रात के डेढ़ बजे थे।
मीरा अचानक हड़बड़ाकर उठ बैठी।
“करण… करण… उठो ज़रा…” उसने धीरे से पति को झकझोरा।
“हम्म… क्या हुआ?” करण ने उनींदी आँखें मलते हुए कहा।
“माँ दिख नहीं रही हैं अपनी खाट पर…” मीरा ने डरते हुए कहा, “सोफ़े के पास जो पलंग लगाया था न… खाली है। इतनी रात को कहाँ गई होंगी? कोई दरवाज़ा तो नहीं खुला था…”
अब करण पूरी तरह जाग गया। वह तेजी से उठा और बाहर हॉल में आया।
टीवी बंद था, पंखा घूम रहा था, पर दीवान खाली था जहाँ से कुछ दिन पहले ही उन्होंने माँ की चारपाई खिसकाकर अपने कमरे के दरवाज़े के पास रख दी थी।
“अरे… सच में माँ यहाँ नहीं हैं…” करण की नींद एकदम उड़ गई।
“मीरा, तू किचन देख, मैं बालकनी और बाथरूम देखता हूँ।”
दोनों उल्टे-सीधे कदमों से अलग-अलग दिशा में भागे।
किचन खाली। गैस बंद।
बालकनी में सिर्फ सूखते कपड़े हवा में हल्के हिल रहे थे।
बाथरूम भी खाली।
“करण… कहीं बाहर तो नहीं चली गईं?” मीरा की आवाज़ काँप रही थी।
“इस वक़्त? और वो भी बिना आवाज़ के? नहीं… चल, ड्राइंग रूम के पीछे वाला स्टोर रूम देख लेते हैं।” करण ने कहा।
स्टोर रूम वाली तरफ़ से बहुत हल्की-सी आवाज़ आ रही थी—जैसे किसी पुराने टेप रिकॉर्डर की सरसराहट, और किसी बहुत जानी-पहचानी आवाज़ की धीमी गूँज… पर शब्द साफ़ सुनाई नहीं दे रहे थे।
मीरा ने फुसफुसाकर कहा, “ये कैसी आवाज़ है? तुम्हें भी आ रही है?”
करण ठिठक गया। “हाँ… टेप जैसा कुछ… लेकिन उस कमरे की चाबी तो मेरे पास है न… माँ को तो नहीं पता कहाँ रखी होती है…”
दोनों धीरे-धीरे आगे बढ़े।
दरवाज़ा थोड़ा खुला हुआ था; अंदर से हल्की ट्यूब लाइट की पीली रोशनी बाहर झाँक रही थी।
करण ने मीरा को इशारे से चुप रहने को कहा।
दोनों दरार से भीतर झाँकने लगे।
साठ साल की सावित्री वहाँ जमीन पर चटाई पर बैठी थीं। सामने एक पुराना कसोट वाला टेप रिकॉर्डर रखा था, जिसके ऊपर धूल जमी थी लेकिन आज उसे साफ़ कर दिया गया था।
टेप घूम रही थी, और उससे एक पुरुष आवाज़ निकल रही थी—
“सुनो सावित्री, अगर तुम ये आवाज़ सुन रही हो, तो समझ लेना तुम्हारा हरीश कहीं दूर शहर में भी तुम्हें याद कर रहा है…”
करीब-करीब बीस साल पहले रिकार्ड की गई आवाज़… लेकिन अभी भी ताज़ा लग रही थी।
सावित्री दोनों हाथों से घुटने पकड़े आधी झुकी बैठी थीं, जैसे उस आवाज़ के और करीब होना चाहती हों।
उनकी आँखों से आँसू बह रहे थे, होंठ काँप रहे थे, और वे धीरे-धीरे जवाब दे रही थीं—
“मैं सुन रही हूँ हरीश… तू तो चला गया… लेकिन तेरी आवाज़ अभी भी यहीं कहीं दीवारों में अटकी है… इन टेपों में कैद है…”
करण के कदम वहीं जम गए।
मीरा की आँखें भी नम हो गईं।
सावित्री फिर बोल उठीं, जैसे अपने पति से बात कर रही हों—
“तुझे अस्पताल में कितनी बार कहा था मैंने… अपनी आवाज़ रिकॉर्ड कर दे… तू हँस के टाल देता था… कहता था ‘अरे मैं कहीं जा रहा हूँ क्या?’
