गाड़ी अचानक हल्का-सा झटका खाकर रुकी तो मेरी झपकी टूटी। सामने बोर्ड पर नज़र पड़ी—
“स्नेह निकेतन वृद्धजन सेवा केंद्र”
मैंने बगल में बैठे आदित्य की ओर देखा,
“आ गए क्या, बेटा?”
आदित्य ने मुस्कुराकर गर्दन हिलाई। ड्राइवर पीछे की सीट से उतरकर आया, धीरे से दरवाज़ा खोला और मुझे सहारा देकर नीचे उतारने लगा। घुटनों में अब पहले जैसा ज़ोर कहाँ, पर दिल अजीब-सी हल्की घबराहट से भरा हुआ था।
आदित्य ने मेरा हाथ थाम कर कहा,
“धीरे-धीरे, माँ… बस पाँच–छह सीढ़ियाँ ही तो हैं।”
मैंने उसके हाथ पर हल्की-सी पकड़ मज़बूत की और बोली,
“तू साथ है न, तो सीढ़ियाँ क्या, पहाड़ भी चढ़ जाऊँगी।”
आज सुरेश का जन्मदिन था। पाँच साल हो गए उन्हें गए हुए। जब तक वो थे, हर साल किसी न किसी ज़रूरतमंद की मदद कर देते थे, और कहते थे, “जो भी करो, बुज़ुर्गों के नाम पर करना, कल हम भी यहीं की तरफ़ होंगे।”
उनके जाने के बाद यह ज़िम्मेदारी जैसे मेरे हिस्से आ गई। उनकी पहली बरसी पर आदित्य ने ही कहा था,
“माँ, पापा को लोगों की सेवा बहुत पसंद थी… क्यों न हम हर साल किसी वृद्धाश्रम में भोजन करवा दें?”
तब से, सुरेश के जन्मदिन और पुण्यतिथि—दोनों दिन हम “स्नेह निकेतन” आया करते थे। पहले आदित्य और माया (मेरी बहू) ही आ जाते, मैं कहती—“तुम लोग कर आओ, मैं घर पर ही दीपक जला लूँगी।”
पर इस बार न जाने क्यों मन हुआ कि खुद जाऊँ। जब मैंने आदित्य से कहा, तो उसने एक पल को मेरी तरफ़ कुछ ऐसे देखा जैसे मन में कोई उधेड़बुन चल रही हो। फिर तुरन्त मुस्कुरा कर बोला,
“चलो माँ, इस बार आप भी चलिए।”
अब याद आया, तभी तो जाने से पहले उसने माया से धीमी आवाज़ में कहा था, “आज तो इन्हें साथ ले ही जाना पड़ेगा।” मैं उस समय समझ नहीं पाई थी, बस मज़ाक समझकर टाल दिया।
आँगन में कदम रखते ही हल्की-सी ठंडी हवा गालों से टकराई। सामने छोटा-सा बगीचा था—गेंदे, गुलाब, रुई जैसी सफ़ेद फूलों वाली झाड़ियाँ। हरी घास पर धूप की हल्की चादर बिछी थी।
कुछ बुज़ुर्ग कुर्सियों पर बैठे अख़बार पढ़ रहे थे, कुछ लाठी टिकाकर धीमी-सी बातचीत में लगे थे, दो–तीन दादियाँ टोकरी में मटर छीलते-छीलते हँस भी रही थीं। कोने में कुछ बच्चे भी दिखे—शायद कर्मचारियों या सेवकों के। एक वृद्ध अंकल उन्हें अंग्रेज़ी के अक्षर लिखना सिखा रहे थे।
मेरे बैठने के लिए बरामदे में बेंच खींच दी गई। मैं आराम से बैठ गई।
“माँ, मैं केयर–टेकर से बात करके आता हूँ, फिर प्रसाद और दोपहर के भोजन की व्यवस्था देख लेंगे। आप बैठिए, इधर–उधर मत चलिए अभी,” आदित्य ने कहा।
मैंने जैसे-तैसे उसे जाने दिया, पर मन कोई पुरानी यादों की गठरी सा खोलने लगा था।
तभी मेरी नज़र दाईं तरफ़ पड़ी। एक कोने में लोहे की क्रीम रंग की कुर्सी पर कोई महिला बैठी थी—बालों में हल्की सफ़ेदी, आँखों पर मोटा चश्मा, हाथ में अख़बार। चेहरा सूखा-सूखा-सा, पर नक़्श इतने जाने-पहचाने कि मेरा दिल एकदम से धक् से रह गया।
मन में एक नाम जैसे अपने–आप उभर आया—
“लीला…”
फिर तुरंत खुद को झिड़क भी दिया,
“नहीं, नहीं, लीला काकी यहाँ कैसे होंगी? उनके तो दो-दो इंजीनियर बेटे हैं, दोनों विदेश में… तीसरा भी तो किसी बड़ी कंपनी में है… किस बात की कमी थी उन्हें!"
