“सब लोग कहाँ हो… ज़रा ड्रॉइंग रूम में तो आओ, मुझे एक बहुत बड़ी खुशख़बरी देनी है!”
कुसुम की आवाज़ पूरे घर में गूँज गई।
रसोई में गैस पर चाय चढ़ाती अनन्या ने चौंककर घड़ी देखी।
“सुबह के ग्यारह बजे ही तो हुए हैं, इतनी जल्दी कौन-सी खुशख़बरी आ गई…” वह बड़बड़ाती हुई बाहर आई।
लॉन से पापा श्यामलाल, ऊपर के कमरे से पति विवेक और मोबाइल पर बात करती हुई ननद नेहा भी हॉल में आ जमा हुए।
“अब बताइए माँ, क्या हुआ?” विवेक ने मुस्कुराकर पूछा।
कुसुम की आँखें चमक रही थीं,
“नेहा का रिश्ता पक्का हो गया है! शर्मा साहब का बेटा अभिषेक… बहुत बड़ा बिज़नेस है उनका, शहर में तीन–तीन शो रूम हैं। आठ दिन पहले जो लोग देखने आए थे, उनकी ही हाँ आ गई है। अब बस धूमधाम से हमारी बिटिया की शादी करनी है!”
नेहा शर्मा अकेडमी के स्टाफ रूम की खिड़की से बाहर झाँकती छोटी बच्ची की तरह शर्मा गई।
श्यामलाल ने खुशी से ताली बजाई,
“वाह, हमारी बेटी की किस्मत खुल गई।”
अनन्या ने भी मुस्कुराकर नेहा को गले लगाया,
“मुबारक हो ननद जी! अब तो घर में जश्न शुरू हो जाएगा।”
घर में कुछ ही मिनटों में योजनाओं की रेलमपेल शुरू हो गई—
“मेहंदी कहाँ रखेंगे,
सगाई का हॉल कौन सा होगा,
कौन-कौन से रिश्तेदार को बुलाना है…”
कुसुम इधर-उधर फेरे लगाती, कभी किचन में, कभी नेहा के कमरे में, कभी फोन पर, खुद को किसी इवेंट मैनेजर से कम नहीं समझ रही थीं।
पर शाम ढलते-ढलते जब उत्साह थोड़ी थकान में बदलने लगा, तो उनके दिमाग में एक और ख्याल ने मजबूती से जगह बना ली।
रात को जब सब लोग खाना खाकर अपने-अपने कमरों में चले गए, तो कुसुम ने धीरे से आवाज़ दी,
“अनन्या, ज़रा मेरे कमरे में आओ बेटा, एक ज़रूरी बात करनी थी।”
अनन्या ने प्लेटें सिंक में रखीं, हाथ पोंछे और सोचते-सोचते सास के कमरे में चली गई।
कुसुम बिस्तर पर बैठी कुछ पुराने फाइलों में कागज़ तलाश रही थीं।
“आओ, दरवाज़ा बंद कर दो।”
अनन्या ने आज उनकी आवाज़ में असामान्य कोमलता महसूस की।
“जी मम्मीजी?”
“देखो बेटा,” कुसुम ने बात शुरू की,
“तुम जानती हो ना, हमारे यहाँ कोई बहुत बड़े–बड़े पैसे नहीं हैं। नेहा की शादी धूमधाम से करनी है, वरना लोग क्या कहेंगे कि बेटा तो इंजीनियर है, बहू अच्छी कंपनी में जॉब करती है, और बहन की शादी फुस्स कर दी!”
अनन्या ने कुछ नहीं कहा, बस चुपचाप उनके चेहरे की तरफ़ देखती रही।
कुसुम ने फाइल से एक कागज़ निकालकर कहा,
“ये जो छोटा-सा फ्लैट है जो तेरे नाम पे है… तेरी मम्मी ने लिया था न तेरे लिए, शादी से पहले? वो वाली सोसाइटी में… क्या नाम है उसका… हाँ, ग्रीन व्यू अपार्टमेंट।”
अनन्या का दिल हल्का-सा धक से हुआ।
वही फ्लैट—जहाँ उसने माँ के साथ चार साल गुज़ारे थे।
जहाँ हर दीवार पर उनकी हँसी की गूँज उसे आज भी सुनाई देती थी।
माँ के गुजर जाने के बाद वही तो उसके मायके की आख़िरी निशानी था।
“जी… पर… उसके बारे में?”
