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सात दिन

 “पापा… आज फिर बस छूट गई।”  कृतिका ने बैग फर्श पर पटक दिया। अनिकेत घड़ी की तरफ़ देख कर झल्ला उठा,

“अब क्या करूँ मैं? स्कूटर उड़ाकर स्कूल छोड़ूँ तुम्हें? तुम्हारी मम्मी को ही समझ नहीं, टाइम पर तैयार क्यों नहीं करती बच्चों को!”

किचन से आती हुई भाप में भी सुमेधा की थकान साफ़ दिख रही थी। गैस पर दाल चढ़ी थी, दूसरे बर्नर पर पराठा, तीसरे पर दूध। टिफ़िन खुले पड़े थे, बोतलें आधी भरी… और बीच में खड़ी वो — एक हाथ से सब्ज़ी हिला रही, दूसरे से रसोई का टाइम पे चलने वाला छोटा अलार्म बंद कर रही थी।

“अनिकेत, मैंने तो सब रात में ही सेट कर दिया था,” वो धीमे से बोली, “कृतिका खुद टाइम पर नहीं उठी, तीन बार बुलाया था मैंने…”

“अरे, अब सब मेरी बेटी की गलती!” अनिकेत ने ऊँची आवाज़ में कहा, “तुम्हें तो बस बहाना चाहिए। टीचर हो गई हो न, बहुत अक्ल है तुम्हें। पर घर चलाने की अक्ल ज़रा भी नहीं।”

बरामदे में बैठे हुए बाबूजी ने चश्मा उतारकर इन्हीं आवाज़ों की तरफ़ देखा। माँ — सुशीला — चौके के दरवाज़े पर आकर खड़ी हो गईं।

“रोज़-रोज़ झगड़ा… पड़ोसी क्या सोचते होंगे,” सुशीला बड़बड़ाईं, “पहले के ज़माने में औरतें पाँच-पाँच बच्चे संभालती थीं, फिर भी आवाज़ नहीं निकलती थी। ये आजकल की नौकरी करनेवाली बहुएँ बस रोती ही रहती हैं।”

सुमेधा ने बात सुनकर भी अनसुनी कर दी। बस इतना कहा,
“कृतिका, तुम जल्दी-जल्दी दूध पी लो, मैं तुम्हें रिक्शा से भिजवा दूँगी। आज से अलार्म तुम खुद लगाओगी।”

अनिकेत नाराज़ होकर स्कूटर उठाकर ऑफिस की तरफ़ निकल गया। उसके जाते ही रसोई की दीवारें हल्की शांत हो गईं, पर सुमेधा के भीतर उबाल अभी भी चल रहा था।

वो भोपाल के एक सरकारी स्कूल में टीचर थी। सुबह सात बजे से रात तक कामों की लाइन थी — स्कूल, कॉपी जाँच, बच्चों की पढ़ाई, सास की दवाइयाँ, बाबूजी की चाय, डिनर… खुद की थकान के लिए कोई जगह ही नहीं थी।

रात को कॉपी चेक करते-करते उसने धीरे से अनिकेत से कहा,
“सुनो, अगले महीने दिल्ली में सात दिन की ट्रेनिंग है। अगर मैं जाऊँ, तो मेरा प्रमोशन कन्फर्म हो सकता है। प्रिंसिपल भी चाह रही हैं कि मैं जाऊँ। क्या तुम थोड़ा घर देख लोगे?.. बच्चों की पढ़ाई में हाथ बँटा दोगे तो…”

अनिकेत ने मोबाइल से नजर ही नहीं उठाई, बस इतना कहा,
“मतलब साफ़-साफ़ ये है कि घर–गृहस्थी छोड़कर तुम दिल्ली घूमने जाओगी। ट्रेनिंग के नाम पर पिकनिक मना लोगी, है न? बच्चों का क्या होगा? मम्मी–पापा का क्या? मुझे ऑफिस के बाद कपड़े धोने बैठना पड़ेगा?”