मैंने गर्दन दूसरी तरफ़ घुमानी चाही, पर आँखें वहीं अटक गईं। वो धीरे-धीरे अख़बार पलट रही थीं। जैसे ही उन्होंने पन्ना मोड़ा, हमारी नज़रें टकराईं।
उनकी आँखें अचकचा कर फैल गईं, होंठ काँप उठे।
एक साथ हमारे मुँह से निकला—
“तुम… शारदा?”
“काकी… आप?”
मैं लड़खड़ाते क़दमों से उनकी ओर बढ़ी। उन्होंने अख़बार गोद में रख दिया।
कितने साल हो गए थे… शायद बीस से भी ज़्यादा। हमारी पुरानी कॉलोनी, वो छोटा-सा क्वार्टर, सामने वाली सीढ़ियों पर बैठकर चाय पीना… सब कुछ जैसे एक ही पल में आँखों के सामने घूम गया।
“तू यहाँ?” उन्होंने जैसे खुद से ज़्यादा आसमान से पूछा।
“आप यहाँ…?” मैं भी लगभग वही सवाल कर बैठी।
एक पल को दोनों चुप रहे। फिर मैंने मुस्कुराने की कोशिश की,
“पहले तुम बताओ, कैसे हो? याद है, जब भी अख़बार हाथ में होता था, घर के किसी काम का होश नहीं रहता था तुम्हें।”
लीला काकी हल्की-सी हँसी हँसीं,
“अभी भी वही आदत है, बस… अब अख़बार के अलावा कोई साथ नहीं रहा, तो इसे ही पकड़े रहती हूँ।”
उनकी आवाज़ की कंपकंपी मेरे दिल तक उतर गई। मैं उनके बगल वाली कुर्सी पर बैठ गई।
एक समय था जब हम दोनों दरवाज़े खोलकर सुबह की शुरुआत एक-दूसरे की चाय की सुगंध से किया करते थे। मेरी दो बेटियाँ थीं—अनु और कोमल। लीला काकी के तीन बेटे—रवि, महेश और विकास। पूरे मोहल्ले में हमारी जोड़ी मशहूर थी—मैं “शारदा भाभी”, और वो सबके लिए “लीला काकी”।
अक्सर वो ताने देतीं, बड़े विश्वास के साथ,
“शारदा, तू क्यों इतनी परेशान रहती है बेटियों के लिए? देखना, मेरी तो तीन-तीन लाठियाँ हैं बुढ़ापे की। तेरी बेटियाँ तो एक दिन ससुराल चली जाएँगी, वहीं की हो जाएँगी। बेटा ही तो असली सहारा होता है। तुम तो बेचारी हो, सच में।”
मैं मुस्कुरा कर रह जाती,
“काकी, भगवान ने जो दिया, भरपूर दिया… मेरा सहारा तो वही है। बच्चे तो बस ज़रिया हैं।”
वो हँस देतीं,
“तुम बड़ी दार्शनिक हो गई हो, शारदा!”