देख, वो दो टेप जो तूने मज़ाक-मज़ाक में रिकॉर्ड किए थे… आज वही मेरा सहारा हैं, हरीश…”
उन्होंने टेप रोककर रिवाइंड किया, फिर से वही हिस्सा सुनने लगीं, जहाँ आवाज़ थोड़ी ऊँची हो जाती—
“मेरी हँसी पहचानोगी न तुम?”
सावित्री हल्की सी हँसी और रोने के बीच की आवाज़ में बोलीं—
“ये हँसी ही तो याद आती है दिन भर… सुबह चाय बनाती हूँ तो लगता है तू कहेगा, ‘शक्कर थोड़ी कम डालना आज, मीठा ज़्यादा हो गया पिछली बार’…
लेकिन हर कप खाली रह जाता है… दो कप की आदत थी न… अकेले एक कप पीना अभी भी नहीं सीखा मुझसे…”
मीरा ने करवट बदलकर करण की तरफ़ देखा।
करण की आँखें भी भर आई थीं।
“करण… माँ तो… अकेले रो रही हैं यहाँ…” मीरा ने फुसफुसाते हुए कहा।
“रुक, थोड़ा सुनने दे…” करण ने धीमे से कहा। वह माँ के दिल की गहराई समझना चाहता था, इससे पहले कि भीतर जाए।
अब सावित्री धीरे-धीरे बोल रही थीं—
“बच्चे कहते हैं माँ, हम हैं ना… हैं तो सही… पर वो तेरा साथ… तेरा एक-एक शब्द… तेरी आदतें… किससे बाँटूँ मैं?
आज तू होता न तो मैं तेरे हाथ से गरम रोटी छीन लेती… तू झल्लाकर कहता ‘अरे ज़रा तो ठंडी होने दे…’ और फिर खुद हँस पड़ता…”
उन्होंने अपना सिर दीवार से टिकाया और आँखें बंद कर लीं।
“हरीश, तूने ही तो सिखाया था कि शादी बस सात फेरों का नाम नहीं… बुढ़ापे तक साथ निभाने का वादा है।
अब देख, तू आधे रास्ते में ही छोड़कर चला गया… बाकी का रास्ता मैं अकेले चल रही हूँ… तेरी आवाज़ पकड़ कर…”
मीरा की साँसें भारी होने लगीं।
आख़िर उसने धीरे से कहा—
“करण, अब चलो अंदर… माँ को लगेगा हम चोरी-छिपे सुन रहे थे…”
दोनों ने धीरे से दरवाज़ा और खोल दिया।
हल्की सी चरमराहट की आवाज़ हुई तो सावित्री चौकन्नी हो गईं।
उन्होंने तुरंत टेप रोक दिया, कागज़, पुराने फोटो और कैसेट्स समेटकर पास पड़े लोहे के ट्रंक में ठूँस दिए और ढक्कन जोर से बंद कर दिया।
“तुम लोग… यहाँ क्या कर रहे हो?” उनकी आवाज़ अचानक कठोर हो गई।
“माँ, हम… हम आपको बिस्तर पर नहीं देख पाए, तो घबरा गए…” करण ने संकोच से कहा, “सोचा… कहीं तबीयत…”
“तबीयत? मेरी तबीयत से क्या फर्क पड़ता है तुम्हें?” सावित्री का ग़ुस्सा उनके टूटे दिल का कवच था।
“मर गई तो सुबह देख लेना… इतनी रात को क्यों परेशान हो रहे हो?”
मीरा ने झट से आगे बढ़कर उनका हाथ पकड़ लिया।
“ऐसा मत कहिए माँ। आप ऐसा बोलती हैं तो… हमें डर लगता है…”
सावित्री ने हाथ छुड़ाने की कोशिश की, पर मीरा ने कसकर पकड़े रखा।
करण की नज़र ट्रंक पर पड़ी।
“माँ… ये वही टेप हैं न, जो पापा रिकॉर्ड किया करते थे? आपने तो कभी हमें बताए ही नहीं कि आपने इन्हें संभालकर रखा है…”
“तुम्हें क्या करना है इन पुरानी चीज़ों से?” सावित्री की आवाज़ अब भर्रा रही थी।
करण नीचे बैठ गया।
“माँ, आपने सोचा भी कैसे कि आप अकेले यहाँ आएँगी… ये सीढ़ियाँ फिसलन भरी हैं… कहीं गिर गईं तो?”
