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सफेद कपड़े पर दाग जल्दी लगता है।

 "मम्मी तुम थोड़ी सी देर सखी को संभालो मैं चेंज करके 2 मिनट में आई फिर उसको दूध पिला कर सुला देती हूं यह भी थक गई होगी।"

             "ठीक है जल्दी से जा और फटाफट से वापस आ.......  यह ज्यादा देर बैठने वाली नहीं है मेरे पास।"  मेरी गोद से सखी को अपनी गोद में लेते हुए मम्मी ने कहा।

            सखी को मम्मी को पकड़ा कर मैं फटाफट रूम में आ गई थी ताकि कपड़े बदल कर फ्रेश हो पाऊं लेकिन दिमाग में कुछ और ही चल रहा था। दरअसल आज 5 साल बाद मेरी मुलाकात मेरी ताऊ जी की बेटी रीना से हुई जब पिछली बार वह मुझे मिली थी तब वह मां बनने वाली थी। कुछ समय बाद पता चला कि उन्हें पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई है और आज जब इतने समय बाद उनसे मुलाकात हुई तो उनके बेटे को देखकर मैं हैरान रह गई क्योंकि उनके बेटे का वजन बहुत ज्यादा है अपनी उम्र के हिसाब से लगभग 3 गुना।  शरीर भारी होने के कारण बच्चा ना तो दूसरे बच्चों के साथ खेल कूद कर रहा था, ना ही डांस कर पा रहा था पूरे फंक्शन में एक ही जगह बैठा था देखकर बहुत दुख हुआ मन में अभी यह सब कुछ चल ही रहा था कि सखी के रोने की आवाज से मेरी तंद्रा टूट गई। साड़ी समेट रही थी लेकिन उसे वहीं छोड़ सखी गोद में उठा लिया और उसे सुलाने लगी इतने में मम्मी भी दूध का गिलास लेकर आ गई।

         "मम्मी..... एक बात बताओ....? रीना दीदी का बेटा कुछ अलग नहीं है मतलब वजन बहुत ज्यादा है जिसकी वजह से वह केवल एक ही जगह पर बैठा रहता है खेलकूद मस्ती डांस कुछ भी नहीं कर पाता है......... ऐसे तो वह बहुत परेशान हो जाता होगा.....?"

          "हां बेटा.......  खुद भी परेशान रहता है और रीना को भी परेशान करता है........  उससे तो उठा भी नहीं जाता है खेलना कूदना तो दूर की बात है। बस बेटा कहते हैं ना "अति सर्वत्र वर्जियेत" यह उसी का परिणाम है।"

           "मतलब........?"

           "तू तो जानती है.........  शादी के 13 साल बाद भी रीना की गोद सुनी ही थी.........  फिर काफी ट्रीटमेंट के बाद इस विवान का जन्म हुआ।   उसके जन्म के बाद रीना बहुत ज्यादा खुश थी और हर तरीके से अपने बच्चे का ख्याल रखती थी लेकिन बच्चे का ख्याल रखते हुए वह यह भूल गई कि बच्चे का मन ही नहीं तन भी कोरा कागज ही होता है और उसे हम जिस तरीके से रखते हैं आगे जाकर वह वैसा ही हो जाता है। छोटे से बच्चे का वह बहुत ज्यादा ख्याल रखती थी और यह प्यार और खयाल धीरे-धीरे हद से ज्यादा बढ़ता चला गया जिसकी वजह से बच्चे को कहीं ना कहीं नुकसान होने लगा।"

          "मैं समझ नहीं रही हूं मम्मी...........  एक मां अपने बच्चे का नुकसान कैसे कर सकती है....?"

          "बेटा कहते हैं कि कोई भी चीज जब हद से ज्यादा होती है तो हमेशा नुकसान ही करती है फिर चाहे वह किसी के प्रति अत्यंत प्रेम ही क्यों ना हो..........  यही हो रहा था रीना के साथ।  वह अपने बच्चे को फर्श पर खेलने नहीं देती थी उसे लगता था कि फर्श के कीटाणु उसके बच्चे को नुकसान पहुंचाएंगे जबकि ऐसा कुछ भी नहीं होता है घर को साफ सुथरा रखिए तो बच्चा आराम से फर्श पर खेल सकते हैं लेकिन वह किसी की बात नहीं सुनती थी। बच्ची को धूप में नहीं निकलने देती थी कहती थी कि स्किन खराब हो जाएगी बाहर मिट्टी में तो कभी उसने बच्चे को खेलने दिया ही नहीं। हमेशा सॉक्स और शूज पहने हुए ही रखती थी। जिस वजह से बच्चे ने प्रकृति का तो आनंद लिया ही नहीं और आज जब वह बाहर के माहौल में जाता है तो उसे मिट्टी से एलर्जी हो जाती है।"