कुसुम ने सहजता से कहा,
“मैं सोच रही थी, अगर वो फ्लैट बेच दिया जाए तो नेहा की शादी बड़े आराम से हो जाएगी। दहेज नहीं देंगे, पर कुछ अच्छा–सा फर्नीचर, जूलरी, कार—ये सब तो करना ही होगा न? राकेश (श्यामलाल) भी टेंशन में रहते हैं, उनकी नौकरी में इतना कहाँ… विवेक तो घर के खर्च उठा ही रहा है। तू नौकरी करती है, घर भी संभालती है, देखो अगर तू ये त्याग कर दे तो तेरी ननद की ज़िंदगी सवार जाएगी। आखिर एक ही तो बहन है तेरी।”
अनन्या के सिर में जैसे किसी ने हथौड़ा मार दिया हो।
वह कुछ पल के लिए बिल्कुल चुप रह गई।
फिर धीमे स्वर में बोली,
“मम्मीजी, वो फ्लैट… मेरे लिए बस एक ‘प्रॉपर्टी’ नहीं है। वो मेरी माँ की आख़िरी निशानी है। उन्होंने अपने हाथों से हर चीज़ चुनी थी वहाँ की। उनके जाने के बाद मैंने वहाँ महीनों अकेले काटे हैं… जब भी मुझे उनकी याद आती है, मैं वहाँ जाकर कुछ देर बैठ आती हूँ। वो जगह… मुझे माँ के पास सा महसूस कराती है।”
कुसुम ने उखड़ते हुए स्वर में कहा,
“तो क्या हुआ? याद तो दिल में भी रहती है, दीवारों से थोड़ी ना बंधी होती है! लोग बेटियों की शादी में खेत बेच देते हैं, गहने गिरवी रख देते हैं। मैंने तुझसे क्या माँगा? बस एक फ्लैट, जिसमें तू वैसे भी रहती नहीं।”
अनन्या ने धीरे से, पर दृढ़ता के साथ कहा,
“पर मम्मीजी, मेरी माँ ने वो फ्लैट मेरे लिए बनाया था—ताकि मैं कभी भी मजबूरी में किसी पर निर्भर न रहूँ। उन्होंने अपनी पूरी ज़िंदगी संघर्ष में काट कर वो घर लिया था। मैं नेहा के लिए कुछ भी करूँगी, जितना मेरी सैलरी से हो सकेगा, लेनदेन में मदद करूँगी, पर माँ की निशानी… बेचने के लिए हाथ नहीं उठा पाऊँगी।”
कुसुम के चेहरे पर तीखापन आ गया,
“वाह! आज बहू अपनी सास को इनकार करना भी सीख गई! तुम्हारे मम्मी-पापा ने यही सिखाया है क्या? शादी के बाद ससुराल ही असली घर होता है। मायके की चार दीवारों से इतनी मोह? यहाँ का कर्ज़ नहीं दिखता? और फ्लैट बेचने में क्या बुराई है? नेहा भी तो तुम्हारी ही तरह हमारी बेटी है!”
अनन्या का गला भर आया, पर उसने खुद को संभाला,
“मम्मीजी, नेहा मेरी भी बहुत प्यारी है। सच कहूँ तो मुझे उससे कोई शिकायत ही नहीं रहती। पर… अगर आप मेरी मम्मी के नाम पर खरीदी चीज़ मुझसे माँगेंगी, तो मुझे ऐसा लगेगा जैसे मैं उनकी याददाश्त को बेच रही हूँ। आप जो भी कहें, मेरे लिए वो फ्लैट सिर्फ़ चार दीवारें नहीं है…”
कुसुम ने तुनककर कहा,
“बहुत ज़्यादा बोलने लगी हो तुम! बहू होने का फर्ज़ निभाना चाहिए। इतना बड़ा निर्णय लिया है, उसको समझने की बजाय जवाब दे रही हो। अभी तक तो मैंने तुझे बेटी ही माना, पर आज तो तू बिल्कुल बाहरी लग रही है। नेहा की खुशी की तुमको कोई परवाह नहीं?”