“गिर गई तो अच्छा… काम खत्म…” सावित्री के मुँह से निकला, पर तुरंत ही उनकी आँखों में पछतावा तैर गया।
“मेरा मतलब… तुम लोग सो रहे थे… मैं किसी को परेशान नहीं करना चाहती थी…”
मीरा ने प्यार से उनकी पीठ सहलाई।
“परेशान तो हम तब होते अगर सच में आप हमें छोड़कर चली जातीं…”
करण ने धीरे-से ट्रंक के किनारे हाथ रखकर पूछा—
“माँ… क्या हम… पापा की आवाज़ सुन सकते हैं? कभी… आपके साथ बैठकर?”
सावित्री की आँखें भर आईं।
उनका पत्थर-सा सख्त चेहरा नरम मोम की तरह पिघलने लगा।
“क्या करोगे सुनकर?
ये तो मेरे दिल की दरारों पर लगी पुरानी पट्टियाँ हैं… छेड़ोगे तो दर्द फिर से रिसने लगेगा…” उन्होंने धीमे से कहा।
मीरा ने टेप उठाकर नाक से लगाया।
“माँ, इसमें तो हल्की-सी चंदन की खुशबू है… आपने लगाई?”
सावित्री हल्का-सा मुस्कुराईं, आँसुओं के बीच से।
“तुम्हारे पापा को चंदन की खुशबू बहुत पसंद थी… शादी के बाद जब पहली बार वे ट्रेन से बाहर गए थे, तो मैंने यही टेप रिकॉर्ड किया था…
तब बाजार से छोटा-सा सस्ता इत्र लायी थी, चंदन वाला… हर कैसेट पर थोड़ा-सा लगा देती थी, ताकि उन्हें भी लगे कि मैं आसपास ही हूँ…”
उन्होंने मीरा के हाथ से टेप वापस लिया, उसे ऐसे सहलाया जैसे किसी बच्चे के सिर पर हाथ फेर रही हों।
“देखो ना, कितना साल हो गया… फिर भी खुशबू बाकी है… जैसे उसका एहसास…”
करण ने बहुत प्यार से कहा—
“माँ, पापा चले गए… ये सच है।
लेकिन आप अकेली नहीं हैं।
आपके हर आँसू का वजन अब हमारे कंधों पर है।
आप रात को ऐसे चुपचाप ऊपर मत आया करें… दिल दहल जाता है हमारा…”
सावित्री चुप हो गईं।
उनके कानों में अभी भी हरिश की आवाज़ गूँज रही थी,
पर अब उस आवाज़ के साथ बेटे की चिंता और बहू की ममता भी जुड़ गई थी।
कुछ देर बाद उन्होंने गहरी साँस ली।
“करण… मीरा… तुम लोग बुरा मत मानना…
बस… कभी-कभी सांस घुटती है कमरे में।
दीवारें चुप रहती हैं… तुम्हारी-तुम्हारी ज़िम्मेदारियाँ हैं…
मुझे लगता है… यहाँ ऊपर आकर इन टेपों के साथ बैठूँगी तो…
थोड़ी देर को लगेगा कि हरीश यहीं कहीं है…”
मीरा ने धीमे से कहा—
“माँ, आप ऊपर आएँ, इसमें कोई दिक्कत नहीं…
पर हमें बता कर आइए।
और ये टेप… ये बक्सा… ये सब हम आपके कमरे में ही रख देते हैं न…
आपको सीढ़ियाँ चढ़ने की ज़रूरत ही नहीं होगी।”
करण ने भी हामी भरी।
“हाँ माँ, मैं कल ही आपके पलंग के पास छोटी-सी मेज़ रख देता हूँ… उस पर टेप रिकॉर्डर, बक्सा, सब रख देंगे।
जब मन करे… आराम से सुन लिया कीजिएगा।
हम वादा करते हैं, आपकी इन यादों में कभी दखल नहीं देंगे…”
सावित्री की आँखों से दो आँसू लुढ़क कर गालों पर बह निकले।