“मैंने कब कहा कपड़े धोने?” सुमेधा की आवाज़ हल्की काँपी,
“बस थोड़–सा टाइमटेबल बदलना पड़ेगा। मम्मी दिन में बच्चों को देख लेंगी, शाम को मैं लौटकर…”

सुशीला ने वहीं से टोका,
“देखो बेटा, घर–घर खेलना बंद करो। औरत अगर सात दिन घर छोड़ देगी, तो घर का संतुलन बिगड़ ही जाएगा। प्रमोशन के लिए इतना भाग-दौड़ ज़रूरी है क्या? तुम्हारे पापा ने भी बिना ट्रेनिंग के नौकरी की, घर भी संभाला।”

बाबूजी ने अख़बार के पीछे से आवाज़ दी,
“भई, मैं तो बस इतना जानता हूँ, घर की धुरी औरत होती है। वो हिल गई, तो घर सारा काँपता है।”

कृतिका माँ–बाप की बातें सुन रही थी। उसने भी बीच में बोल दिया,
“मम्मी, आप मत जाओ ना। जब आप नहीं हो न, तो पापा बस मैगी बनाते हैं, उससे मेरा पेट नहीं भरता।”

सबकी नजरें एक साथ सुमेधा पर टिक गईं। अचानक उसे लगा कि जिस घर के लिए वो रोज़ दौड़ रही है, वही घर उसे एक हफ्ता खुद के लिए भी नहीं दे सकता।

उस रात कॉपी जाँचते-जाँचते उसकी आँखों से आँसू टपकते रहे, थोड़ी-थोड़ी स्याही फैलती गई।


दिन उड़ते गए। ट्रेनिंग के फार्म भरने की आख़िरी तारीख़ निकल गई। प्रमोशन की बात भी फाइलों में कहीं दब गई। पर घर का माहौल पहले जैसा नहीं रहा।

अब छोटी–छोटी बातों पर…

“तुम्हें तो वैसे भी ट्रेनिंग नहीं मिली…”
“इतनी होशियार टीचर को कौन सी नौकरी मिल जाएगी बाहर…”

जैसे ताने फेंके जाते।

एक शाम जब सुमेधा स्कूल से लौटी, तो देखा कि किचन में गैस पर कुछ नहीं चढ़ा। सिंक में बर्तनों का ढेर। सुशीला टीवी के सामने बैठी पड़ोसन से सीरियल के बारे में चर्चा कर रही थीं।

“मम्मी, आपने कुछ बनाया नहीं?”

“तुम्हारी बेटी ने सुबह इतना नाटक किया स्कूल जाने के लिए कि मेरा सिर ही घूम गया। तुम्हारे बाबूजी को डॉक्टर के पास ले जाना था, तो बस चाय बनाकर निकल गए। अब तुम आ गई हो, बना लो आराम से।”

सुमेधा ने चुपचाप चूल्हा संभाल लिया।

उस रात, जब सब खाना खा चुके, बर्तन धोकर, अगली सुबह के लिए आटा गूँधकर वो अपने कमरे में आई, तो वो अचानक थकान से पलंग के किनारे बैठ गई। मेज़ पर उसका पुराना डायरी रखा था, जिसपर धूल पड़ी हुई थी।

वो कभी कविता लिखती थी, अपने स्कूल के दिनों में डिबेट जीतती थी, रंगोली प्रतियोगिता में फर्स्ट आती थी। आज उसकी दुनिया बस टाइमटेबल और ग्रोसरी लिस्ट तक सिमट गई थी।

उसने बिना सोचे समझे फ़ोन उठाया और अपनी बड़ी बहन मृदुला का नंबर डायल कर दिया, जो इंदौर में रहती थी।

“दीदी… तुम्हारे घर में मेरे रहने की थोड़ी जगह मिलेगी?”
यह कहते-कहते उसकी आवाज़ भर्रा गई।

मृदुला चौंक पड़ी,
“अरे, क्या हुआ सुमी? सब ठीक है न? शशांक… मेरा मतलब, अनिकेत से लड़ाई हुई क्या?”

