“पता नहीं हर बार मेरे ही साथ ऐसा क्यों होता है…”
स्टाफ़ रूम की खाली मेज़ पर बैग पटकते हुए सान्या बड़बड़ाई और फिर वहीं कुर्सी पर ढह-सी गई।
कमर में तेज़ ऐंठन उठी तो उसने आंखें भींच लीं।
पूरा शरीर थक कर टूट रहा था। पिछले तीन हफ्तों से वह स्कूल के वार्षिक उत्सव की पूरी ज़िम्मेदारी उठाए घूम रही थी—
डेकोरेशन की लिस्ट, बच्चों की ड्रेस, प्रोग्राम की टाइमिंग, गेस्ट लिस्ट, एंकरिंग स्क्रिप्ट…
और आज, जब मंच पर प्रिंसिपल ने माइक पर कहा—
“वर्षों से हमारे स्कूल के सांस्कृतिक कार्यक्रमों की जान रही हैं हमारी वंदना मैम। इस बार भी इन्होंने कमाल कर दिया…”
तो तालियाँ वंदना मैम के लिए गूँज उठीं।
सान्या वहीं साइड में खड़ी, पर्दे के पीछे से बच्चों को समय पर स्टेज पर धकेल रही थी।
जिन्होंने महीनों पसीना बहाया, वे या तो बच्चे थे या सान्या।
और जिनके नाम की माला पड़ी, वे वंदना मैम थीं—सांस्कृतिक विभाग की हेड।
“अच्छा ही है…”
मुस्कराने की कोशिश करते हुए उसने खुद से कहा था,
“कम से कम कार्यक्रम अच्छे से हो तो गया। नाम किसका लिखा है, क्या फर्क पड़ता है?”
पर फर्क पड़ता था।
जब बार-बार मेहनत तुम्हारे हाथों से होकर किसी और की झोली में गिरती हो, तो दिल में कड़वाहट का छोटा सा बीज भी कहीं न कहीं अंकुरित हो ही जाता है।
उधर से आवाज़ आई—
“सान्या, फौरन ऑफिस में आओ ज़रा।”
क्लास IV की क्लर्क रीना ने झाँककर कहा।
सान्या उठकर प्रिंसिपल के कमरे तक पहुँची तो वंदना मैम वहाँ पहले से बैठी थीं।
“हाँ जी, बहुत-बहुत बधाई आप दोनों को। प्रोग्राम बहुत अच्छा हुआ,” प्रिंसिपल ने कहा।
फिर स्मित हँसी के साथ आगे बोलीं—
“सान्या, तुमने अच्छा काम किया। वंदना जी को भी पूरा सहयोग दिया।”
‘सहयोग…’
शब्द सान्या के कानों में अटक गया।
सहयोग…?
वंदना मैम हँसते हुए बोलीं,
“मैम, सान्या तो मेरी राइट हैंड है। बस मैं प्लान बना लेती हूँ, ये सब आगे संभाल लेती है। अच्छा लगता है कि मेरे पास इतना समर्पित स्टाफ़ है।”
समर्पित…
एक और शब्द जो सुनने में अच्छा, महसूस में चुभन वाला था।
“थैंक यू, मैम,” सान्या बस इतना ही कह पाई।
कमरे से बाहर आते-आते उसकी आँखों के कोरों से आँसू चुपचाप निकलना शुरू हो गए।
स्टाफ़ रूम में पहुँचकर उसने जल्दी से अपना मोबाइल उठाया और बाहर कॉरिडोर में आ गई।
अंगूठा खुद-ब-खुद ‘माँ’ वाले नाम पर जा ठहरा।
कॉल लगते ही उधर से परिचित आवाज़ आई,
“हाँ बेटा, हो गया कार्यक्रम? कितने बजे निकल रही है?”
बस इतना सुनते ही सान्या का गला भर आया।
“माँ… मुझे न… बिल्कुल अच्छा नहीं लग रहा… इतनी मेहनत करके भी… जैसे मैं हूँ ही नहीं…”
उधर से माँ की आवाज़ नरम हो गई,
“अरे-अरे, पहले आराम से बैठ, सांस ले। फिर आराम से बता, हुआ क्या?”