उन्होंने धीरे से मीरा का चेहरा अपनी हथेली में लेकर कहा—
“बहू… तू सच में मेरी बहू नहीं… बेटी है।
मुझे डर था कि तुम लोग कहोगे, ‘पुरानी बातें भूल जाओ’…
लेकिन तुम तो मेरी यादों को जगह दे रहे हो…”
मीरा ने झुककर उनके घुटनों को छू लिया।
“माँ, हम किस होते हैं जो आपकी जिंदगी से कुछ निकालने की कोशिश करें…
पापा आपके लिए क्या थे, हम केवल महसूस करने की कोशिश ही कर सकते हैं।”
करण ने सावित्री को सहारा देकर खड़ा किया।
“चलो माँ, नीचे चलते हैं। फर्श ठंडी है, आपको जुकाम हो जाएगा।
अंदर चलकर पापा की आवाज़ सुनेंगे… लेकिन साथ बैठकर।”
अगले ही दिन सुबह, करण ने स्टोर रूम साफ़ करवा दिया।
पुराने बक्से से टेप, फोटो, डायरी और वह टेप रिकॉर्डर निकालकर बहुत प्यार से साफ़ किया।
फिर माँ के कमरे में उनके सिरहाने के पास छोटी मेज़ लगा दी।
“लो माँ, अब आपका छोटा-सा ‘यादों का कोना’ यहीं है।” करण ने हँसते हुए कहा, “किसी रात नींद न आए, तो बस टेप चलाना… हम पास के कमरे में ही हैं, आवाज़ सुनेंगे तो समझ जाएँगे कि माँ अपने हरीश जी से बातें कर रही हैं।”
मीरा ने सोचा कुछ देर, फिर धीरे से बोली—
“करण, मैंने ऑफिस में बात कर ली है…
मैं अब फुल टाइम नहीं, पार्ट टाइम काम करूँगी।
ज्यादा वक्त घर पर रहूँगी…
माँ के साथ… बच्चों के साथ… तुम्हारे साथ…”
करण ने आश्चर्य से उसकी तरफ़ देखा।
“अरे, पर मीरा… तुम्हारी जॉब तो तुम्हारा सपना था…”
“सपना तो अब भी है,” मीरा ने मुस्कुराकर कहा,
“बस प्राथमिकताएँ बदल गई हैं।
जब मैं खुद बूढ़ी होऊँगी न… तब शायद मुझे भी किसी अपने की ज़रूरत होगी…
अगर आज मैंने अपने ही घर के बुजुर्ग के लिए वक्त नहीं निकाला, तो कल कौन मेरे लिए निकालेगा?”
सावित्री अंदर से सब सुन रही थीं।
उन्होंने बाहर आकर मीरा को गले लगा लिया।
“बहू… मेरी वजह से अपना करियर मत रोक… मैं कितने दिन की मेहमान हूँ…”
मीरा ने उनके कंधे पर सिर रखकर कहा—
“माँ, आप मेहमान नहीं हो… आप ही तो घर हैं।
आपके होने से ही ये घर घर लगता है।”
दिन बीतने लगे।
अब रातों की तस्वीर बदल चुकी थी।
कभी-कभी देर रात मीरा उठकर देखती तो सावित्री अपनी खाट पर बैठी होतीं, टेप रिकॉर्डर धीरे-धीरे बज रहा होता।
हरीश की आवाज़ कमरे में हल्की-हल्की गूँजती—
“अगर तुम हँसी रहोगी, तो मुझे लगेगा मैं ज़िंदा हूँ…”
सावित्री की आँखों में आँसू होते, पर होंठों पर मुस्कान भी होती।
अब वह अकेले नहीं थीं—
उनके दो साथी और थे—
बीता हुआ प्यार, और वर्तमान का अपनापन।
एक रविवार की शाम को करण ने प्रस्ताव रखा—
“माँ, क्यों न आज हम सब मिलकर पापा वाली टेप सुनें?
