'मीना, तुम इतनी जल्दी में कहाँ जा रही हो,' अनघा ने पीछे से पुकारा।
'अरे, आज विहान का जन्मदिन है। मोहन ने अपने परिवार को आमंत्रित किया है, इसलिए जल्दी जा रही हूं।'
'उसे जन्मदिन की बधाई देना मेरी तरफ से भी|
'जरूर जरूर..'
' जन्मदिन के लिये कहीं बाहर जा रही हो या घर पर ही करने वाली हो?'
'नहीं, मैं घर पर ही करूँगी। हर कोई बाहर के खाने से ज़्यादा घर का खाना पसंद करता है।
' 'तुम्हारे हाथ में स्वाद जो है इसलिये सभी घर का खाना पसंद करते है।
'सब यही कहते हैं, चलो, मैं आती हूँ।'
मीना आधे दिन की छुट्टी लेकर घर के लिए निकल पड़ी। आते समय पनीर, दही, सलाद के लिए सब्ज़ियाँ, विहान का पसंदीदा चॉकलेट केक और पास के बाज़ार से कुछ सामान लेकर घर आई।
उसकी सासूमां ने दरवाज़ा खोला।
'अच्छा हुआ, तुम जल्दी आ गईं,
मुझे तो कुछ सुझ मी नहीं रहा। मैंने लक्ष्मी को जल्दी आने के लिए कहा है। वह जल्दी आ जाएगी।' कहकर वह जाकर सोफे पर बैठी गयी.
'तुम इन थैलों के साथ क्या क्या लाई हो,' ससूरजी ने उसके लाए दो भारी थैलों को उठाते हुए कहा।
'कुछ नहीं बाबुजी, बस कुछ सब्जियाँ और केक हैं।'
'मुझसे कह देती तो मैं लेकर आया रहता|'
'बाबुजी, मैं ऑफिस से जल्दी आनेवाली थी इसलिये साथ ही लेकर आयी।'
'चलो, थोड़ा पानी पी लो और बैठ कर सुस्तालो।' बाबुजीने उसे पानी का गिलास दिया।
जब भी वह ऑफिस से आती, बाबुजी हमेशा उसके लिए पानी लेकर आते। उसने दो गिलास पानी पिया। इतनी गर्मी से आने के बाद वह थक गई थी।
'कोई मदद चाहिए हो तो मुझे बताना।'
'जी बाबुजी,' उसने कहा और कपड़े बदलने चली गई। कपड़े बदलने के बाद उसने सारी सब्जियाँ फ्रिज में रख दीं। केक भी फ्रिज में रख दिया। लक्ष्मी के आने का इंतज़ार करने के बजाय वह काम पर लग गई। अदरक लहसुन का पेस्ट, प्याज टमाटर का पेस्ट, मूंगफली की चटनी मिक्सर में पिसकर रखी, आलू उबालने के लिये कुकर में चढाये, पूरी के लिए आटा गूंधा, सब्जी के लिए प्याज, मिर्च, धनिया काटकर रखा, सलाद तैयार करके प्लेट में रख दिया|
लक्ष्मी साढ़े चार बजे आई और दोनों फुरताई से खाना बनाने में जुट गयी|
"अरे मीना, चाय बनाओगी क्या," बाहर से सासूमां ने आवाज लगायी तो उसने गैस पर चाय चढ़ा दी| चाय बनी तो वह सासूमां और बाबुजी को चाय देकर आई| लक्ष्मी को देकर उसने भी चाय पी. करीब साढ़े छह पौने सात बजे खाना बन गया| लक्ष्मी की मदद से उसने डाइनिंग टेबल पर प्लेट, कटोरी, गिलास, टिशू पेपर, डिस्पोजेबल प्लेट रख दी. लक्ष्मी हे किचन और हॉल को एक बार साफ करवा दिया गया|
काम का मॅनेजमेंट सीखना हो तो बस मीना से सीखना चाहिए उसके बॉस हमेशा उसकी तारीफ में बोलते है क्योंकी वह समय पर हर काम एकदम परफेक्ट करती|
सब हो जाने के बाद उसने लक्ष्मी को घर ले जाने के लिए टिफीन दिया और आज के काम के पैसे भी दिए. लक्ष्मी चली गई तो वह तैयार होने के लिये जाने लगी इतने में मोहन घर आया। फिर उसने उसके लिए चाय बनाई। जैसे ही वह फ्रेश होकर आया, उसे उसे चाय दी और तैयार होने के लिये जाने लगी.. इतने में छोटी ननंद बेटी को लेकर आई। फिर उसने उसे चाय और बेटी को दूध और बिस्किट दिए। सवा सात बज रहे थे। 'मोहन, मैं तैयार होकर आती हूं,' कहकर वह जल्दी से बेडरूम में गई| उसके जाते ही बड़ी ननंद, जेठानी,जेठ और उनके बच्चों के आने की आवाज उसे सुनाई दी। उसने जल्दबाजी में साड़ी पहनी थी। हल्का मेकअप करने का भी समय नहीं था। उसने जल्दी से अपने बाल बनाए और नीचे आ गई। सब आ गए थे।
'भाभी, कितनी देर हो गई...हम कब से इंतजार कर रहे हैं?' बड़ी ननंद ने ताना मारा।
'अरे, मैं तैयार होने गई और आप लोग आ गये।' मीना ने हंस कर कहा।
'ऐसे तैयार होते हैं...' उसने मुंह बनाते हुए कहा। मीना को अपनी बड़ी भाभी को ताना मारने की आदत थी। मीना को गुस्सा आया पर मौके की नजाकत देखकर वह चुपचाप वहॉं से चली गई। वह सबके लिए शरबत बनाकर ले आई।
'मीना, क्या तुमने यह शर्बत घर पर बनाया है,' जेठजी ने पूछा। 'हाँ। कैसे बना?'
