बात उन दिनों की है जब मैं अपने मायके गयी हुई थी। अभी बेटी KG में है तो कभी भी माँ के घर जाने की सहूलियत है। अपने घर के रोज़ के रूटीन से बोर होने लगती हूँ, और माँ का आँगन याद आने लगता है तब बस अपनी अटैची पैक करी और निकल गयी माँ से मिलने। पतिदेव से भी इस बात को लेकर चिक चिक नहीं होती।
माँ के घर जाते समय ट्रैन में भी सोचती रहती हूँ, चलो थोड़े दिन के लिए अपना बचपन जी लेंगे, थोड़े दिन के लिए जीवन के संघर्षों से पर्दा हो जाएगा, थोड़े दिन के लिए कुछ भी टाइम पर नहीं होगा तो टेंशन नहीं होगी और थोड़े दिन माँ के हाथ का खाना मिलेगा। मन में यही सारी बातें सोचेते सोचते अजीब सी खुशी महसूस होती है।
मेरी बेटी भी अपनी नानी और नानू से बेहद प्यार करती है, खाना भी नानी के हाथ से खाना पसंद है उसे। उस दिन माँ ने खाने में दाल बनाई लेकिन मेरी बेटी ने दो कौर खा कर अपनी नानी से खाने को मना कर दिया, उन्होंने मुझसे पूछा अगर वो कुछ और खाये तो बना देंगी, लेकिन बेटी ने मना कर दिया। मेरी बेटी खाने में बहुत चूज़ी है, और शायद उसकी उम्र के ज़्यादातर बच्चे होते हैं। थोड़े दिन तक माँ ने मेरी बेटी का रवैया नोटिस किया, खाना पूरा न खाना, जंक फ़ूड के लिए ज़िद करना, और भी ऐसे ही मुश्किले जो शायद आप में से कई लोग फेस करते होंगे। माँ समझ गयीं थीं, की उसे खाने का महत्व समझाने का वक़्त आ गया था।
अगले दिन माँ मुझे और मेरी बेटी को एक पार्क में लेकर गयीं। वहाँ बहुत से झूले थे , बेटी खेलने में व्यस्त हो गई। देखते ही देखते रात हो गयी, जब हम पार्क से निकले तो देखा की पार्क की दीवार से सहारे कई सारे भिखारी परिवारों ने अपने सोने का ठिकाना बना लिया था। दिन में धूप के कारण कहीं और रहते होंगे और शाम होते ही पार्क के किनारे अपना बिस्तर बिछा लेते। उन परिवारों में से कोई मिट्टी के चूल्हे पर बाजरे की रोटी बना रहा था, कोई अपने बच्चों को चुपा रहा था, कोई बर्तन घिसनें में लगा था तो कोई लोगों से हाथ जोड़ कर कुछ खिलाने के लिए फरियाद कर रहा था।
मेरी बेटी ये नज़ारा देख कर कुछ हैरान थी और उसने माँ से पूछा " नानी ये लोग यहाँ क्यों रहते हैं, अगर बारिश आ गयी तो ये सब भीग जाएंगे ना? " माँ ने उसकी बात का जवाब देते हुए कहा " बेटा इनके पास तुम्हारे जैसा घर नहीं है, तुम्हारे जैसे अच्छे अच्छे कपड़े भी नहीं हैं, ये बच्चे तुम्हारी तरह स्कूल भी नहीं जाते बल्कि पूरा दिन कहीं भीख मांगते हैं, और तब जाकर इन्हें खाना खाने को मिलता है। और जब किसी दिन भीख नहीं मिलती तो उस दिन बिचारे भूखे ही सो जाते हैं। " अब मैं माँ का हमे पार्क लाने का उद्देश्य समझ चुकी थी और इसलिए चुप चाप दोनों की बातें सुनती रही। माँ ने आगे कहा " बेटा तुम जो खाना नहीं खातीं उसी खाने के लिए यह सब लोग भीख मांगते हैं, क्योंकि इनके पास इतने पैसे नहीं कि खाना खरीद कर खा सकें। सोचो तुम कितनी लकी हो कि तुम जो चाहती हो वो खा सकती हो, जब मन चाहा पिज़्ज़ा, बर्गर, कोल्ड ड्रिंक्स पी सकती हो ......है ना?"
मेरी बेटी यह सब चुप होकर सुन रही थी, उसने मुझसे कहा" माँ आप जो बिस्कुट का पैकेट मेरे लिए लायी हो क्या मैं उस छोटे बच्चे को दे सकती हूँ"? मैन फ़ौरन उसे बिस्कुट का पैकेट थमा दिया, उसने वो पैकेट उस गरीब बच्चे को देते हुए कहा " ये बहुत टेस्टी है तुम्हे अच्छा लगेगा और भूख भी खत्म हो जायेगी"। यह सुनकर मैन माँ को देखा और उनके लिए मेरे मन में इज़्ज़त और बढ़ गयी।
हम लोग घर वापस आ गए, और हैरानी की बात ये थी कि आज मेरी बेटी ने पूरा खाना खत्म करा, उसके नानू के यह पूछने पर की आज यह चमत्कार कैसे हुआ मेरी बेटी ने झट से जवाब दिया " नानू मैं लकी हूँ ना, क्योंकि मुझे इतना अच्छा खाने को मिला है और अगर मैं खाना नहीं खाऊँगी तो भगवानजी गुस्सा हो जाएंगे और मुझे भी फिर उन बच्चों की तरह खाना नहीं मिलेगा।" पापा समझ गए कि आज माँ ने अपनी जादू की छड़ी घुमा दी थी।
मैने माँ को धन्यवाद दिया क्योंकि उन्होने मेरी बेटी को वो शिक्षा दी जो शायद एक घर का बड़ा बुज़ुर्ग ही दे सकता है। बच्चे जो अपने दादा दादी या नाना नानी से सीखते हैं उसे कभी नहीं भूलते और खासकर तब जब सीख जीवन से जोड़ कर दी जाए।
इसलिए कहते हैं, घर में बुजुर्गों का होना बहुत ज़रूरी है, क्योंकि जो संस्कार माँ बाप नहीं दे पाते वही संस्कार बड़े बुज़ुर्ग आसानी से बच्चों के अंदर फूँक देते हैं।
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