सान्या ने बीच-बीच में सुबकियाँ लेते हुए सब बता दिया—
कैसे सुबह छह बजे से स्कूल में थी, कैसे बच्चों को रिहर्सल करवाती रही, कैसे डेकोरेशन वाले आख़िरी वक्त पर मुकर गए, तो खुद और दो-तीन बच्चों के साथ रात नौ बजे तक गुब्बारे, फूल लगा रही थी।
“और ऊपर से नाम… वही पुरानी कहानी, माँ। सराहना हमेशा वंदना मैम की, डाँट हमेशा छोटी टीचर की।
कभी तो लगे कि कोई मेरे काम की भी कदर करता है…”
माँ ने कुछ पल चुप रहकर कहा,
“बेटा, सच्चाई सुनोगी तो बुरा लगेगा, पर सुन ले—
दुनिया का सिस्टम ऐसा ही है। जिस पद पर बैठे हैं, क्रेडिट सबसे पहले उसी के खाते में जाता है।
पर इसका मतलब ये नहीं कि तू खुद को निचोड़ कर रख दे, सिर्फ दूसरों का नाम ऊँचा करने के लिए।
कब से देख रही हूँ, तू हर काम ‘हाँ’ कह कर पकड़ लेती है—
अचानक ड्रामा चाहिए, तू कर देगी;
किसी का पीरियड खाली, तू ले लेगी;
रिपोर्ट कार्ड, प्रोजेक्ट, हॉस्टल विज़िट—सब में आगे।
ये देख कर लोग तुझ पर और लादते जाते हैं।
तुझे भी सीखना होगा ‘ना’ कहना।”
“पर माँ, मैं ‘ना’ कहूँगी तो लोग सोचेंगे—देखो, कितना बदल गई है, काम से भागती है…”
“लोगों को सोचने से फुर्सत मिली है क्या?
जब तू रात-रात भर सीटिंग लेकर चार्ट बनाती है,
किसी ने सोचा कि तेरे भी बच्चे हैं?
घर भी है? ये तो तेरी हैसियत देख-देखकर काम बढ़ा रहे हैं।
और तू खुद अपनी कद्र नहीं करेगी तो दुनिया क्यों करेगी, सान्या?
काम करना बुरा नहीं, पर खुद को मिटा देना भी कोई समझदारी नहीं।
कल तेरी कमर और बढ़ गई तो? तेरे घरवाले तेरे बिना कैसे चलेंगे?”
“तुम्हारे पापा को याद है न, कितनी देर खड़े रहने से उन्हें सर्वाइकल की दिक्कत हो गई थी।
लोगों का काम तो चलता रहता है, पर जिस्म साथ छोड़ दे न, फिर पछताने के सिवा कुछ नहीं बचता…”
सान्या चुप हो गई।
कमर की ऐंठन फिर से महसूस हुई,
जैसे माँ की बातों ने उसी दर्द को शब्द दे दिए हों।
माँ फिर बोली,
“और सुन, जिस वंदना मैडम की बात कर रही है न,
उनको भी आज से तेरह साल पहले मैंने देखा है—जब तू इस स्कूल में नई-नई जॉइन हुई थी।
तब वे ही शिकायत करती थीं कि पूरा काम मैं करती हूँ, क्रेडिट प्रिंसिपल ले जाते हैं।
समय के साथ वही आदतें नीचे वालों पर उतर जाती हैं।
तू तय कर ले कि तू ऐसा नहीं करेगी।
और आज के लिए—
सीधी बात, स्कूल में यदि काम खत्म हो गया हो तो घर आ जा।
किसी मीटिंग, किसी ‘सेलिब्रेशन सेल्फी’ के लिए रुकने की जरूरत नहीं।
शाम को गरम पानी से सेंक कर, दवा लेकर सो जा।
बाकी दुनिया कल भी चलती रहेगी, तू आज खुद को संभाल।
और हाँ, अभिषेक को बता दे साफ-साफ कि आज मैं रसोई में झाँकने लायक भी नहीं हूँ।
दो दिन बाहर का खा लेंगे तो कोई आसमान नहीं टूटेगा।
समझी?”