'बहुत बढ़िया। तुम्हारे हाथ में स्वाद है।'
'सिर्फ़ हाथ में स्वाद है, बाकी सब बकवास है,' बड़ी ननंद ने धीरे से कहा तो उसकी सास, छोटी ननद और जेठानी हलके में हंस पड़ीं, वह शर्म से लाल हो गई। पास बैठा मोहन भी हंस पड़ा। मीना की आंखों में आंसू आ गए। वह आंसू छिपाने के लिए रसोई में चली गई। बाद में केक काटने और खाना खिलाने में व्यस्त रही| ग्यारह बजे सब सब चले गए। सबके जाने के बाद सास और मोहन सुस्ताने सोफे पर बैठ गए। सबको खिलानेवाली वह भुखी थी मगर उसे खाने का मन ही नहीं था|
बड़ी ननंद के चुभनेवाले शब्द और उसपर सबकी हॅंसी उसके दिल को तडपा रहे थे| उसकी आँखों से आँसू बहने लगे। जैसेतैसे उसने अपने आँसू रोके और पानी की बोतल लेकर ऊपर जाने लगी।
"अरे, हमारे कमरे में भी बोतल रख देना ," उसकी सास ने पीछे से आवाज़ लगाई।
"मोहन, तुम जाकर बोतल रख दो ," उसने बहुतही रुखे स्वर में कहा और ऊपर अपने कमरे की ओर चल दी| बाबुजी को उसके रुखे स्वर को सुनकर लगा की कुछ तो ऐसा हुआ है जिससे बहु आहत हुई है| सासुमां और मोहन को कारण पता था मगर वह चुप रहे|
मीना अपने कमरे में आ गई। विहान गहरी नींद में था। वह उसके बगल में लेट गई। थोड़ी देर बाद मोहन आया और बिना कुछ कहे सो गया।
हाथों में स्वाद दिखने में बकवास..उसके कानों में गूंजते रहे।
शादी के समय वह अच्छी, सुडौल कदकाठी की थी मगर इन सात सालों में सबको खुश करने के चक्कर में वह अपने सेहत की तरफ देखना ही भुल गयी थी।
नतिजा... उसके दिखने पर तंज कसने लगे| इन सात सालों में सभी के लिये उसने जो किया वह सब भुल गये...
कुछ मन ही मन उसने तय किया|
सुबह सात बजे सासुमां कमरे से बाहर आईं तो देखा तो रसोई खाली पडी थी|
'चाय अभी तक नहीं बनी।'
ससुरजी बाहर आकर बोले।
'लगता है मीना अभी तक उठी नहीं।'
'आज चाय तुम चाय बना लो।' ससुरजी के कहते ही सासुमां चाय बनाने चली गईं।
'अजी दूध की थैली ले आओ, दरवाजे के बाहर होगी।' ससुरजी दरवाजा खोलने गए।
'क्या कोई बाहर गया है? ये इंटरनल लॉक लगा हुआ है।' कहते हुए दूध की थैली लेकर अंदर आए।
'मीना, चाय दे दो।' मोहनने नीचे आकर गुहार लगायी।
'मीना ऊपर नहीं है।'
'नहीं तो।
''तो फिर वह कहां गई।' सासुमां बोली|
"मतलब...वह नीचे भी नहीं है तो वह कहाॅं गई?' मोहन चिंता के सूर में बोला|
'वह नहीं है इसिलिये तो आज मैं चाय बना रही हूं ।'
तभी लक्ष्मी आ गईं।
आज क्या बनाना है?’ दीदी कहाँ गईं माॅंजी?’
