सावि और पूर्वी कहने को जुड़वा बहने थी लेकिन दिखने में दोनोंअलग थी। सावी अमावस्या की रात तो पूर्वी पूर्णिमा की रात जैसी सुंदर थी।देखकर यकीन करना मुश्किल होता था कि दोनों एक ही मां बाप की जुड़वां संतान है।पर सच को भी नकारा नहीं सकते।
पूर्वी की सुंदरता की वजह से घर में सबकी लाडली थी।घर में कोइ भी चीज आती पहले पूर्वी को पसंद करायी जाती फिर बची हुई सावि के हिस्से मे आती।जन्म से ही अपने और पूर्वी के बीच का अंतर देखते देखते बड़ी हुइ थी।अब अठारह वर्ष के होते होते तो उसको आदत सी हो गयी थी तिरस्कार सहने की।
घर में एक मां ही थी जो सावि के दर्द को समझती थी,पर मां की घर में सुनता कौन था।दादी के आगे मां की कभी हिम्मत ही नहीं हुइ बोलने की।
पूर्वी अपनी सुंदरता का हर जगह फायदा उठाती थी।कोलेज में भी सब पूर्वी के आगे पीछे घूमते थे।पढने लिखने में पूर्वी का मन बिलकुल नहीं लगता था हर समय मौज मस्ती मे रहती।परीक्षा नजदीक आने पर सावि से नोट्स लेकर जैसे तैसे पास हो जाया करती थी।कोलेज का बहाने करके अक्सर फिल्म देखने या घूमने चली जाती और सावि से यह सब घर पर बताने के लिए मना कर देती।सावि जानती अपनी बहन को कि यदि सावि घर पर बता भी देगी तो पूर्वी कोइ ना कोइ बहाना बनाकर उसको झूठा साबित कर देगी,इसलिए सावि घर पर कुछ ना कहती।
सावि के युवा होते मन में भी अनेक इच्छाएँ उठती थी ,वह भी सपनो की उडा़न भरना चाहती थी लेकिन अपने रंग और दादी के तानो की वजह से सपने देखने से पहले ही टूट जाते।इन टूटे सपनो को अपनी डायरी में लिखकर खुश हो जाती थी सावि।
सावि अपनी डायरी किसी को नहीं पढाती थी।पूर्वी को पता था कि सावि अक्सर रात में डायरी में कुछ लिखती रहती है।एक दिन पूर्वी चुपके से सावि की डायरी पढने लगी तो पता चला कि सावि तो किसी बड़े कवि की भांति शब्दों को कविता में पिरोती है ,जिसको पढकर किसी को भी यकीन नहीं हो सकता कि वह सावि लिखती है।मंत्रमुग्ध हो गयी थी पूर्वी सावि की कविताओं पर।लेकिन सावि से उसने कुछ नहीं कहा।
कोलेज में लिटरेचर फैस्टिवल में कविता प्रतियोगिता का आयोजन किया गया।पूर्वी को तो हमेशा से लाइमलाइट में रहने की आदत थी वह यह मौका कैसे छोड़ सकती थी।क्योंकि फैस्टीवल में बाहर से अनेक बड़े बड़े कलाकार और साहित्यकार आने वाले थे।
अब पूर्वी सावि की तरफदारी करने लगी कि कैसे भी करके सावि अपनी लिखी हुई कविता उसको फैस्टीवल में बोलने के लिए दे दे।सावि पूर्वी की यह चाल समझ नहीं पायी थी उसने तो बहन का प्यार देखा और आ गई उसकी बातो में।अपनी सबसे अच्छी कविता जो उसने खुद के जीवन पर लिखी थी।पूर्वी को फैस्टीवल में बोलने के लिए दे दी।
दूसरे दिन पूर्वी ने प्रतियोगिता में सावि की लिखी कविता सुनाई तो वहां बैठे सभी श्रोता गण तालियां बजाए बिना ना रह सके।पूर्वी को खूब तारीफ मिली।
उसी फैस्टिवल में एक युवा साहित्यकार करण भी आये थे जिनकी कविताओ से युवावर्ग बहुत प्रभावित था।हर युवा लड़की करण मे अपने सपनो का राजकुमार ढूंढा करती थी।
वहीं करण खुद आकर जब पूर्वी से उसकी कविता की तारीफ करने लगे तो पूर्वी तो जैसे आसमां में उड़ने लगी।
कविता की तारीफ से शुरू हुइ यह मुलाकात धीरे धीरे दोस्ती में बदल गयी थी।पूर्वी सावि की लिखी कविता अपनी बता कर करण को सुनाती।करण उसकी कविताओं का कायल होता जा रहा था।बात दोस्ती से प्यार तक पहुंच गयी थी। पूर्वी इन सब में भूल गयी थी कि यदि किसी दिन करण को कविताओ की सच्चाई पता चल गयी तो अंजाम क्या होगा।