उसी वक्त कमरे के बाहर से खटके की आवाज़ आई।
दरवाज़े पर खड़ा विवेक सब सुन चुका था।
वह भीतर आया और बोला,
“मम्मी, बात सिर्फ़ नेहा की खुशी की नहीं है, दीदी। बात ये भी है कि कोई अपनी माँ की निशानी त्यागने से मना करे तो वो गलत नहीं हो जाता। आपने ही तो हमेशा कहा है—‘माँ का साया कभी नहीं भूलना चाहिए।’ आज अनन्या वही कर रही है।”
कुसुम तिलमिला गईं,
“तो अब बेटा भी बहू की तरफ़ हो गया! ये घर किसका है? मेरे पति और मेरे बूढ़े कंधों पर खड़ा है, ना? मैंने सोचा बहू अपनी बहन के लिए त्याग करेगी, पर यहाँ तो सब मेरे ही खिलाफ़ हो गए।”
श्यामलाल भी शायद कुछ देर से दरवाज़े पर ही खड़े थे।
उन्होंने भीतर आकर शांत स्वर में कहा,
“कुसुम, बात हमारे खिलाफ़ होने की नहीं है। बात सही और गलत की है।
जिस फ्लैट के पेपर पर अनन्या का नाम है,
उस पर हमारा कोई हक़ नहीं।
वो उसकी माँ की अमानत है, उस अमानत के बारे में वही फैसला करेगी।
नेहा हमारी बेटी है, उसकी शादी हमारा कर्तव्य है।
हम दोनों मिलकर जितना हो सकेगा, करेंगे।
विवेक अपने हिस्से से मदद करेगा।
पर हम एक बेटी की यादों का घर तोड़कर दूसरी की खुशियों की इमारत नहीं बनाएँगे।”
कुसुम ने पति की तरफ़ अविश्वास से देखा,
“तो क्या मैं गलत हूँ?”
श्यामलाल ने राहत और दृढ़ता से भरी आवाज़ में कहा,
“गलत नहीं, बस… ज़रा भावुक हो गई हो।
तुम चाहती हो कि नेहा की शादी शान से हो, इसमें कोई बुराई नहीं।
पर बेटी की शादी सिर ऊँचा करके भी की जा सकती है, बिना बहू की जड़ों को काटे।
और रहा सवाल ‘किसने क्या सिखाया’,
तो आज मुझे लगता है अनन्या ने हमें भी कुछ सिखाया है—
कि मरे हुए लोगों की चीज़ों का नहीं, उनकी यादों का मान रखना चाहिए।”
नेहा भी अब वहाँ खड़ी थी।
उसने आगे बढ़कर अनन्या का हाथ पकड़ लिया,
“भाभी, मुझे आपके फ्लैट की नहीं, आपके साथ की ज़रूरत है।
मैं तो खुद चाहती हूँ कि आप उस घर को न छोड़ें।
कभी मैं ससुराल में परेशान हुई तो मुझे भी तो एक ऐसी जगह चाहिए होगी जहाँ जाकर लगे कि कोई अपना है।
आपकी मम्मी का घर… मेरे लिए भी तो माईका जैसा हो सकता है।”
अनन्या अब भावनाओं पर काबू न रख सकी।
उसकी आँखों से आँसू बह निकले।
विवेक ने प्यार से कहा,
“तुमने आज पहली बार अपने लिए खड़े होकर ‘ना’ कहा है, अनन्या।
मुझे तुम पर गर्व है।
माँ नाराज़ होंगी, पर उन्हें भी समय लगेगा समझने में कि अपना होना क्या होता है।”
कुसुम चुपचाप बैठ गईं।
उनकी आँखों में भी नमी उतर आई, जो उन्होंने पल्लू से चुपके से पोंछ ली।
कुछ देर बाद धीमे स्वर में बोलीं,
“ठीक है, फ्लैट की बात खत्म।
तुम अपनी मम्मी की निशानी संभालकर रखना।
नेहा की शादी हम अपने दम पर करेंगे,
जितना होगा, उतना करेंगे…
दुनिया दो दिन हँसेगी, पर हमें तो ज़िंदगी भर चैन से सोना है।”
अनन्या ने आगे बढ़कर उनके पैर छुए,
“मम्मीजी, मुझे माफ़ कर दीजिए… मैंने आवाज़ ऊँची की…”
कुसुम ने उसे अपने पास बैठा लिया,
“नहीं बहू, आज पहली बार लगा कि तू सिर्फ़ इस घर की जिम्मेदारी नहीं, इस घर की इज़्ज़त भी है।
अपनी माँ की याद की रक्षा करने वाला ही, कल को हमारे लिए भी मज़बूती से खड़ा होगा।
बस इतना याद रखना—
ना बोलना तब, जब बात स्वार्थ की हो,
और हाँ बोलना तब, जब बात रिश्ते बचाने की हो।”
कमरे का वातावरण हल्का होने लगा।
बाहर गली में कहीं बैंड की हल्की आवाज़ आ रही थी—
शायद कहीं और भी किसी की शादी की तैयारी चल रही थी।
इस घर के भीतर,
आज एक और रिश्ता थोड़ा और पक्का हो गया था—
एक सास और एक बहू के बीच,
थोड़ी-सी तकरार के बाद
थोड़ी-सी समझदारी की डोर से बंधा हुआ।
Comments
Post a Comment