपने हैं… ये अब समझ आया।”

और दिल में एक सच्ची सीख दर्ज हो गई—

“लोगों का दिल बोलता है,
शब्द नहीं।”


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