सान्या को एक हल्का-सा हँसी का झोंका आया,
“तुम्हारा वही डायलॉग, माँ—‘तू नहीं तो क्या, धरती घूमना छोड़ देगी?’”
“हाँ तो! खुद पर इतना ज़ुल्म करना बंद कर बेटी।
आदत डाल, कुछ काम दूसरों को भी करने देने की।
काम बाँटने में तेरा ताज थोड़ी ना गिर जाएगा।”
कॉल कटने के बाद सान्या ने लंबे समय बाद खुद के लिए एक छोटा-सा फ़ैसला किया—
आज वह स्टाफ़ रूम में आख़िरी तक बैठकर ‘फोटो सेलेक्शन’ नहीं करेगी,
ना ही बच्चों की छोड़ी हुई पानी की बोतलें समेटेगी,
ना ही वंदना मैडम के आगे-पीछे घूमेगी।
उसने अपना बैग उठाया, टाइम टेबल की फाइल अलमारी में रखी और गेट की तरफ चल दी।
पीछे से आवाज़ आई—
“अरे सान्या, फोटोग्राफर वाले आये हैं, फोटो सेलेक्ट कर लेते हैं आज ही…”
वंदना मैडम बोलीं।
सान्या पहली बार बिना अपराधबोध के मुस्कुरा कर बोली,
“मैम, आज कमर इतना दर्द कर रही है कि सीधे खड़ा भी नहीं हो पा रही।
अगर आप और रीना मैम देख लें तो… मैं कल शेष काम में आपकी मदद कर दूँगी।
आज मुझे वाकई घर जाना होगा।”
वंदना ने उसे सिर से पाँव तक देखा,
जैसे पहली बार उसकी थकान पर ध्यान दिया हो।
“ठीक है, तुम जाओ।
कल हम बैठकर बाकी चीजें हैंडल कर लेंगे।”
घर पहुँची तो दरवाज़ा खोलते ही दस साल की तृषा की आवाज़ आई,
“मम्मी! आज तो आप बहुत लेट हो गईं… पापा ने पिछली रोटी खुद बनाई है… थोड़ी मोटी है, पर हम खा लेंगे।”
डाइनिंग टेबल पर वाकई थोड़ी टेढ़ी-मेढ़ी रोटियाँ रखी थीं।
अभिषेक ने रसोई से झाँकते हुए कहा,
“मैडम, आज की स्पेशल डिश—मेरी बनाई दाल-रोटी।
थोड़ी नमक कम-बेशी हो तो मन से भर लेना।”
सान्या की आँखें भर आईं।
“तुमने बनाया खाना?”
“और नहीं तो क्या?
सुबह से तुम्हारी भक-भक कॉल आ रहे थे—‘ये देखना, वो देखना, बच्चों को संभालना…’
मैंने सोचा, कम से कम घर का मोर्चा तो अपने हाथ में ले लूँ।
वैसे भी, अगर मैं तुम्हारे काम की आधी भी जिम्मेदारी बाँटने लगूँ तो तुम्हारी ये ‘हर काम मेरे ही हिस्से क्यों’ वाली लाइन अपने आप कम हो जाएगी।”
थोड़ी देर पहले तक जो कड़वाहट जमा हो रही थी,
वह धीरे-धीरे पिघलने लगी।
तृषा प्लेट उठाते हुए बोली,
“मम्मी, आज आपके पास टाइम होगा न?
आप नाच दिखाएंगे? स्कूल के लिए प्रैक्टिस करनी है।”
सान्या कुर्सी पर बैठ गई।
कमर अभी भी दुख रही थी,
पर मन को कुछ राहत थी।
“आज नाच नहीं, आज हम स्टोरी सुनेंगे।
जो नाच तुम दिखाना चाहती हो, पहले वो मुझे दिखाओ।”
खाना खाते-खाते तृषा अचानक बोल पड़ी,
“मम्मी, आज स्कूल में किसी ने आपके बारे में बात की थी।”
“मेरे बारे में?”