‘वह यहीं हैं।'
सासुमां ने फ्रीज खोलकर कल का बचा हुआ खाना देखा और उसे उसे चावल और रोटी बनाने को बोल दिया और सास तीनों के लिए चाय के कप लेकर बाहर आईं। तभी दरवाजे की घंटी बजी।
मीना अंदर आयी।
'आज सुबह कहां गई थी?' सासुमां ने पूछा।
'मै वॉक पर गई थी,अरे वाह चाय,' मीना ने चाय का प्याला उठाते हुए कहा।
'अरे कप रख, जा अपने लिये चाय बना।' सासुमां गुस्से में बोली।
' क्या मतलब?'
'ये चाय मैंने हम तीनों के लिए यह चाय बनाई है।'
'तो क्या मैं इस घर की नहीं हूं?' उसने कहा।
'घर की हो तो चाय के समय पर बिना किसी को बताये बाहर टहलने निकल गयी?'
'आप सब लोग सो रहे थे तो किस को बताकर जाती. औरवैसे भी दरवाजे को इंटरनल लॉक लगाकर गयी थी|' मीना ने स्पष्टीकरण देते हुए कहा|
'एकदम क्या सनक चढी घुमने की?'
'आप शाम को घुमने जाती है मैने कभी टोका आपको|' मीना की आवाज तेज हो उठी
'मीना, ये कैसे बात कर रही हो मॉं के साथ?' मोहन ने उसे टोकते हुये कहा|
'मोहन,कल जब तुम्हारी बहन मेरे दिखने पर हंस रही थी, तब किसीने कुछ नही बोला उल्टा तुम लोग हंस रहे थे।'
' 'क्या उसने झूठ बोला? खुद को देखो,' मोहन ने कहा।
'' शादी के वक्त मैं क्या ऐसी थी? अरे, शादी के बाद से ही मेरी मां ने घर के सारे काम मुझ पर डाल दिए... सुबह की चाय से लेकर रात के खाने तक सब कुछ मुझपर सौंप दिया। तुम सबको खुश रखने के चक्कर में मै अपनी तरफ ध्यान देना ही भुल गयी| आज, अगर मैं जरासी टहलने क्या गयी माँजी को मुझे एक कप चाय देने में बुरा लगा।’
‘अरे तो ऐसे बात करोगी क्या मॉं से... मोहन ने चिढकर कहा।
'मम्मी.... विहान उपर से आकर मीना की गोदी में बैठ गया।
‘उठ गया बेटा।’ मीना ने उसके बालों में उंगली फेरते हुए कहा|
‘मम्मी, क्या हुआ?आप लोग लड़ रहे हो क्या?’
‘नहीं बेटा, हम तो बातें कर रहे हैं।’
‘तुम इतनी जोर जोर से क्यों चिल्ला रही हो?’
‘देखो यह छोटा बच्चा जानता है कि तुम लड रहे हो,' इतने समय से चुपचाप सुन रहे बाबुजी बोल पडे।
‘एक कप चाय के लिए तुमने क्या बवाल मचा रखा है। अगर तुम लोगों ने कल उसको भलाबुरा नहीं कहा होता तो वह आपसे क्यू उलझती. और वह अपने लिये समय निकालना चाहती है तो बुरा क्या है? अरे सभीने थोडा थोडा घरका का काम किया तो दिक्कत क्या है... अरे घर हमारा है तो थोड़ी-थोड़ी जिम्मेदारी सबने उठा ली तो हम खुशी से रह सकते हैं, वरना अगर ये लोग अलग हो गए तो तुम और मैं अकेले रह जाएंगे.. इतने प्यारे बच्चे को डे केयर में रखना पडेगा?
‘दादी, मैं कहीं नहीं जाऊंगा,’ विहान ने दादी के गले में अपनी नन्ही नन्ही बाहें डालकर कहा। ‘नहीं राजा, तुम कहीं नहीं जाओगे,’ सासुमॉं ने विहान को गोद में लेते हुए कहा|
‘माफ करना मांजी, मैं कुछ ज्यादा ही बोल गयी।’ मीना ने सासुमां की तरफ देखकर हात जोडकर कहा|
सासुबाई ने उसकी तरफ देखा। ‘जाओ तुम विहान को ब्रश कराके लाओ, मैं तुम्हारे लिए चाय बनाती हुं।’
‘हां मां,’ उसने आंखों से बाबा को धन्यवाद देते हुए कहा और विहान को लेकर चली गई। ‘मोहन, अगर तुम अपनी पत्नी का सम्मान नहीं करोगे, तो कोई उसका सम्मान कैसे करेगा।’
समझा बाबुजी।’ कहकर वहां से चला गया।
'चलो चाय के प्याले से उठा तूफान चाय के प्याली से ही शांत हुआ,' मन ही मन सोचते हुए बाबुजी मदद के लिए रसोई में चले गये।
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