फिर आप हमें उनके बारे में कहानियाँ सुनाइए… कि कैसे थे वो… कैसे हँसते थे… कैसे डाँटते थे…”
मीरा और बच्चों ने भी हाँ में हाँ मिलाई।
उस शाम पहली बार टेप रिकॉर्डर पूरे घर के बीचोंबीच रखा गया।
टेप चली।
हरीश की पुरानी, परमीठी आवाज़ उभरी—
“सुनो बच्चों, अगर तुम कभी बड़े होकर ये टेप सुनो, तो समझ लेना कि तुम्हारा बाप थोड़ा पगला था, पर तुमसे बहुत प्यार करता था…”
सावित्री हँस पड़ीं, आँसू पोंछते हुए।
“ये उसी दिन की रिकॉर्डिंग है जब करण दस साल का था… पूरे घर में उधम मचा रखा था इसने…”
फिर उन्होंने एक-एक किस्सा सुनाना शुरू किया—
कैसे हरीश पहली बार नौकरी पर देर से लौटे तो पूरा बाज़ार छान मारा था उन्होंने,
कैसे बारिश के दिन वो छत पर नाचते थे,
कैसे सावित्री से छुपकर बच्चों को गोलगप्पे खिलाते थे।
कमरा यादों से भर गया।
टेप की खड़खड़ाहट, बच्चों की खिलखिलाहट, सावित्री की भावुक आवाज़ और मीरा की नम मुस्कान—all मिलकर घर को फिर से पूरा करने लगे।
रात के अंत में, जब सब सोने चले गए, सावित्री ने टेप बंद कर दी।
करीब आकर मेज़ पर रखे फोटो फ्रेम को उठाया—जिसमें हरीश मुस्कुरा रहे थे।
“देखो हरीश… ये बच्चे तुम्हें कितना मिस करते हैं…
तुम चले गए, पर मैंने तुम्हें जाने नहीं दिया।
तुम्हारी आवाज़, तुम्हारी आदतें… तुम्हारी यादें…
सब कुछ इन चार दीवारों के बीच बाँट दूँगी…
शायद मेरे जाते-जाते तक तुम इस घर में जिंदा रहो…”
उन्होंने फोटो को धीरे से मेज़ पर रखा, और बिस्तर पर लेट गईं।
अब उन्हें अकेला अंधेरा नहीं डराता था,
क्योंकि उन्हें पता था—
कमरे के दूसरी तरफ़ बेटे-बहू जागते-जागते भी उनके लिए कान खुले रखते हैं।
अगर कभी देर रात टेप की आवाज़ बंद हो जाती और रोने की धीमी सिसक सुनाई देती,
तो मीरा उठकर पास आ जाती, बिना कुछ कहे बस उनके सिरहाने बैठ जाती।
कभी बस इतना ही कहती—
“माँ, आप रो लीजिए… हम यहीं हैं…”
सावित्री को अब समझ आ गया था कि जीवनसाथी की कमी कोई नहीं भर सकता,
लेकिन बच्चे अपने तरीके से उस खालीपन के चारों तरफ़ प्यार की पट्टियाँ ज़रूर लगा सकते हैं,
ताकि चोट बहुत गहरी न दिखे।
कुछ साल बाद जब सावित्री सच में चली जाएँगी,
तो शायद ये टेप किसी स्टोर रूम में बंद नहीं होंगे—
बल्कि करण के घर के किसी सम्मानित कोने में रखे रहेंगे।
ताकि कभी-कभी मीरा, अपनी सफ़ेद होती चुनरी सँभालते हुए,
टेप चलाकर बच्चों से कह सके—
“सुनो, ये तुम्हारे दादाजी की आवाज़ है…
और ये तुम्हारी परदादी की हँसी…
इनकी कहानी अभी खत्म नहीं हुई…
ये यादें हमारी पीढ़ियों तक चलेंगी…”
और शायद तब कोई बच्चा धीरे से कहे—
“दादी, हमें भी ऐसा ही प्यार करना सिखाइए…”
क्योंकि सच तो यही है—
एक जीवनसाथी का जाना ज़िंदगी में एक गहरी दरार छोड़ देता है,
पर वही दरार किसी दिन बच्चों के लिए खिड़की भी बन जाती है,
जिससे वे समझ पाते हैं कि रिश्तों की असली कीमत क्या होती है।
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