उस समय बात चुभती ज़रूर थी, पर मैं मन को समझा लेती थी। अनु पढ़ाई में तेज़ थी, कोमल को नृत्य का शौक था। सुरेश बीच–बीच में कह भी देते—
“लोग जो बोलते हैं बोलने दे, कल इन्हीं बेटियों पर किसी को नाज़ होगा। तू बस इन्हें अपने पैरों पर खड़े होने की ताकत दे।”
समय बीतता गया। मेरे पति की नौकरी मध्यम वेतन की थी, पर हम संतुष्ट थे। अनु ने बी.एड. किया, शिक्षक बन गई। कोमल शादी के बाद अपने पति के साथ दूसरे शहर चली गई।
दूसरी तरफ़, लीला काकी के घर में दिन-ब-दिन शान–शौकत बढ़ती गई। रवि इंजीनियर बनकर बेंगलुरु चला गया, महेश किसी प्राइवेट कंपनी में मैनेजर था, विकास भी अच्छी नौकरी पर लग गया। पुराना मकान तोड़कर उन्होंने दो मंज़िला बड़ा-सा घर बनाया।
काकी अक्सर दरवाज़े पर खड़ी होकर मुझे आवाज़ देतीं,
“देख शारदा, ईंट–ईंट जोड़कर घर बनाया है हमने, कल ये सब बेटों के नाम होगा। तेरी बेटियों ने क्या करना है इन दीवारों का?”
मैं हँसकर बोलती,
“यह घर भी किसी दिन इन्हीं का है, और वो घर भी, जहाँ मेरी बेटियाँ हैं। लेन-देन का हिसाब मैं नहीं रखती, मेरी बेटी दिल जोड़ लें, वही बहुत है।”
वो फिर “बेचारी” कहकर सिर हिला देतीं, और मैं अंदर लौट आती।
पुरानी यादों के सागर से निकलकर मैं फिर वर्तमान में लौटी। मैंने लीला काकी का चेहरा गौर से देखा—गाल धँस गए थे, आँखों के नीचे काले घेरे, बालों में सफ़ेदी ज़्यादा, कंधे कुछ झुके हुए।
“काकी… सब ठीक है न? रवि, महेश, विकास सब अच्छे हैं?” मैंने हिम्मत करके पूछ ही लिया।
उनकी आँखें जैसे अचानक भारी हो गईं। उन्होंने अपने काँपते हाथ मेरी गोद पर रख दिए।
“सब बहुत अच्छे हैं, शारदा… इतनी अच्छाई कि उनकी ख़ुशियों के लिए मैं बोझ बन गई।”
मेरे भीतर कुछ टूट-सा गया।
“मतलब…?”
उन्होंने गहरी साँस ली, जैसे वर्षों का दुख एक ही साँस में बाहर निकालना चाहती हों।
“तुझे याद है न, पुराना मकान? तू कितनी बार कहती थी,
‘काकी, घर अपने नाम रख लो, थोड़ा पैसा सहेज कर रखो, कल को ज़रूरत पड़े तो किसी पर निर्भर नहीं रहोगी।’
मैं क्या कहती थी?”
मैंने धीमे से कहा,
“आप कहती थीं— ‘मेरे तीन-तीन बेटे हैं, अपने घर में पराई क्यों बनूँ?’”