“सबसे,” सुमेधा के मुँह से जैसे रिस गया, “बच्चों से भी… मम्मी–पापा से भी… खुद से भी। बस… बहुत थक गई हूँ। अगर तुम मना करोगी, तो मैं कहीं और… पर अभी नहीं बता सकती कहाँ…”

बात पूरी होने से पहले ही वो रो पड़ी।

मृदुला ने गंभीर स्वर में कहा,
“पगली, तेरा घर मेरे बिना भी है, और मेरे साथ भी। तू बस आ जा। कल की पहली ट्रेन पकड़ ले, मैं स्टेशन लेने आ जाऊँगी। बाकी सब बात वहाँ बैठकर करेंगे।”

फ़ोन कट गया, पर सुमेधा की धड़कनें तेज़ हो गईं। वो कोई भावुक फैसला नहीं लेना चाहती थी। उसने उठकर बच्चों के कमरे में देखा। दोनों सो रहे थे — किताबें बिखरी हुईं, पेंसिल बिना ढक्कन की, पानी की बोतल आधी खाली।

उसने धीरे से बेटे युवान के माथे पर हाथ फेरा, कृतिका की चादर ठीक की, फिर कमरे में आकर सूटकेस निकाला।

सुबह जल्दी उठकर उसने हमेशा की तरह सब काम किए — नाश्ता, टिफ़िन, चाय, दवाइयाँ। बस एक फर्क था — इस बार उसने अपने लिए भी दो जोड़ी कपड़े, ज़रूरी कागज़ात, कुछ रुपये और पुरानी डायरी बैग में रख ली।

रसोई की चिट पर उसने दो लाइनें लिखीं —

“मैं कुछ दिन के लिए मृदुला दीदी के पास जा रही हूँ।
मैं थक गई हूँ।
मुझे अपने लिए भी थोड़ा समय चाहिए।
बच्चों का ख़याल रखना।
— सुमेधा”

घर में ताला लगाया, चाभी गैस के पीछे रखी छोटी मटकी के नीचे दबा दी और ऑटो लेकर रेलवे स्टेशन निकल गई।


उधर, बच्चों की स्कूल बस चली गई, तो हमेशा की तरह अनिकेत ने दरवाज़ा खोला और अंदर आया। उसे लगा आज घर में अजीब सन्नाटा है।

“मम्मी! चाय?” उसने आवाज़ लगाई।

कोई जवाब नहीं।

किचन में गया तो देखा, गैस ऑफ, लेकिन प्लेट में पराठे ढँके रखे हैं और चाय का बर्तन खाली। रसोई की चिट उसकी आँखों में पड़ गई। उसने पढ़ते-पढ़ते दो–तीन बार शब्द दोहराए — “मैं थक गई हूँ।”

शुरू में उसे गुस्सा आया,
“ये क्या ड्रामा है? दो दिन न रहने पर किसी को क्या फर्क पड़ेगा?”

उसने सास–पिता को चिट दिखाकर कहा,
“मम्मी, देखिए, आपकी बहू जा चुकी है मटरगश्ती करने।”

सुशीला ने नाराज़ होकर कहा,
“मैंने तो ऐसी रोज़–रोज़ की धमकी कभी नहीं दी तेरे पापा को। ये आजकल की लड़कियाँ न, बस मम्मी–पापा के घर को ही असली घर समझती हैं। अभी दो दिन रह आने दो, अपने–आप लौट आएगी।”

बाबूजी ने चश्मा ठीक करते हुए बस इतना कहा,
“देख बेटा, गुस्से में क्या बोलना है, थोड़ा सोचकर बोल। वह सचमुच थक गई होगी, तभी तो गई है। आदमी घर से ऐसे ही नहीं निकलता।”

शाम तक बच्चों को खबर लगी कि मम्मी दीदी के घर गई है।

“वो गए बिना हमें बताए?” कृतिका की आँखें फैल गईं।

“क्यों गए? पापा से लड़ाई हुई क्या?” युवान ने घबराकर पूछा।

अनिकेत ने बात हल्की करने की कोशिश की,
“तुम्हारी मम्मी को छुट्टी चाहिए थी, चली गईं। तुम लोग तो खुश होते न? अब कोई रोज़–रोज़ होमवर्क के पीछे नहीं पड़ेगा।”

कृतिका ने धीरे से पूछा,
“तो नाश्ता, टिफ़िन, प्रोजेक्ट… ये सब आप करोगे?”

