Skip to main content

सास की आलमारी

    नारायण जी को गुजरे एक बरस बीत चुके थे , उनकी पत्नी पल्लवी जी उनके बगैर अभी तक शोकाकुल रहतीं और उनकी दोनों बहुएं समझाती कि पापा जी तो चले गए, आप अपने बेटा बेटी के बच्चों को देखिए और खुश  रहिए,  सब आपके बगिया के पुष्प हैं जिन्हें आपने व पापाजी ने पल्लवित पुष्पित किया है लेकिन पल्लवी जी उदास रहा करतीं । दोनों बहू उद्विग्न रहती कि सतर साल की हो गई हैं और अच्छा खासा वैवाहिक जीवन भी जी चुकीं हैं तिस पर क्या दुख मनाना ? घर में भी मनहुसियत किए रहती हैं , अपना काम कर देती दोनों , बड़ी का नाम सुधा और छोटी बहू का नाम लीना । समय पर सास का सारा काम करतीं थीं , परंतु एक रहस्य से सशंकित थी दोनों , सास के कमरे में गोदरेज का चार अलमीरा था जिसमें से तीन अलमारी दोनों बेटों और एक बेटी को बाँट चुकी थीं , एकमात्र अलमारी को अपने आधिपत्य में रखी थीं और अपने औलादों से कह रखा था , मेरे मरने के बाद ही इसमें जो भी जेवर हैं या अनमोल चीजें हैं वो सब आपस में बाँट लेना तुम लोग । इसलिए ऐसा कहती कि उस अलमारी में जंग लगी थी और कहीं कहीं उसके ऊपरी परत बेरंग हो गए थे , बेटे कहते कि इसको मरम्मत करा लो लेकिन वो डपट देतीं , खबरदार किसी ने मेरी अलमारी को छूआ तो ?

 क्या था उसमें , ये सब जानना चाहते थे पर अपनी माता जी के कठोर वाणी उन्हें रोक देती थी ।

पल्लवी जी नित दिन दोपहर को अपने कमरे का दरवाजा बंद  आधे घंटे के लिए बंद कर लेती और अलमारी में रखे चीजों को उलट पलट करतीं , फिर अलमारी बंद कर देती और चाभी को अपने कमर में खोंस लेती , यही रोज दिन का काम था जिससे दोनों बहू खार खाती कि ना जाने बुढ़िया इस अलमारी में कुबेर का खजाना रखी है या पाप की गठरी ।दोंनो के मन में अपनी सास का यह रहस्य और भी संदेह पैदा करता , क्या है भई! रोज खोले बंद करे वो भी सबसे छिपा कर खोलना ?

दोनों अपने अपने पतियों को उकसातीं,  जाओ ना अपनी माँ से कहो कि अलमारी का रंग रोगन करा ले , देखने में भद्दा लगता है ,यदि हमारे घर बाहर का आदमी आता है तो क्या सोचेगा , कितना बड़ा घर है पैसैवाले हैं हम और इतना खराब स्थिती में आलमारी है ।

दोंनो अपनी अपनी पत्नी को डपट देते , वो मेरी माँ है , तुमलोग अपने हद में रहो , चाहे उसमें ईंट पत्थर ही क्यों ना रखा हो , माँ के मर्जी के बिना आलमारी का रिनोवेशन नहीं होगा । तुमदोनों क्यों बेचैन हो , माँ का सामान है इसलिए माँ जाने । अच्छा खासा गहना गुरिया है तुमदोनों के पास । दोनों का मन में  शक का बीजारोपण हो चूका था और दोनों फिराक में थीं कि कब उनके हाथ  उसकी चाभी आए और वो आलमारी का सर्च करे । लेकिन पल्लवी जी अपने कमर में खोंसे रहती  थी।

एक दिन दोनों बहुएं सास के रूम में खाना खाने को पूछने के लिए जाती हैं , सुबह से उनकी कोई सुगबुगाहट नहीं थी , पता नहीं क्या बात है अभी तक माँ अपने कक्ष से नहीं निकली और सुबह के दस बज रहे थे , दोनों बेटे ऑफिस जा चुके थे , बच्चे स्कूल।

इसलिए सास के पास जाकर देखने हेतु कमरे का किवाड़ खटखटाया , कोई उत्तर नहीं मिला । काफी देर तक दरवाजा पीटा गया पर पल्लवी जी दरवाजा नहीं खोलती हैं , किसी अनहोनी की आशंका से दोनों अपने अपने पति को फोन करती हैं ,दोनों जल्दी से आते हैं । दरवाजा तोड़ा गया , अंदर का दृश्य देखकर सबके होश उड़ गए,  पलंग पर पल्लवी जी का आधा शरीर था और आधा नीचे जमीन की ओर लटका था ।  भय से अक्रांत बेटों ने माँ के  शरीर को छूआ है , वो इस दुनिया से जा चुकी थी , लगता है आधी रात को ही मौत हो गई थी । अचरज की बात ये थी कि वो रहस्यमयी अलमारी के दोनों पाट खुले थे शायद उसे माँ ने रात में खोला होगा।

