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बन्द दरवाज़े का दर्द

 ठक ठक ठक....

उसे रह रह कर उस दरवाज़े के पीछे से ये आवाज़ आती थी... कभी धीरे,...जैसे कोई दस्तक दे रहा हो, कभी तेज़...जैसे कोई बैचेनी से दरवाज़े पर घूँसे मार रहा हो...या अपना सर पटक रहा हो...ऐसा तो तब होता था जब उसकी माँ जिंदा थी, वो ही यूँ दरवाज़े को बजाया करती थी...पर माँ को मरे तो एक महीना बीत चुका था।

उसने कई बार अपनी बीवी से भी पूछा कि ये ठक ठक की आवाज़ उसे भी सुनाई दे रही है क्या...पर उसने इनकार कर दिया। तो फिर आखिर कौन उस कमरे के बन्द दरवाज़े पर इतनी बेचैन दस्तकें दे रहा है??? सोच सोच कर उसका सर फटा जा रहा था।

उसे लगा कि उसे अपनी माँ की वो दरवाज़ा खटखटाने की आवाज़ की आदत हो चुकी थी.... इसलिए शायद उसे अब भी वहम होता था कि कोई दरवाज़ा खटखटा रहा है। उसने इन विचारों को झटक कर सोने की कोशिश करने लगा। करवट बदली तो माँ सिरहाने बैठी थी। उसने आँखें मल कर दोबारा देखा...हाँ! माँ ही थी।

तभी माँ ने उसका हाथ पकड़ा और उसे कहीं ले जाने लगी। वो भी चल दिया माँ के पीछे पीछे...। अरे ये क्या! माँ तो उसे अपने कमरे में ले आई, जहाँ उसने ज़िंदगी के आख़िरी दिन बिताए थे। वो कमरे में नज़रें घुमा रहा था कि माँ उसे बिस्तर पर लेटी दिखाई दी। उस कमरे में एक चौकोर मेज़ पर एक बर्नर वाला गैस का चूल्हा रखा था। उसके आसपास दो चार ज़रूरत भर के पकाने व खाने के बर्तन रखे थे। बगल में दीवार पर छोटी सी लकड़ी की ब्रेकेट पर चाय- चीनी व मसाले के गिने चुने डिब्बे रखे थे। उस टेबल के साइड में एक कूड़ेदान था जिसमें पड़े सब्जियों के छिलकों पर मक्खियाँ भिनभिना रही थीं।

वहीं पास में फोल्डिंग पलंग, जिसकी निवाड़ ढीली हो चुकी थी, उस पर माँ के पहनने ओढ़ने के कपड़े गड्ड मड्ड हुए पड़े थे। उत्सुकता वश कमरे से सटे गुसलखाने की ओर उसके कदम बढ़े तो वहाँ भी बेतरतीबी पसरी हुई थी। साठ वॉट के बल्ब की पीली रोशनी में वो कमरा बीमार सा लग रहा था।

पर बड़ी हैरानी की बात थी कि माँ के सिरहाने रखी तिपाई पर उसके बचपन की तस्वीर काँच के फ्रेम में जड़ी हुई रखी थी, जो बिल्कुल साफ़ सुथरी थी।

ज़रा देर में ही उस कमरे में उसका जी घबराने लगा। अजब घुटन सी होने लगी...जैसे उस कोठरी नुमा कमरे की दीवारें और छत धीरे धीरे करीब आ कर उसे पीस ही डालेंगी।

"उफ़्फ़.... माँ! तुम कैसे रहती हो यहाँ?" वो चिल्लाया...

"क्या करूँ बेटा!  तूने और तेरी पत्नी ने मुझे यहाँ रहने को मजबूर किया है...जो घुटन तुझे कुछ पलों में महसूस हो रही है, वो मैंने रोज़ हर पल छः महीनों तक झेली है। मैं हर पल ये दुआ करती थी कि मुझे मौत आ जाए...उस घबराहट में मैं कमरे का दरवाज़ा बजाती थी, पर तुममें से कोई नहीं सुनता था।" वो हैरानी से माँ को देखने लगा , जो जाने कब उसके इतने पास आ कर खड़ी हो गई थी।

"पर माँ काम वाली तो यहाँ तुम्हारी देखभाल के लिए आती थी न?"

"हम्म...काम वाली...दिन में एक बार आती थी और वो भी कहाँ मेरी सुनती थी...बिल्कुल मन उतारू काम घसीट कर चली जाती थी। उसी बखत शाम की भी दो रोटी बनाकर रख जाती थी जो बासी होने पर मेरे हलक से नीचे ही नहीं उतरती थीं। कई बार तुम्हारे घर से तरह तरह के पकवान बनने की खुशबू आती थी जिससे मेरा मन उन्हें खाने को उतावला हो जाता था। तब मैं ज़ोर ज़ोर से दरवाज़ा बजाती थी..."

"माँ... "वो भरे गले से बोला।

"हाँ बेटा...और एक ऐसी ही तड़पन भरी रात में मुझे मौत ने गले लगा लिया...जब दोपहर को कामवाली ने मुझे मरा हुआ पाया तब तुम लोगों तक ख़बर पहुँची। मैं अपनी आखिरी सांस में तुझे एक बार देख लेना चाहती थी पर तू इतना करीब हो कर भी मुझसे न मिल सका, बीच मे ये दरवाज़ा जो था।

"ओह माँ... तुम्हारे इस दर्द का मुझे अंदाज़ा नहीं था। मुझे माफ़ कर दो ...पर ये तो बताओ, मेरी बचपन की फोटो इतनी साफ़ कैसे है, जबकि और सब तो यहाँ गन्दा है?"

"मेरे लाल! मैं एक बार को राम का नाम लेना भूल सकती थी, पर तेरी फोटो को रोज़ अपने आँचल से साफ़ करती थी और उसे सीने से लगा कर चूमती थी...और रही बात माफ़ करने की, तो माँ बाप कभी औलाद से नाराज़ नहीं होते ...तुझे तो मैंने कब का माफ़ कर दिया। पर मुझे अभी तक मुक्ति नहीं मिली।" माँ के स्वर में उदासी थी।

"बताओ माँ!  कौन सा हवन पूजा पाठ करूँ जो तुम्हें मुक्ति मिल जाये?" उसने तड़प कर पूछा

"बेटा! तू बस इस कमरे का दरवाज़ा खोल दे...मेरा शरीर तो समाप्त हो गया पर मेरी रूह अभी भी इस कमरे में कैद है... कैद है... कैद है..."

ये शब्द कानों में पड़ते ही जैसे उसे होश आया...वो झटके से उठ बैठा...ये क्या!! वो तो अपने कमरे में, अपने बिस्तर पर है?? उसके दिमाग को झटका सा लगा...उसने आसपास माँ को ढूंढने को नज़र दौड़ाई...पर माँ यहाँ कहाँ थी...तो...?? ये सपना था... माँ उससे सपने में मिलने आई थी? पर उसे तो लगा जैसे वो सचमुच माँ से मिला। वो पसीने से तरबतर हो चुका था।

*********

अगली सुबह उसने उठ कर सबसे पहले उस कमरे का दरवाज़ा खोला, जहाँ माँ अपने आखिरी दिनों में रही। दरवाज़ा खोलते ही हवा का एक झोंका उसके शरीर को स्पर्श करते हुए गया। वो कुछ देर उस झोंके की ठंडक  को महसूस करता खड़ा रहा। आज उसे बड़ा सुकून मिल रहा था।

उस दिन के बाद फिर कभी उसे उस बन्द दरवाज़े के पीछे से दस्तक सुनाई नहीं पड़ी।


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