अनिकेत ने बात को टालते हुए कहा,
“अरे, मम्मी हैं न, तुम्हारी दादी। और मैं भी हूँ। इतना मुश्किल क्या है?”

लेकिन मुश्किल अगले ही दिन दिखने लगी।

सुबह जब अलार्म बजा, तो सुमेधा का हाथ नहीं बढ़ा उसे बंद करने। बच्चों को बार–बार उठाने वाला कोई नहीं था। सुशीला की भी आदत थी देर तक सोने की।

कृतिका की आँख खुली तो देखा, सात बज रहे हैं।

“पापा… पापा!” वो भागती हुई अनिकेत के कमरे में गई, “बस छूट जाएगी!”

अनिकेत भी रात को देर तक मोबाइल पर गेम खेलकर सोया था। हड़बड़ाकर उठा, खुद तैयार होने लगा, बच्चों को भी जगा दिया।

“दादी, नाश्ता?” युवान ने पूछा।

सुशीला ने आँख मलते हुए कहा,
“आज बिस्कुट खा लो, रात की रोटियाँ हैं दो–तीन, उसे दूध के साथ खा लेना। मुझे दवा भी खानी है, थोड़ा चक्कर सा आ रहा है।”

अनिकेत ने जल्दी–जल्दी बच्चों के टिफ़िन में सूखी रोटी और अचार रखा, खुद चाय में दो बिस्कुट डुबोकर निगल लिए।

बस छूट गई। उसे फिर स्कूटर से दोनों को छोड़कर ऑफिस जाना पड़ा। ऑफिस पहुँचा तो बॉस की मीटिंग ख़त्म हो चुकी थी, और ईमेल में उसकी देरी पर नोट लग चुका था।

शाम को जब वापस आया, तो किचन में झाँकने पर देखा — सिंक में सुबह के बर्तन वैसे ही पड़े हैं, गैस साफ़ नहीं, चूल्हे पर राख, फ्रिज में कुछ नहीं।

“मम्मी, आपने कुछ बनाया नहीं?”

“बना तो लेती, पर कमर में दर्द हो रहा है,” सुशीला ने तकिए के सहारे बैठते हुए कहा, “थोड़ी तबियत भी ढीली है। बहू होती न, तो उसके साथ–साथ मैं भी कर लेती। अकेले में मन नहीं करता।”

उसी रात, बच्चों ने पहली बार कहा,
“पापा, मम्मी वापस कब आएँगी? स्कूल में सब अपने टिफ़िन में कुछ न कुछ नया निकालते हैं, हमारे पास तो बस रोटी–अचार ही रहता है।”

अनिकेत ने कुछ नहीं कहा।

फोन उठाकर कई बार सुमेधा का नंबर देखने के बाद भी कॉल नहीं किया। ईगो उसके अंगूठे को रोक रहा था।

तीसरे दिन कृतिका का प्रोजेक्ट फाइल बिना चार्ट के ही स्कूल चली गई। टीचर ने डाँट दिया,
“तुम्हारी मम्मी क्या करती हैं? थोड़ा ध्यान नहीं रख सकती?”

कृतिका ने वही जवाब दिया, जो घर में उसने कई बार सुना था,
“मैम, पापा कहते हैं मम्मी तो किसी काम की नहीं… शायद इसलिए।”

टीचर चौंक गईं।
उसी शाम उन्होंने काउंसलिंग के लिए अनिकेत को बुलाया।

“आपकी बेटी आज बहुत उदास थी,” टीचर ने सीधे कहा,
“उसने कहा कि उसके पापा अक्सर मम्मी को किसी काम का नहीं कहते हैं। बच्चे घर में जो सुनते हैं, वही दोहराते हैं। आप समझ रहे हैं, आप अपनी पत्नी के बारे में क्या संदेश दे रहे हैं बच्चों के मन में?”