काकी की आँखों में आँसू आ गए।
“हाँ, वही घमंड था, वही मेरी सबसे बड़ी ग़लती थी।
सुरेश भैया (मेरे पति) के जाने के बाद भी तूने अपना संतुलन बनाए रखा। बेटियों ने तुझे संभाला। और उधर… मेरे तो पति भी जल्दी चले गए थे, पर मैंने कभी नहीं सोचा कि कल को मुझे अकेले भी पड़ना पड़ सकता है।
रवि ने कहा— ‘माँ, पुराने मकान की जगह फ़्लैट ले लेते हैं, बड़ा सोसाइटी वाला। आपकी सुविधा रहेगी।’
महेश बोला— ‘सभी का हिस्सा बराबर रहेगा, झगड़ा नहीं होगा।’
मैंने बिना सोचे–समझे कागज़ों पर साइन कर दिए। मकान बिक गया, पैसे तीन हिस्सों में बाँट दिए गए। मेरे हिस्से की रकम रवि के खाते में गई—कहते हुए कि ‘आपका पैसा कहाँ जाएगा, हमारा ही तो है।’
तीनों ने अलग-अलग फ्लैट ले लिए। शुरू-शुरू में मैं बारी-बारी से सबके घर रहती रही। ‘माँ, यहाँ आ जाओ… माँ, वहाँ आ जाओ…’
ये आना–जाना भी एक तरह का सामान बन जाना ही था। जब तक स्वस्थ थी, बच्चों की देखभाल, रसोई, पूजा–पाठ, सब वही। बहुएँ नौकरी वाली थीं—थकी-हारी आतीं। मैं खुद खुश थी कि चलो, किसी काम आ रही हूँ।”
काकी थोड़ी देर के लिए रुकीं, चश्मा उतारकर आँखों को पोंछा।
“फिर एक दिन, बाथरूम में फिसल गई। कूल्हे की हड्डी में फ्रैक्चर हो गया। कुछ महीनों तक बिस्तर से उठ ही नहीं पाई। अस्पताल के चक्कर, दवाइयाँ… बहुओं को मुझसे ज़्यादा मेरी रिपोर्टें, बिल और मेडिकल फ़ाइलें बोझ लगने लगीं।
रवि बोला— ‘माँ, आपके लिए तो हम जान भी दे देंगे, पर अब ऑफिस, बच्चे, ये भाग–दौड़… आप भी समझा करो।’
महेश बोला— ‘घर में छोटे बच्चे हैं, कभी आपके ऊपर गिर जाएँ, कभी आप उनके ऊपर… रिस्क है।’
विकास ने धीरे से कहा— ‘माँ, एक अच्छा-सा वृद्धाश्रम है, शहर से थोड़ी दूर, सुविधा भी है, डॉक्टर भी हैं… सब मिलकर सोचते हैं।’
और देख… यहाँ हूँ मैं, “स्नेह निकेतन” में।
शुरू–शुरू में वजन बहुत था दिल पर। पर धीरे-धीरे समझ आया कि जिन घरों में कुत्ते–बिल्लियों के लिए अलग बिस्तर हैं, वहाँ माँ के लिए “समय” नहीं बचता। दीवारों पर मेरी फोटो ज़रूर टंगी है, पर घर में मेरी जगह नहीं।
तूने चेताया था मुझे, मैंने तुझे ही “बेचारी” समझा। आज देख… मैं हूँ यहाँ, और तू अपनी बेटी के साथ आई है—पूरी इज़्ज़त, पूरे मान के साथ।”
मेरे गले में जैसे शब्द अटक गए।
“अनु याद है? उतनी-सी थी जब तेरे घर की सीढ़ियाँ चढ़ना सीख रही थी,” लीला काकी ने फिर कहा।
“अब वो तुम्हारे लिए भी ‘सीढ़ियाँ’ बन गई है, शारदा—सहारा।”
मैंने धीमे से हँसने की कोशिश की, आँखें भीग गई थीं।
“हाँ काकी, अनु ही तो है मेरा हौसला। वही तो रोज़ कहती है— ‘माँ, आप हैं तो मैं हूँ।’”
काकी ने मेरी तरफ़ देख कर धीरे से कहा,
“भगवान हर किसी को तीन बेटे नहीं, एक बेटी दे दे तेरी जैसी, तो ऐसे आश्रमों की संख्या आधी हो जाए।”
मैंने बात बदलनी चाही,
“काकी, क्या रवि, महेश, विकास मिलने नहीं आते?”
काकी मुस्कुरा दीं—एक ऐसी मुस्कान जिसमें मज़ाक से ज़्यादा कसक थी।
“रवि महीने में एक बार पैसे जमा करवा जाता है—मैनेजर के हाथों। महेश कभी-कभी दो–तीन महीने में झाँक जाता है, साथ में टिफ़िन वाले डब्बे लेकर—कि ‘माँ, ये घर का बना खाना है।’ विकास वीडियो कॉल पर हाथ हिला देता है—‘हलो माँ, आप खुश हैं न?’