“हाँ, जब मैं वॉशरूम से लौट रही थी, तो मैं स्टाफ़ रूम के दरवाज़े के पास से गुजर रही थी।
तभी एक आंटी बोल रही थीं—
‘सान्या तो पागल है, इतना काम खुद पर लाद लेती है, फिर रोती है कि कोई कद्र नहीं करता।’
मुझे बहुत गुस्सा आया, मैं अंदर जाकर बोलना चाहती थी कि मेरी मम्मी आपके लिए नहीं, अपने काम के लिए मेहनत करती हैं।
पर मैं चुपचाप आगे बढ़ गई।”
सान्या को जैसे किसी ने आईना दिखा दिया।
वह खुद ही अपने पर इतना बोझ डाल रही थी,
कि लोग उसके समर्पण को स्वाभाविक मान बैठे थे,
अक्लमंदी नहीं, ‘पागलपन’ कहने लगे थे।
अभिषेक ने तृषा की तरफ देखा,
“तू अंदर चली जाती तो बोल क्या देती?”
तृषा ने मासूमियत से कहा,
“मैं कहती—‘आप लोगों को तो मेरे घर आना चाहिए,
देखना मेरी मम्मी कैसे रात में भी कॉपी चेक करती रहती हैं।
पर अब से मैं उन्हें इतना काम नहीं करने दूँगी।
उन्हें मेरे साथ गेम भी खेलना है, स्टोरी भी पढ़नी है।’”
तीनों एक साथ हँस पड़े।
अगले दिन स्कूल पहुँची तो माहौल थोड़ा अलग था।
स्टाफ़ रूम में दो-तीन टीचर्स चाय पर चर्चा कर रही थीं—
“कल तो बहुत थक गई होंगी न, सान्या?
सुना है पूरे डेकोरेशन की जिम्मेदारी तुम्हारे ऊपर थी।”
सान्या चौंकी—
“आपको… पता है?”
रीना बोली,
“हाँ, बच्चों के मुँह से सुना।
वे सब बोल रहे थे—‘सान्या मैम ने खुद हमें डांस सिखाया, कपड़े सिलवाए, सजावट भी करवाई।’
बच्चों की नज़र हमेशा सही होती है।”
इतने में प्रिंसिपल मैडम कमरे में आईं।
“गुड मॉर्निंग, टीचर्स।
कल की इवेंट क्लिप मैंने रात में घर पर तीन बार देखी।
बहुत अच्छा कार्यक्रम हुआ।
एक बात और महसूस हुई—
कुछ चेहरों का नाम भले ही माइक पर सुनाई न दे,
पर स्क्रीन पर काम सिर्फ उन्हीं का दिखता है।
आज असेंबली में मैं एक छोटी सी एनाउंसमेंट करूँगी।”
असेंबली में बच्चों की लाइनें लगी थीं।
सारे टीचर्स किनारों पर खड़े थे।
प्रिंसिपल ने मंच पर आकर कहा—
“बच्चों, कल के कार्यक्रम की चर्चा तो आप सब कर ही रहे हैं।
हमारे स्कूल के सांस्कृतिक विभाग की हेड, वंदना मैम, वर्षों से ये जिम्मेदारी निभा रही हैं,
इसके लिए वे बधाई की पात्र हैं।
लेकिन मैं आज एक और नाम लेना चाहती हूँ,
जो कल परदे के पीछे लगातार दौड़ती रही—
स्टेज की धूल साफ़ करने से लेकर,
बच्चों के टूटे प्रॉप्स ठीक कराने तक।
आइए, हम सब साथ मिलकर
सान्या मैम के लिए ताली बजाएँ।”
एक पल को सन्नाटा रहा,
फिर पूरे मैदान में ताली की आवाज गूँज गई।
सान्या की आँखें भर आईं।
बगल में खड़ी वंदना मैम ने धीरे से कहा,
“कल मैं जल्दी घर चली गई,
तुम देर रात तक बच्चों के साथ लगी रहीं।
मेरे मन में भी खटक रहा था
कि तुम्हारा नाम नहीं लिया गया।
कल रात मैं ने ही मैम को मैसेज किया था।
कई बार हम खुद भी रनिंग में भूल जाते हैं,
कौन कितना कर रहा है।
अब से मैं ध्यान रखूँगी कि काम बांटकर हो,
ताकि तू भी इंसान बनी रहे, मशीन नहीं।”