अनिकेत को पहली बार भीतर कहीं चुभन महसूस हुई।

घर लौटते हुए स्कूटर पर हवा थोड़ी तेज़ लगी। उसे याद आया, किस हल्के अंदाज़ में वो अक्सर कह देता था — “तुम्हें तो कुछ आता ही नहीं…” और कैसे वही बात अब उसकी बेटी के मुँह से उसकी पत्नी के लिए निकल रही थी।

रात को घर आया तो सुशीला भी चुप थीं।

“आज तुम्हारे बाबूजी की शुगर बहुत बढ़ी हुई थी। दवा का टाइम निकल गया, मैं भूल गई। बहू होती, तो समय पर दे देती। अब समझ में आ रहा है कि घर की महिलाएँ दिखती भले कम हैं, पर काम सबसे ज्यादा करती हैं।”

अनिकेत के पास कोई जवाब नहीं था।

उसने आखिरकार फ़ोन उठाया और मृदुला का नंबर मिलाया।
“दीदी… सुमी… वहाँ है?”

“हाँ, है,” मृदुला ने थोड़ी ठंडक के साथ कहा,
“लेकिन आज उससे बात करने से ज़्यादा, सुनने के लिए तैयार हो तुम?”

अनिकेत ने पहली बार बिना बहस किए कहा,
“दीदी, मुझसे गलती हो गई। बहुत बड़ी गलती।
मैंने घर में सबके सामने, बच्चों के सामने, हर वक़्त उसे कमतर दिखाया।

वो बस खाना नहीं बनाती, वो इस घर की नींव है।
तीन दिन में समझ आ गया कि उसके बिना ये घर चार दीवारों से ज्यादा कुछ नहीं।
अगर वो वापस नहीं आई, तो शायद ये घर घर जैसा नहीं रहेगा।”

मृदुला का स्वर नरम पड़ गया,
“तुम्हारी ये बात रिकॉर्ड करके उसे सुनाऊँ कि नहीं?”

“अगर इससे वो मान जाए, तो ज़रूर… और हाँ, बच्चों की भी बहुत याद आ रही है उसे, ये मैं साफ़ बता दूँ। पर वो डरती है कि वापस आने के बाद फिर वही सब न शुरू हो जाए।”

अनिकेत ने धीमे से कहा,
“मैं वादा करता हूँ, इस घर में अब कोई उसे ‘किसी काम की नहीं’ नहीं कहेगा — न मैं, न बच्चे। माँ को भी समझाऊँगा।
बस… एक मौका और दे दे।”

मृदुला ने फ़ोन सुमेधा को दिया।

“सुन लिया?” उसने मुस्कुराते हुए पूछा,

सुमेधा ने हिचकते हुए फोन कान से लगाया। दूसरी तरफ़ से वही आवाज़, जो कभी उसका सबसे बड़ा सहारा थी और अब उसकी सबसे बड़ी कसक बन गई थी।

“सुमी…” अनिकेत ने धीरे से कहा,
“मैंने तुझे हमेशा बस ‘जिम्मेदारी’ की तरह लिया।
तू बहू है, पत्नी है, माँ है — ये सब मैं देखता रहा, पर ये भूल गया कि तू अपनी भी कोई इंसान है, जिसकी सीमाएँ हैं, थकान है, सपने हैं।

मैंने बच्चों के सामने तेरी जो इज़्ज़त कम की, उसके लिए जितनी बार माफी माँगूँ, कम है।
अगर तू चाहे तो वापस मत आ, पर बच्चों को तो मिलने दे। उन्हें तेरी बहुत ज़रूरत है।”

सुनते–सुनते सुमेधा की आँखें भर आईं। उसने बहुत धीमे से सिर्फ़ इतना कहा,
“बच्चों को लेकर कल आ जाइए, दीदी के घर। बात करेंगे।”


अगली सुबह डोरबेल बजी। मृदुला ने दरवाज़ा खोलते हुए देखा — सामने युवान और कृतिका भाग कर आए और सुमेधा से लिपट गए।

“मम्मी… आप हमें छोड़कर क्यों चली गई थीं?” कृतिका की आवाज़ भर्रा गई,
“टीचर ने पूछा, ‘तुम्हारी मम्मी क्या करती हैं?’ तो मेरे मुँह से निकल गया, ‘कुछ नहीं।’
फिर बहुत बुरा लगा। प्लीज़, वापस चलो।”