तू ही बता, इस उम्र में किससे क्या कहूँ? बस, भगवान से कहती हूँ— जितना जीवन देना है दे, पर दिल में रोना कम कर दे।”
मेरे अंदर तक जैसे किसी ने चाकू घोंप दिया हो। कुछ पल हम दोनों चुप रहीं। बगीचे से बच्चों के हँसने की आवाज़ आए, कहीं कोई भजन चल रहा था।
तभी पीछे से किसी ने हल्के से आवाज़ दी,
“आंटी… चाय लीजिए।”
मैंने पलटकर देखा—मेरी अनु सामने खड़ी थी। सफ़ेद सलवार–कुर्ता, गले में आईडी कार्ड, चेहरे पर वही पुरानी, शांत मुस्कान। मैं हैरान रह गई।
“अरे… तू यहाँ?”
अनु हल्का-सा सकपका गई,
“अरे, आप… आदित्य ने बताया नहीं था क्या?”
“मैं तो अभी–अभी आई हूँ। तुम्हारा भाई मैनेजर से बात करने गया है। तू यहाँ क्या कर रही है?”
अनु ने ट्रे मेज़ पर रखते हुए कहा,
“माँ, पिछले डेढ़ साल से मैं हर रविवार यहाँ आती हूँ। स्कूल में बच्चों को पढ़ाती हूँ, और कभी-कभी यहाँ के दादाजी-दादीजी को भी। एक NGO के साथ वॉलंटियर करती हूँ… आपने ही तो सिखाया था, ‘जहाँ तक हो सके, किसी के काम आना।’”
मैं गर्व और आश्चर्य—दोनों से भर गई।
“और तूने मुझे बताया तक नहीं?”
अनु थोड़ी देर चुप रही, फिर बोली,
“एक वजह थी माँ… मैंने सोचा, आप यहाँ आओगी तो कुछ चेहरों को देख कर दुख होगा, कुछ चेहरों को देखकर गुस्सा भी आएगा… पर शायद आज समय था कि आप जानो।”
मैंने भौंहें सिकोड़ीं,
“मतलब?”
तभी लीला काकी ने अनु का हाथ थाम लिया,
“शारदा, तेरी बेटी पिछले एक साल से मेरे लिए भी बेटी बनी हुई है।”
मैंने हैरानी से अनु की तरफ देखा।
काकी बोलीं,
“जब मैं पहली बार यहाँ आई थी न, तब तीन दिन तक किसी से बात नहीं की। चौथे दिन ये आई—किताबें लेकर। बोली, ‘दादी, ये बड़े अक्षरों वाली किताबें हैं, अगर आप चाहें, तो मैं आपको पढ़कर सुना सकती हूँ।’
मैंने झुंझलाकर कह दिया— ‘पढ़ना मैं खुद जानती हूँ।’
तो ये मुस्कुरा के बोली, ‘अच्छा, तो मैं आपको सुना देती हूँ, आप मुझे सुनाईए।’
धीरे-धीरे हम बात करने लगे। नाम पूछा, तो बोली— ‘मैं अनु हूँ, शारदा की बेटी।’
तब से, हर महीने ये मेरे लिए साड़ी, स्वेटर, कभी फल, कभी बस मुस्कान लेकर आती है। पूरे समय मेरा हाथ पकड़े रहती है, पर कभी तुम्हारा नाम लेकर तुम्हारे सामने रोया नहीं। कहती है— ‘दादी, माँ से शिकायत नहीं करनी, बस उनके लिए दुआ करनी है कि वो हमेशा खुश रहें।’
तेरी बेटी ने रो-रोकर नहीं, चुप रहकर, मुस्कुरा कर मेरा साथ दिया है।”
मैंने अनु की तरफ देखा—आँखें भर आई थीं, पर होंठों पर हल्की-सी मुस्कान थी। मैंने उसे सीने से लगा लिया।
“तूने मुझे सब से बड़ा तोहफ़ा दिया है, अनू,” मैं फुँफकारती हुई रो पड़ी।
“काकी के बेटों ने जो नहीं किया, तूने वो कर दिखाया।”
आदित्य भी उसी समय बरामदे में आ गया। शायद पीछे ही खड़ा सब सुन रहा था।
“माँ…” उसने धीरे से कहा,
“हम सोचते थे, आप को सब एक साथ पता चले तो बेहतर होगा। लीला काकी से मिलवाने से पहले वो तैयार थे या नहीं, ये निर्णय अनु ने ही लिया था। मैं तो बस साथ देता रहा।”
मैंने आदित्य की ओर भीगी आँखों से देखा,
“तुम दोनों ने मिलकर माँ को इतना बड़ा सम्मान दिया है, मुझे और क्या चाहिए?”