घर में कोहराम मच गया और उनका मृत शरीर बाहर बैठक में रखा गया था । अपनी बहन को भाईयों ने खबर की , तुरंत ॠचा आनन फानन में माँ का सुनकर बदहवास दौड़ी आयी । पल्लवी जी इस दुनिया से रुखसत हो गई थीं , उस अलमारी का किसी को ध्यान नहीं था सिवाय दोनों बहुओं के ?

काम क्रिया और श्राद्ध के बाद तीन भाई बहन व लीना और सुधा के समक्ष बड़े भाई ने अलमारी को खोला , खोलकर देखा तो सबकी आँखें फटी की फटी रह गईं , पूरी अलमारी खाली थी , कुछ नहीं था उसमें ? अरे भइया , आप  इसका लाॅकर खोलिए ना , हाँ हाँ खोलता हूँ ।

लाॅकर खोलने पर सबने देखा , उसमें चार लाल रंग की पोटली थी , एक पोटली बाकी से दुगुनी बड़ी थी । तीन पोटली में दोनों बहू और बहन के नाम लिखे गए थे , सबसे बड़ी पोटली में चाची (पल्लवी जी की देवरानी ) का नाम था , साथ में एक चिट्ठी थी जिसे बड़े बेटे के नाम से लिखी गई थी ।

मेरे मरने के बाद बड़ी पोटली को सुभद्रा के हवाले कर दिया जाय , ये जेवर मेरी सास का है जिसे मैंने उनसे सँभाल कर रखने के बहाने हथिया लिया था । मेरी सास जीते जी गहनों को बाँटना चाहती थीं लेकिन मैं लालच में आ कर नहीं दे पाई,सास कलपकर कलपकर इस दुनिया से चली गईं , जाते जाते मुझे श्राप दे गईं कि तू कभी खुश नहीं रहेगी । सास तो चली गई जाते जाते मेरे जीवन को ग्रहण लगा गई। तुम्हारे पापा देवता थे उन्हें मेरा पाप का आभास नहीं था नावाकिफ थे वे । आज तक मैं इस पाप की गठरी के साथ जी रही थी

,इसलिए अलमारी को तुम सबको देखने नहीं देती थी ।

तुम सब मेरे इस कृत्य को क्षमा कर देना और अपनी चाची को उनका हक लौटा देना ,शायद भगवान मुझे माफ कर दें।

चिट्ठी पढ़कर सबकी आँखें नम हो गईं थी ,काश माँ जीवित रहते बता जाती तो उसके दिल का बोझ हल्का हो जाता  तो आज हमारे साथ होती।

चाची को बुलाकर उनका गहना लौटा दिया गया ,  चाची को पल्लवी जी की चिट्ठी  भी पढ़ाया गया , पढ़ कर वो स्तब्ध खड़ी  रह गई ,इतना बड़ी बात को उसकी जेठानी ने छुपा रखा था , अब वो नहीं है तो उजागर हो चुका है ,अपने गुनाह को मानकर उसकी अमानत भी लौटा दिया है जेठानी के बच्चों ने , वो भी अपनी माँ  के पाप को पुण्य में बदल कर , चाहते तो चाची के गहने रख सकते थे लेकिन अपनी माँ के सम्मान के लिए उन्होनें ऐसा किया था ताकि पल्लवी जी के आत्मा को चैन मिले ।

सबके  मन में जो मलाल था कि उस अलमारी में ऐसा क्या था जिसे पल्लवी जी ने किसी को भी बताना जरूरी समझा था , अब पश्चाताप में बदल चुका है , दोनों बहुओं के मन में सास के प्रति कड़वाहट खत्म हो चुकी है , उन्होनें जीते जी अपने पाप के गठरी को छुपाया था इसलिए किसी के सामने आलमारी को खोला जाना साझा नहीं करती थी , उन्होने अपनी गलती मानकर अपने बच्चों को ये सबक दिया कि बेईमानी करना पाप है  ।


