"ममता जल्दी करो यार मेरी फ्लाइट मिस हो जाएगी"
" बस-बस हो गया ये लो आपका बैग इसमे आपके जरूरत के हिसाब से सब कुछ रख दिया है मैंने, अच्छा सुबोध सुनों ना रास्ते मे मुझे बुआ जी के घर छोड़ दोगे क्या, उनके घर पूजा है बड़े प्यार से बुलाया है उन्होंने मुझे। देखों मैं तैयार भी हू"
सुबोध-"पागल हो गई हो क्या अब मैं तुमको ढो के वहाँ छोड़ू, और ये क्या इधर उधर घूमने का प्लान करती रहती हो, घर मे रहो और भी बहुत काम रहते है घर मे, बस जब देखो यहाँ जाना है वहाँ जाना है।" ममता चुप चाप पति की बात सुनती रही। उसका उदास चेहरा देख के सुबोध ने कहा -"अच्छा ठीक है मैं नही छोड़ सकता बच्चों के साथ चली जाओ।"
ममता अपने बेटे मणि के पास आती है जो इस वक्त क्रिकेट मैच में पूरी तरह से डूबा हुआ है। "बेटा ये लो नाश्ता, अच्छा सुनों ना आज तो तुम्हारे कॉलेज की छुट्टी है ना, चलो ना बुआ जी के घर चलते है आज पूजा है उनके घर" मणि जो कि मैच देखने में व्यस्त है-"क्या माँ मैं इतना इम्पोर्टेन्ट मैच छोड़ कर आपके साथ पूजा में चलु, आप रूही के साथ चली जाओ, कैब बुक करवा देता हूं। मैं इतना रोमांचक मैच नही छोड़ सकता।" ममता फिर उदास हो गई-"ठीक है बेटा नास्ता कर लो वरना ठंडा हो जाएगा।"
ममता अब अपनी अर्जी ले कर रूही के पास आई जो कि इस समय अपने मोबाइल में बिजी थी-"रूही ये लो तुम्हारी ब्लैक टी, अच्छा सुनो ना मैं ये कह रही थी कि चलो ना आज मैं और तुम बुआ जी के घर चलते उनके घर पूजा है, मणि कैब बुक करवा देगा, आते समय दोनों माँ बेटी खूब सारी शॉपिंग करते हुए आएंगे कितना मजा आएगा ना।" पूजा-पाठ के नाम से रूही ने ऐसा रियेक्ट किया जैसे कि वेजेटेरियन के सामने नॉनवेज डिश का नाम ले लिया हो-"पूजा??? नो वे मम्मा, आज मेरा पहले से ही प्लान फिक्स है, अभी सिम्मी के साथ शॉपिंग पे जाऊगी फिर रात में मोना के साथ डिनर, आप ये फालतू के प्लान में मुझे शामिल मत करो। ममता ने बड़े प्यार से कहा-"बेटा तुम अपनी सहेलियों के साथ शाम को चली जाना, हमको कौन सा ज्यादा समय लग जाएगा।" " नो मम्मा मेरा प्लान पहले से बना हुआ है।"
सभी लोग अपनी-अपनी जिंदगी में व्यस्त थे, एक ममता ही थी जिसे अपनी जिंदगी से ज्यादा फिक्र बाकी लोगों की थी, लेकिन सुकून के नाम पे कुछ नही था उसके पास। वो सब को साथ ले कर चलना चाहती थी लेकिन सब अपनी अपनी दुनिया मे मस्त थे। हां उन सब को ममता की तब याद आती थी जब कुछ जरूरत हो।
"ममता सुनो ना बिजली बिल जमा नही कर पाया हूं तुम कर देना ना याद से" सुबोध अपना फरमान सुना कर चले गए। "मम्मा प्लीज् कुछ अच्छा सा खाना बना दो ना मेरी फ्रेंड्स आएंगी आज घर" ये थी रूही की डिमांड। "माँ मैंने कपड़े प्रेस करवाने के लिए दिए थे आप ले आना ना मैं जा रहा दोस्त के घर मैच देखने" ये था क्रिकेट प्रेमी मयंक।
