संध्या उखड़े मन से अपना बैग पैक कर रही थी।
मन में ढेरों सवाल उमड़ रहे थे—
“पता नहीं कैसा होगा रोहित का घर… और उसकी पत्नी? कहीं बड़ी भाभी जैसी हुई तो? वो भी अगर दूरी बना ले तो मेरा मायका ही खत्म हो जाएगा।”
पाँच साल बाद वह अपने मायके जा रही थी। जब माँ-पापा थे, तो संध्या अकसर जाया करती थी, पर माँ के जाने के बाद और पापा के देहांत के बाद मायके की डोर जैसे ढीली पड़ गई थी। बड़े भाई अरविंद और उनकी पत्नी प्रीति ने तो शादी के कुछ ही समय बाद अलग गृहस्थी बसा ली थी। प्रीति का स्वभाव ऐसा था कि संध्या कभी सहज नहीं हो पाई।
अब मायके से नाता जैसे केवल छोटे भाई रोहित तक ही सीमित रह गया था। और जब उसने इतने आग्रह से बुलाया तो बहन का मन पिघल गया।
सुबह-सुबह ट्रेन थी। स्टेशन पहुँची तो धड़कन तेज़ हो गई। सफर के दो घंटे संध्या को बहुत भारी लगे। खिड़की से बाहर देखते-देखते वह यादों में खो गई—
कितना सुखद था वह समय, जब माँ-पापा और दोनों भाई उसके लिए सारी दुनिया थे। माँ की गोद, पापा की डाँट, भाईयों के संग शरारतें—सब कुछ कितना मीठा था।
लेकिन माँ के असमय चले जाने से सब बदल गया। पापा ने बहुत संभाला, मगर घर की चहल-पहल कहीं खो गई। फिर जब संध्या की शादी हुई और कुछ समय बाद पापा भी चल बसे, तो मानो मायका सूना हो गया।
ट्रेन रुकी तो खिड़की से आवाज़ आई—
“दीदी!”
संध्या ने देखा—उसका छोटा भाई रोहित मुस्कुरा रहा था। वह झट से उतरी और भाई से लिपट गई।
“कैसी हो दीदी? कितना इंतज़ार किया इस दिन का।”
रोहित ने सामान उठाया और टैक्सी में रख दिया।
घर की घंटी बजाई तो दरवाज़ा खुला। सामने एक सांवली-सुंदर लड़की खड़ी थी, चेहरे पर स्नेह और आँखों में अपनापन। उसने तुरंत संध्या के पैर छुए और मुस्कुराकर बोली—
“आइए दीदी, आपके मायके में आपका स्वागत है।”
वह थी सपना, रोहित की पत्नी।
संध्या थोड़ी अचंभित हुई, पर मन में संतोष भी हुआ। सपना ने बड़े प्यार से गले लगाया और घर के भीतर ले गई।
“दीदी, आप फ्रेश हो जाइए, तब तक मैं खाना लगाती हूँ,” सपना ने कहा।
जब संध्या डाइनिंग पर आई, तो रोहित बोला—
“दीदी, देखो, तुम्हारी पसंद का सब बनाया है—आलू का पराठा, दही और चटनी।”
संध्या मुस्कुरा उठी। उसे लगा, भाई अब भी उसकी छोटी-छोटी पसंद याद रखता है। खाते-खाते दोनों भाई-बहन पुरानी यादों में खो गए।
सपना पास ही बैठी थी और बार-बार पूछ रही थी—
“दीदी, नमक तो ठीक है न? पराठा और ले लीजिए।”
उसका अपनापन संध्या को बहुत भा रहा था।
पूरा हफ़्ता कैसे बीत गया, पता ही नहीं चला। सपना ने संध्या की इतनी आवभगत की कि उसे मायके की कमी ही महसूस नहीं हुई। सुबह चाय से लेकर रात के खाने तक—सब संध्या की पसंद से ही होता।
कभी बाजार घुमा लाती, कभी पड़ोस में मिलवाती। बार-बार कहती—
“दीदी, आप जब भी चाहें आ जाइए, यह घर आपका ही है।”
संध्या सोचती—जिस मायके को वह सूना मान बैठी थी, वही अब सपना के स्नेह से रोशन हो रहा था।
दिन तेजी से बीत गए और लौटने की घड़ी आ गई। संध्या रात को सामान बाँध रही थी कि तभी सपना और रोहित आए। उनके हाथ में एक सुंदर साड़ी, काँच की चूड़ियाँ, सिंदूर की डिब्बी और चाँदी की पायल थी।
सपना ने संध्या की ओर बढ़ाते हुए कहा—
“दीदी, ये आपके लिए हैं। कृपया मना मत कीजिएगा।”
संध्या झेंप गई—
“अरे इसकी क्या ज़रूरत थी? तुम्हारा प्रेम ही मेरे लिए सबसे बड़ा उपहार है।”
सपना मुस्कुरा कर बोली—
“दीदी, अगर माँ होतीं तो यही कहतीं—‘ये तुम्हारा मायका है और यह तुम्हारा हक है।’ माना कि माँ-पापा अब नहीं हैं, लेकिन जब तक हम दोनों हैं, आपका मायका कभी सूना नहीं होगा।”
रोहित भी भावुक हो उठा—
“और दीदी, आप तो हमारी माँ जैसी हैं। आपका आशीर्वाद ही हमारे लिए सबसे बड़ा खज़ाना है।”
संध्या की आँखें भर आईं। उसने रोहित और सपना दोनों को गले लगा लिया। उसे लगा जैसे माँ का स्नेह सपना की आँखों में उतर आया है।
संध्या ट्रेन में बैठी तो मन ही मन सोच रही थी—“सच है, मायका माँ-बाप से होता है, लेकिन कभी-कभी भाभी के अपनापन से भी मायका ज़िंदा रहता है। सपना ने मुझे यह एहसास दिलाया कि माँ नहीं है तो क्या, मायके की गर्माहट अब भी बाकी है।”
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