Comments

Popular posts from this blog

दामाज बेटा बन जाता है पर बहू पराये घर की रहती है

  "अरे भाईसाहब (ननदोई) इतनी सुबह सुबह ?" "मम्मी पापा ने बुलाया था.कुछ जरूरी काम है." प्रमोद ने रश्मि को रूखा सा उत्तर दिया. "आ गये बेटे. बहू खड़े खड़े क्या बातें कर रही हो जाओ चाय बना लाओ." "जी मम्मी जी" रश्मि चाय बनाते हुए सोच रही थी ऐसी क्या बात हो सकती है जो भाईसाहब को सुबह बुलाया.कल रात उसे सास ससुर के कमरे से खुसुरफुसुर की आवाजें आ रही थी.मन में उठी किसी अनहोनी की आशंका को झटक कर वह चाय ले कर ड्रॉइंग रूम में गई. "बहू नाश्ता जल्दी बना देना.हमें काम से जाना है." "मम्मी जी कहाँ जाना है ?" "आकर बताते है तुम नाश्ते की तैयारी करो." रश्मि ने सास ससुर और प्रमोद को नाश्ता दिया.कुछ देर में तीनो तैयार हो कर चले गये और रश्मि घर के काम निपटाने लगी. ये थी रश्मि. शर्मा परिवार की इकलौती बहू.रश्मि की शादी रूपेश से हुए एक साल हो गया था.रूपेश की एक बड़ी शादीशुदा बहन कंचन और एक छोटी बहन काजल  जो कॉलेज में पढ़ती है.रूपेश दूसरे शहर में नौकरी करता था.उसकी इच्छा थी कि रश्मि  मम्मी पापा की देखभाल के लिए उनके साथ रहे.रश्मि ने भी रूपेश की इच्...

घर के लक्ष्मी का सम्मान

  "रवि... सुनिए ना... मुझे आपसे कुछ ज़रूरी बात करनी थी। वो मेरे पैरों में बहुत सूजन आ रही है और कमर में भी..." सुमन ने रात के सन्नाटे में, करवट बदलते हुए अपने पति रवि से कहने की कोशिश की। उसकी आवाज़ में एक दबी हुई कराह थी। रवि ने झल्लाहट में अपनी आँखों से बांह हटाई और मोबाइल की स्क्रीन पर समय देखा। रात के साढ़े ग्यारह बज रहे थे। "सुमन, प्लीज यार! अभी ऑफिस की टेंशन कम नहीं है जो तुम घर की रामायण शुरू कर देती हो? सुबह से शाम तक घर पर रहती हो, आराम ही तो करती हो। माँ बता रही थीं कि आजकल तुम दोपहर में दो-तीन घंटे सोती हो। फिर भी थकान? और ये पैरों में सूजन वूजन सब वहम है, थोड़ा वॉक किया करो। अब सोने दो, कल मेरी बहुत बड़ी प्रेजेंटेशन है।" रवि ने कंबल मुंह तक खींच लिया और दूसरी तरफ करवट ले ली। सुमन की आँखों में आए आंसू अँधेरे में ही जज़्ब हो गए। वह क्या बताती कि जिसे उसकी सास 'दोपहर की नींद' कहती हैं, वह असल में छत पर पापड़ और अचार सुखाने की चिलचिलाती धूप वाली मेहनत होती है। रवि को सच सुनना ही नहीं था, क्योंकि उसके लिए माँ का कहा पत्थर की लकीर था। सुमन ने चुपचाप एक दर्द न...

हकीकत

  सुमन के हाथों से शादी की मेहंदी भी नहीं उतरी थी कि उसके साथ सुधा जी ने उसे पूरी तरह से काम में झोंक दिया। सुबह से शाम हो जाती, लेकिन सुधा जी के काम तो मानो पूरे ही नहीं होते थे। जैसे ही सुमन आराम करने के लिए अपने कमरे में जाती, वैसे ही सुधा जी कहतीं, "बहू, जरा मेरे सिर में तेल की मालिश कर दो" या "कपड़े प्रेस कर दो"। कोई न कोई बहाना बनाकर पहले से ही तैयार रखतीं। सुमन कुछ भी नहीं बोल पाती और झट से काम पर लग जाती—आखिर नई-नई बहू जो ठहरी! सुमन के पति रोहित दूसरे शहर में नौकरी करते थे। शादी के लिए भी कम ही छुट्टियाँ मिली थीं, इसलिए शादी के आठ दिन बाद ही अपने काम पर लौट गए। तभी एक दिन… "अरे बहू, कब तक सोती रहेगी? कितना समय हो गया है, आज तुम्हारे ससुर जी ऑफिस के लिए भी निकल गए और तूने चाय तक नहीं बनाई। आगे से ध्यान रखना, समझ गई? ठीक चार बजे उठ जाना, क्योंकि तेरे ससुर जी सुबह छह बजे ही निकल जाते हैं। बहुएं तो काम के लिए ही तो लाई जाती हैं, एक लौटी बहू हो, नहीं बताएंगे तो कैसे सीखोगी? बड़े-बूढ़ों की कदर करना सीखो," सुधा जी नसीहत देतीं। "मुझसे गलती हो गई मांजी...