सान्या ने पहली बार वंदना की तरफ बिना जलन के देखा।
शायद माँ सही कहती थी—
ऊपर बैठे लोग भी कभी-कभी वही गलती कर जाते हैं
जो उनसे पहले वाले कर गए थे।
फर्क केवल इस बात से पड़ता है
कि गलती समझ आने पर कोई उसे सुधारने की कोशिश करता है या नहीं।
दोपहर की मीटिंग में
प्रिंसिपल ने अगले सत्र की कमिटी लिस्ट निकाली।
“इस बार सांस्कृतिक विभाग में एक बदलाव करेंगे,”
उन्होंने कहा,
“वंदना जी हेड रहेंगी,
और उनके साथ को-कोऑर्डिनेटर होंगी—सान्या।”
कुछ लोग फुसफुसाए—
“लो, अब तो और काम लाद दिया।”
पर सान्या के मन में इस बार थोड़ी स्पष्टता थी।
उसकी आँखों में डर नहीं, संतुलन की इच्छा थी।
मीटिंग के बाद उसने खुद ही कहा,
“मैम, एक रिक्वेस्ट है।”
“हाँ, बोलो।”
“इस बार हर बड़े कार्यक्रम के लिए
काम को टीम में बांट दिया जाए—
जैसे डेकोरेशन टीम, चाइल्ड कोऑर्डिनेशन टीम, गेस्ट टीम…
हर टीम की अपनी लीड हो,
ताकि अकेले किसी एक पर पूरा बोझ न आये।
और हर लीड का नाम बच्चों और स्टाफ़ के सामने लिया भी जाए।”
प्रिंसिपल मुस्कुराईं,
“बहुत अच्छा सुझाव है, सान्या।
लगता है, तुमने कल की रात सिर्फ दवा नहीं खाई,
कुछ समझ भी खाई है।”
सभी हँस पड़े।
हँसी में हल्का-सा अपनापन भी घुल गया था।
शाम को घर लौटकर सान्या बालकनी में बैठी थी।
तृषा उसके पास चिपक कर बैठ गई।
“मम्मी, कल आप इतनी उदास थीं, आज इतनी खुश क्यों हैं?”
सान्या ने उसकी नाक पर हल्की सी चुटकी ली,
“क्योंकि आज मैंने दो चीजें सीखी हैं, मैडम जी।”
“कौन-सी?”
“पहली—
हर अच्छे काम का क्रेडिट मिलना ज़रूरी नहीं,
पर अगर हम खुद ही अपने आप को ‘पीछे पर्दे की धूल’ समझने लगे,
तो कोई हमें आगे लाने की ज़हमत नहीं उठाएगा।
दूसरी—
काम इतना ही करना चाहिए
जितना शरीर और मन इजाजत दे।
किसी की वाहवाही के लिए
अपना स्वास्थ्य दाँव पर नहीं लगाना चाहिए।
और तीसरी…”
“अरे, अभी तो दो बोलीं आपने!”
तृषा खिलखिला उठी।
“तीसरी एक्स्ट्रा टिप है—
अपनी बेटी और माँ जैसी दो औरतों की बात
कभी हल्के में नहीं लेनी चाहिए,”
सान्या ने हँसते हुए कहा।
अभिषेक भी चाय लेकर आ गया।
“और चौथी?” उसने मज़ाक में पूछा।
“चौथी ये कि
जब पति रोटी बना सकता है,
तो दुनिया की कोई ताकत मुझे
हर शाम रसोई में झोंक नहीं सकती,”
सान्या ने आंख मारते हुए कहा।
तीनों की हँसी में
कहीं न कहीं एक भारी बोझ हल्का हो चुका था।
सान्या ने आसमान की तरफ देखा।
हल्की गुलाबी होती शाम में बादल धीरे-धीरे तैर रहे थे।
उसने मन ही मन सोचा—
“शायद सवाल ये नहीं कि
‘मेरे साथ ही ऐसा क्यों होता है।’
सवाल ये है कि
मैं कब अपना हिस्सा बदलने की शुरुआत करती हूँ।
आज से, मैं
ना खुद के काम पर शर्म करूँगी,
ना खुद के आराम पर।”
और यह सोचकर उसने
अपने भीतर छोटे-से गर्व को
धीरे से मुस्कान में बदलने दिया।
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