ममता सब की सुनती पर उसकी कोई नही सुनता। ममता ने सोचा कि कही बाहर का फैमिली ट्रिप बनाते है जिससे सब फैमिली एक साथ एन्जॉय कर पाए, इस बारे में उसने सुबोध से बात की सुबोध ने ममता को समझाया-"अरे तुम भी ना बस घर मे बैठे बैठे यही सब सोचो, तुमको पता नही कितना काम है मुझे ऑफिस में, ये प्लान तुम अगले साल बनाना" हाँ हर साल बनाती हूं प्लान और यही कह के प्लान फेल कर देते हो मेरा।" ममता ने रुखाई से कहा, फिर बात को संभालते हुए-"सुनो ना देखो ना कितनी मस्त जगह है शिमला, मैंने तो मोबाइल में सब देख लिया है, होटल भी यही से बुक कर सकते है।" अब सुबोध ने गुस्से से कहा-"जा के चाय बना के लाओ।" जी कह के ममता किचन में चली गई।
दूसरे दिन ममता बैग पैक कर के कमरे से निकली सब के सब आश्चर्य में पड़ गए "अरे मम्मा ये क्या है कहा जा रहे हो आप"रूही ने पूछा। "वो बेटा मैं शिमला जा रही हूं" सब के चेहरे के रंग उड़ गए।
सुबोध-"अरे ये क्या बात हुई अचानक से शिमला का प्लान कैसे बन गया तुम्हारा??" अरे कल ही तो बताया था मैंने, आप लोग फ्री नही हो लेकिन मैं तो हू ना।
मयंक-"पर मम्मी आप कैसे जाओगे अकेले आप भी ना कुछ सोचते समझते नही हो।" बेटा जो तुम दोनों बच्चों को पाल के इतना बड़ा कर सकती है वो अपना ध्यान भी खुद रख सकती है।
रूही-"लेकिन आपके जाने के बाद हमारा क्या होगा खाना, नाश्ता कैसे करेंगे हम ये सब" अरे बेटा इतनी बड़ी हो गई हो अब तो खुद से कुछ कर लिया करो, वैसे आप लोग परेशान मत होइए मैंने खाने और नास्ते के लिए बाई को कह दिया है वो सब कर देगी। चलो मैं चलती हू, ट्रेन होटल सब मैंने यही से बुक करवा दिया है, कैब भी आती ही होगी।
ममता के इस रवैये से सब परेशान हो गए, जो अभी तक ममता के साथ जाने के लिए तैयार नही थे अब ममता से कहने लगे साथ चलने को। लेकिन ममता इस बार राजी नही हुई, आज वो खुद के लिए जीने जा रही थी, सब ने रोका लेकिन ममता नही मानी। "आप लोग क्यों परेशान हो रहे है मैं चली जाऊँगी, सुबोध आपके पास तो ऑफिस का ढेर सारा काम है ना, और रूही बेटा आपके तो कितने सारे प्लान है सिम्मी और मोना के साथ, और मयंक तुम्हारा तो हर दिन कोई ना कोई मैच रहता ही है तुम भी कैसे जाओगे, मैं खुद ही चली जाऊँगी, आप सब ने कभी नही सोचा कि मेरी भी कुछ इच्छाएं है, लेकिन आप लोगो ने तो बस एक नौकरानी ही समझ रखा था, आज तक आप सब के लिए जीती थी लेकिन आज जा रही हूं मैं खुद के लिए जीने। मैं तो अपने बच्चों में अपनी खुशियां ढूंढती थी लेकिन तुम दोनों को कभी मेरी खुशियों से मतलब नही था, मैं माँ हू नौकरानी नही। मुझे भी अपनी मर्ज़ी से जीने का हक़ है। इतना कह कर ममता अपना बैग ले कर चली गई। सबको अपनी गलती का अहसास हुआ लेकिन तब तक देर हो चुकी थी, ममता अकेले ही अपने सफर में चली गई।
आजकल अधिकतर घर मे ऐसी बातें देखने को मिल जाती है, कहानी चाहे हर घर की अलग हो लेकिन माँ की हालत एक नौकरानी जैसी हो जाती है, जिसने अपनी ज़िंदगी हमारा जीवन बनाने में लगा दिया हमे भी उस माँ के लिए कुछ तो सोचना ही चाहिए। आखिर वो माँ है उसे माँ जैसी जगह दे।
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