        "तुम जानती हो जब पहली बार विवान को लेकर आई थी.........  तब केवल 8 महीने का था.......... और उस छोटे से बच्चे को रीना तरह-तरह की दवाइयां और घरेलू फाकी  देती थी। जब मैंने पूछा तो कहने लगी कि "यह तो ताकत की दवाई है........ यह काजू बादाम और पिस्ते का पेस्ट है...... अखरोट की गिरी है....... और यह पेट सही रहे अपच ना हो उसके लिए फाकी है।" और जानती हो यह सारी चीज़ें वह उसे एक के बाद एक देती थी और यह वह रोज सुबह शाम करती थी जिसकी वजह से बच्चा तंदुरुस्त हुआ लेकिन कुछ ज्यादा ही हो तंदुरुस्त हो गया अब उसका हाजमा इस तरीके का हो गया है कि जब तक वह अपनी रेगुलर डाइट के साथ  खाना हजम करने के लिए दवाई नहीं लेता उसे खाना हजम नहीं होता है क्योंकि उसके शरीर को यह आदत लग चुकी है।"

         "वाह मम्मी...........  यह तो पहली बार सुना है कि मोह में पढ़कर किसी मां ने अपने ही बच्चे का नुकसान कर लिया। मोह इतना भी नहीं होना चाहिए कि आप सही और गलत का फर्क करना भी भूल जाए। दीदी ने मोह में पढ़कर अपने बेटे के लिए इतना सब कुछ किया। जिसने जो सलाह दी उसे वह खिलाया पिलाया लेकिन क्या कितना और कब देना है यह सब कुछ देखना एक मां की जिम्मेदारी होता है सब की सारी सलाह एक साथ मान लेना तो बेवकूफी हुई ना और उनकी इस बेवकूफी की सजा वह बच्चा भी भुगत रहा है।"

         "हां बेटा और वैसे भी जब एक बच्चा जन्म लेता है तो उसे प्यार की और केयर की जरूरत होती है लेकिन इतनी भी नहीं कि वह कभी बाहर के माहौल में........प्राकृतिक माहौल में सामान्य रुप से जी ना सके। एक साधारण सा उदाहरण है  सफेद कपड़े पर दाग जल्दी दिखता है और मटमैले कपड़े पर दाग जल्दी से नहीं दिखता है क्योंकि वह पहले से ही थोड़ा मैला होता है इसी तरीके से हमारा शरीर भी है अगर हम शुरू से ही इसकी बहुत ज्यादा केयर करेंगे तो जरा सी सर्दी जुखाम होने पर भी हमारा शरीर कमजोर पड़ जाएगा और साथ ही साथ हमारा आत्मबल भी कमजोर पड़ जाएगा। लेकिन यदि हमने शुरू से ही अपने शरीर को मजबूत बना दिया है तो फिर छोटी मोटी बीमारी या इंजेक्शन हमारे शरीर को किसी भी तरीके से नुकसान नहीं पहुंचा सकती है........  इसलिए पुराने समय में बच्चों को मिट्टी में खेलने दिया जाता था छोटी मोटी चोट लगने पर तो मां सिर्फ प्यार से हाथ फेर देती थी......... और बच्चे वापस खेलने चले जाते थे।  लेकिन आजकल जरा सी चोट लगने पर उन्हें बैंडेज और मरहम पट्टी की जरूरत पड़ जाती है जिससे उनके शरीर को इस सब की आदत पड़ जाती है और शरीर उसी तरीके का हो जाता है। तुम्हें याद है उस दिन जब सखी गिर गई थी तो मैं तालियां बजाने लग गई थी और उससे कहा कि "देखो फर्श टूट गया फर्श टूट गया" इससे हुआ यह कि सखी का ध्यान दूसरी तरफ चला गया।  वह खुद भी मेरे साथ तालियां बजाने लग गई वह यह भूल गई कि उसे चोट भी लगी थी लेकिन यदि उस समय में उसकी चोट की तरफ ज्यादा ध्यान देती तो उसे भी ज्यादा ही दर्द महसूस होता........समझी.......?  इसीलिए कहती हूं की थोड़ा सा बच्चों को गिरने दो...... चोट लगने दो...... तभी बच्चे मजबूत होंगे और.......... एक्स्ट्रा केयर का परिणाम तो तुम देखी चुकी हो।"

         "बिल्कुल सही कह रही हो मम्मी......... अब मैं भी इन सब बातों का ध्यान रखूंगी।"

धन्यवाद

रुचिका खत्री


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