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आखिर मुझे क्यों छला माँ

 शर्माते सकुचाते अनु ने अपने नए घर यानि ससुराल में अपना पहला कदम रखा । घूंघट की ओट में उसकी नजर किसी को ढूंढ रही थी, तभी सासू जी आरती की थाली लेकर आ गई और उसे कुछ राहत महसूस हुई । राहत इसलिए क्योंकि अपने ससुराल में अपने पति के अलावा अगर वह किसी को थोड़ा बहुत समझ पाई थी तो वह थी सासू जी । बात पक्की होने से लेकर शादी होने तक हर तरह की शॉपिंग जो अनु के लिए की गई उसमें सासू जी अनु को साथ ही ले जाती ताकि हर चीज अनु की पसंद से हो । इसी बहाने उसे सासू जी के साथ काफी समय बिताने को मिला और वह उनसे जल्दी ही घुल मिल गई । थोड़ा बहुत उनका स्वभाव समझ आने लगा । उसे तसल्ली थी कि अगर सासू जी सच में ऐसी ही है तब तो उसकी ट्यूनिंग बैठ ही जाएगी सासू जी के साथ ।

अनु के ससुराल में उसके सास-ससुर और पति के अलावा दो देवर थे पर कोई ननद नहीं थी और इस बात का दुख सासू जी को बहुत था कि उनके कोई बेटी नहीं है । वह अपनी बातों से कई बार जता चुकी थी कि वह तो बहू में बेटी को ढूंढ रही हैं, वह अनु को घर के हर मेंम्बर का नेचर बताती, किसको क्या पसंद है, क्या नहीं? एक साथ काम का कोई ज्यादा बोझ भी नहीं डाला, अनु बहुत खुश थी और वह मन में सोचती कि  धीरे-धीरे मैं  पूरे घर की जिम्मेदारी ले लूंगी | "अनु तैयार हो जाओ, यह साड़ी मैंनें निकाल दी है, गहने और चूड़ी भी, अभी सात बजे तक निकलना है । अनु को थोड़ा अजीब लगा । आज पहली बार वह अपने समाज की शादी में शरीक होने जा रही थी । वह अपनी पसंद की साड़ी पहनना चाहती थी पर चुपचाप पहन ली कुछ बोल नहीं पाई । जब वह तैयार होकर आई तो सासू जी ने उसे गौर से देखा फिर दोबारा कमरे में ले आई । "यह क्या बहू, इतनी छोटी सी बिंदी? और सिंदूर किस तरह लगाया है, बालों में छुपा जा रहा है, ढंग से लगाओ सिंदूर पूरा पीछे तक"

ठीक है मम्मी जी, अपने आप को काँच में निहारते हुए बोली अनु । पूरे रास्ते सासू जी अनु को हिदायतें देती रही। वह जो दूर के रिश्ते की ताई सास है न वो हर बात का उल्टा मतलब निकालती हैं। उनके पैर छू कर दूर हो जाना और हाँ थोड़ा घूंघट भी करना। वह थोड़ी पुराने ख्याल की है। बिना घूँघट के नई बहू को देखेंगी तो चार बात सुना देंगी और मेरी बहू को कोई कुछ कहे मुझे अच्छा नहीं लगेगा।

अनु को ज्यादा कुछ समझ तो नहीं आया, नई नई थी तो संकोच की वजह से कुछ पूछ नहीं पाई। बस हां में सर हिला दिया। शादी में वह चुप ही रही कोई कुछ पूछता तो सासू जी जवाब दे देतीं और कहतीं बहू थोड़ा शर्मा रही है । वह ढंग से खाना भी नहीं खा पाई। तभी ताई सास की बहू भी आ गई और अनु को घूंघट में देख कर बोली अरे मामी जी आप अपनी बहू से घूंघट करवाती हैं? तो सासू जी सकपका गई और बोली मैं नहीं करवाती घूंघट यह तो खुद ही रखती हैं अपने मन से। घर आते आते उसका मूड खराब हो गया। उसके पति अरूण ने पूछा भी कि क्या हुआ पर अनु ने अपने पति को कुछ नहीं बताया।