लीला काकी ने दोनों हाथ उठाकर मेरे बच्चों को आशीर्वाद दिया,
“भगवान करे, तुम्हारे बच्चे कभी अकेले न हों। लड़का हो या लड़की—बड़प्पन दिल से होता है, नाम से नहीं।
मैंने पूरी उम्र ‘बेटों’ पर घमंड किया, किसी एक इंसान पर भरोसा नहीं किया—खुद पर भी नहीं।
तूने बेटियों पर विश्वास किया, और देख—आज तेरी गोद में दो लाठियाँ हैं, और मेरी लाठियाँ… कहीं अपनी-अपनी दुनिया में व्यस्त हैं।”
हम तीनों बस चुप रह गए। बाहर पेड़ की डाली से सूखी पत्ती हवा से हिलकर ज़मीन पर गिरी। शायद वो भी किसी का सहारा छोड़कर अकेली हो चुकी थी।
दोपहर तक प्रसाद वितरण, भोजन, दवाई के पैकेट बाँटना चलता रहा। अनु बुज़ुर्ग दादियों से वहीं दरी पर बैठकर बातें करती रही। आदित्य और मैं मिलकर थालियाँ परोसते रहे।
जब लौटने का समय आया, तो लीला काकी मुझे गेट तक छोड़ने बाहर आईं।
“शारदा, एक बात कहूँ?”
“हाँ काकी?”
“जब भी आए न, मुझे ज़रूर बुला लिया करना। लड़कियाँ पराई नहीं होतीं, बस उनके मायके वाले सच में उन्हें अपनाएँ तो। आज समझ में आया कि रिश्ता किससे है—ख़ून से या ख़लूस से।”
मैंने उनका हाथ पकड़कर कहा,
“अब तुम्हें ‘काकी’ नहीं, ‘दीदी’ कहूँगी। और जब तक तुझमें साँस है, जान ले, तू अकेली नहीं है। मेरी अनु है ना तेरे पास, और मैं भी।”
काकी के आँखों से आँसू टपक पड़े।
गाड़ी में बैठते समय मैंने आसमान की तरफ देखा। लगा, सुरेश कहीं मुस्कुरा रहे हैं—
“देखो शारदा, लोग बेटों की गिनती करते रह गए, और हमारी धरोहर—हमारे बच्चों का संस्कार—आज किसी की आँखों में उम्मीद बनकर चमक रहा है।”
मैंने मन ही मन कहा,
“हे भगवान, हर माँ को बेटा–बेटी जो भी दे, पर इतना ज़रूर दे कि बुढ़ापे में उसे किसी ‘स्नेह निकेतन’ की भीड़ में अपना अकेलापन छिपाना न पड़े।”
गाड़ी धीरे-धीरे “स्नेह निकेतन” के गेट से बाहर निकल गई। पीछे मुड़कर देखा—बरामदे में खड़ी लीला दीदी हाथ हिला रही थीं, और उनके पास खड़ी मेरी अनु भी।
लग रहा था जैसे वर्षों का एक बोझ वहीं, उस गेट के अंदर छूट गया हो, और मेरे साथ घर लौट रही हो बस एक नयी समझ—
“अपनापन संख्या से नहीं, संवेदना से मापा जाता है।”
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