युवान ने भी भूले हुए वाक्य दोहराए,
“पापा कहते थे न… पर अब… अब पापा खुद बोल रहे हैं कि आपने जो किया, वो सबसे मुश्किल काम है। मैं आपकी मदद करूँगा घर में। बस आप चलो।”

पीछे खड़े अनिकेत ने हाथ जोड़ लिए,
“सुमी, मैं तुझे घर नहीं, अपने साथ चलने को कह रहा हूँ। घर तो तेरा था, है और रहेगा। आज अगर तू कहेगी, तो मैं खुद भी तेरी ट्रेनिंग के लिए फार्म भरवाऊँगा।

मैं नहीं चाहता कि तू बस जिंदगी काटे। तू जी भी ले, अपने लिए भी।”

सुमेधा ने मृदुला की तरफ देखा। मृदुला ने मुस्कुराकर सिर हिला दिया—
“जाना या न जाना तेरी मर्ज़ी है। बस इस बार अपने लिए भी थोड़ा सोचना।”

काफी देर चुप रहने के बाद सुमेधा ने गहरी साँस ली,
“ठीक है, मैं चलूँगी… पर एक शर्त पर।
घर सिर्फ़ मेरा नहीं होगा।
किचन में सिर्फ़ मेरा नाम नहीं लिखा होगा।
जब भी बच्चों के सामने मेरी बात होगी, वो इज़्ज़त से होगी।
और अगर अगली बार मेरे प्रमोशन या ट्रेनिंग की बारी आएगी, तो सबसे पहले तुम कहोगे, ‘जाना चाहिए।’”

अनिकेत ने बिना सोचे कहा,
“मंज़ूर है।
और अगर मैंने फिर कभी वही गलती दोहराई, तो इस बार तू नोट नहीं, सिर्फ़ एक मीसेज छोड़ देना — ‘अब बहुत हुआ।’ मैं खुद समझ जाऊँगा।”

सब हँस पड़े।

वापसी के रास्ते में, गाड़ी एक कॉफ़ी हाउस के सामने से गुज़री।

“रुकिए ज़रा,” सुमेधा ने पहली बार खुद से कुछ कहा।

अनिकेत ने गाड़ी रोकी।

“अब क्या हुआ?” उसने पूछा।

“मैंने इंदौर आते वक्त सोचा था, एक दिन मैं यहाँ अकेले बैठकर अपने लिए कॉफ़ी पीऊँगी,” सुमेधा ने हल्के मुस्कुराते हुए कहा,
“पर आज लगता है, अकेले नहीं, साथ में पीना ज़्यादा अच्छा लगेगा।”

टेबल पर दो कप कॉफ़ी रखे गए।
अनिकेत ने चौंककर कहा,
“तुम तो चाय पीने वाली हो न? कॉफ़ी कब से पसंद आ गई तुम्हें?”

सुमेधा ने कॉफ़ी की भाप को सूँघते हुए कहा,
“पता नहीं… शायद जब से ये समझ आया कि मेरी पसंद–नापसंद भी कोई चीज़ होती है।”

अनिकेत ने गहरी नज़र से उसकी तरफ देखा,
“फिर तो हमें बहुत कुछ नया सीखना पड़ेगा — तुम्हारे बारे में।
तुम्हारी पसंद, तुम्हारे सपने, तुम्हारी थकान… सब।”

कृतिका ने मासूमियत से पूछा,
“और मम्मी, जब आप ट्रेनिंग के लिए दिल्ली जाओगी न, तो क्या हमें वहाँ से वीडियो कॉल करोगी?”

“हाँ,” सुमेधा हँस पड़ी,
“और तुम लोग मुझे बताना, पापा ने टिफ़िन में क्या बनाया है, टाइम पर स्कूल पहुँचे या नहीं… और दादी ने दवा ली या नहीं।”

युवान ने तुरंत कहा,
“मैं जिम्मेदारी लूँगा। आप चिंता मत करो। अब आप भी थोड़ा अपने लिए जी लो, मम्मी।”

कप से उठती कॉफ़ी की भाप में जैसे एक नया रिश्ता बन रहा था —
जहाँ सुमेधा अब सिर्फ़ पत्नी या बहू नहीं,
एक इंसान भी थी, जिसकी अहमियत सबने आखिरकार समझ ली थी।


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