जिसका पूर्वी को डर था वहीं हुआ।करण के जन्मदिन के अवसर पर दोस्तों ने मिलकर पार्टी रखी थी पूर्वी को खास तौर पर आने के लिए कहा गया था।बहुत खुश थी पूर्वी करण की जन्मदिन पार्टी में जाने को लेकर ।महंगा गिफ्ट खरीदा था करण के लिए, खुद भी बहुत सुंदर लग रही थी लाल रंग की गाउन में।
पार्टी में सही समय पर पहुंची थी करण ने जब उसको लाल रंग की गाउन में देखा तो देखता ही रह गया।तभी दोस्तों ने कहा -हमे भी मिलाओगे या खुद ही देखते रहोगे भाभीजी को।सुनकर करण ने पूर्वी को अपने दोस्तों से मिलवाया।केक काटने के बाद सबने पूर्वी से कहा कि जिस कविता को सुनकर करण का दिल जीत लिया था,आज आपको करण के लिए खास कविता सुनानी होगी।
कविता का नाम सुनते ही पूर्वी का चेहरा सफेद पड़ गया।उसे तो कविता का क भी नहीं आता फिर इस तरह कैसे सबके सामने कविता सुना सकती है।भगवान से प्रार्थना करने लगी कि उसे कैसे भी इस परिस्थिति से बचा ले।परन्तु आज ईश्वर भी उसको उसकी गलती की सजा देना चाहते थे ।सब दोस्त पूर्वी को बार बार बोले जा रहे थे लेकिन जैसे पूर्वी के होंठ सिल गये हो,उसके मुंह से शब्द नहीं निकल रहे थे।तब करण ने जोर देकर कहा पूर्वी मेरे जन्मदिन का तोहफा मांग रहा हूँ मना मत करना अच्छी सी अपनी लिखी कविता सुनाकर बता दो सबको कि मेरी पूर्वी जैसा इस दुनिया में कोइ नहीं है।
क्या जवाब देती पूर्वी सबके सामने करण को।कैसे बताती कि कविता वो नहीं उसकी बहन सावि लिखती है वो तो सिर्फ पढकर बोलती है।भाव किसी और के छुपे होते है उन कविता में।
कोइ उपाय नहीं नजर आता देखकर पूर्वी करण को एक तरफ ले जाकर सब सच सच बता दिया।
सच सुनकर करण के होश उड़ गये।उसे विश्वास नहीं हो रहा था पूर्वी के सुंदर चेहरे के पीछे स्वार्थ सुंदरता का घमंड छिपा हुआ था।जिसने किसी के सपनो और मन की भावनाओं का इसलिए इस्तेमाल किया कि उसको दुनियाभर में प्रसिद्ध होना था।
झूठ की नींव रख कर वह प्यार का रिश्ता बनाना चाहती थी।जब तुम अपनी बहन के साथ विश्वासघात कर सकती हो तो क्या पता तुम किसी और के हाथ ऐसा नहीं करोगी।मुझसे इतनी बड़ी गलती कैसे हो सकती है।जिस पर हजार लड़कियां मरती थी वह तुम्हारे झूठे प्यार पर कैसे यकीन कर लिया।
मैने तुम्हारी सुंदरता से प्यार नहीं किया मैने तो उससे प्यार किया था जिनको सुनकर जिंदगी को नये नजरिए से देखने की सोच मिलती है।
मै आज भी उन शब्दों को मन के भावों में उतारने वाली कलम से प्यार करता हूँ।तुमसे नहीं चली जाओ यहां से।हो सके तो जाते जाते मुझे उसका नाम जरूर बता देना जिसने शब्दों को कविता में ढाला है।
"सावि"नाम है ।उसका जिसने यह कविताएँ लिखी है।मेरी बहन है वो।मुझे माफ कर दो करण।
मुझे मिलना है तुम्हारी बहन से अभी इसी समय।
करण पूर्वी के साथ उसी समय उसके घर गया और सावि को बिना देखे ही उसके पापा से सावि से शादी करने की बात कह दी।
किसी को विश्वास नहीं हो रहा था कि जिस सावि के रंग की वजह से उसको कोइ पसंद नहीं कर रहा था आज घर बैठे करण जैसा फेमस चेहरा उसका हाथ अपने लिए मांग रहा है।
सावि दूर खड़ी सब सुन रही थी,उसने जैसे ही करण को देखा करण उसको ही देख रहा था,मानो उससे पूछ रहा हो कि शादी करोगी मुझसे।
बिना कुछ कहे दोनों ने अपने प्रेम का इजहार कर दिया था।जैसे कह रहे हो ना बोले तुम ना मैने कुछ कहा।
जन्म के बाद सावि को आज किसी ने बिना उसके रंग को देखे उसकी प्रतिभा से प्यार किया था।अब उसको जिंदगी से कोई शिकायत नहीं थी।।
सच है दोस्तों सच्चा प्रेम कभी भी रंग रूप का मोहताज नहीं होता और झूठ की नींव पर कोई भी रिश्ते को मंजिल नहीं मिल सकती।
धन्यवाद
अंजू कुमावत
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