अब यह रोज की ही बात होने लगी। अनु की सास अनु की हर बात में हस्तक्षेप करती। बिंदी बड़ी लगाओ, बीच की मांग निकालो। नीले और हरे रंग की साड़ी मत पहनो, नहा कर निकलो तो साड़ी बाथरूम में पहन कर आओ, पर्स बड़ा रखो। सर से पल्लू नहीं सरकना चाहिए। वह चुपचाप उनकी बात मान जाती। ऐसा नहीं था कि उसे बोलना नहीं आता था पर वह कुछ नहीं कहती सोचती इन सबसे अगर सासू जी खुश रहते हैं तो ऐसे ही रह लूंगी। इसी तरह से एक बरस बीत गया।

फिर अनु की जिंदगी में खुशी ने दस्तक दी जब उसे पता चला कि वह मां बनने वाली है। डॉक्टर ने अनु को एहतियात बरतने को कहा। भारी वजन उठाने को मना किया और सीढ़ियाँ चढ़ने उतरने को भी मना किया। यह सब बात अरुण ने अपनी मम्मी को बताई और समझाया कि अनु से कोई भारी सामान मत उठवाना और न ही सीढ़ी चढने उतरने वाला काम बताना। लेकिन बेटे के सामने तो सासू माँ अनु से कोई काम नहीं करवाती पर जब वह घर पर नहीं होता उससे सभी काम करवाती। काम तक तो ठीक था पर उसे कपड़े हाथ से धोने को कहती और वॉशिंग मशीन में कपड़े धोने नहीं देती और सबसे नीचे की फ्लोर पर कपड़े धुलवाती और तीसरी मंजिल की छत पर कपड़े सुखाने को कहती। अनु  धुले हुए कपड़ों से भरा टब लेकर तीसरी मंजिल पर जाती और कपड़े सुखाती। उसे बहुत गुस्सा आता पर उसने शुरू से ही गलत बात का विरोध नहीं किया तो अब भी कुछ बोल नहीं पाती। वह दिन व दिन कमजोर पड़ने लगी। डॉक्टर ने अनु को हरी पालक की सब्जी और सेब रोज खाने की सलाह दी। सासू जी जब भी सब्जी लेने जाती वह उनको याद दिलाती कि हरी पालक और सेब ले आइएगा पर सासू जी बहाना बना देती। कमजोरी के कारण एक दिन अनु बेहोश हो गई। डॉक्टर ने अरुण को बहुत डांट लगाई और कहा ध्यान नहीं रखा तो अनु की जान पर बन सकती है। अरूण कुछ दिन तो छुट्टी लेकर रहा पर आखिर कब तक ऐसा चलता। फिर सासू जी ने सलाह दी कि अनु को पीहर भेज दो डिलीवरी वहीँ करवा लो। वहां अपनी मां के साथ रहेगी तो अपने आप ठीक हो जाएगी। अरूण को बात जंच गई और चौथे महीने में ही वह अपने पीहर आ गई।

धीरे धीरे अनु को समझ आने लगा कि उसके साथ छल हो रहा था । मीठा मीठा बोलकर उसे उसकी औकात समझाई जा रही थी । बेटी बेटी बोलकर उसका मुंह बंद कर दिया गया है और मैं पगली उन्हें माँ का दर्जा दे बैठी। क्या माँ ऐसी होती हैं? ऐसा क्यूँ किया माँ? मुझे क्यूँ छला? पर अब और नहीं सासू माँ। अब आप मेरी सास हो और मैं बहू । मेरे संस्कार ही थे जो मुझे रोके हुए थे और मेरे संस्कार ही है जो मुझे गलत न सहने की सीख दे रहे हैं। अब जब मैं अपने बच्चे के साथ घर आउंगी तो आपकी मीठी बोली से ही जवाब दूंगी और अपने पति से कुछ नहीं छुपाउंगी पर अपने आप से एक वादा जरूर करूंगी कि अगर मेरा बेटा हुआ तो जब मैं सास बनूंगी तब अपनी बहू को नहीं छलूंगी। बहू बहू ही रहेगी और उसे एक इंसान ही समझूंगी उसे अपनी तरफ से प्यार देने की कोशिश करूंगी। सास ही रहूंगी पर उसके मन को नहीं छलूंगी।


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