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अधूरा बचपन

 माँ माँ वह फुग्गा दिला दो ना!!


थोड़ी देर बाद वह बालक फिर से जिद कर उठा अच्छा माँ तो वह बांसुरी तो दिला दो!!


वो देखो वह चाबी वाली कार!!


उसकी माँ जड़वत हो, अपने लाल का हाथ थामे मेले के भीड़ में से गुजरकर अपनी झोपड़ी की ओर जा रही थी।


छोटू रो पड़ा।


जाओ मैं तुमसे बात नहीं करता।


वह हाथ छुड़ाकर गली में भाग गया।


अभी कुछ दिनों पहले ही उसके पिता सड़क दुर्घटना में असमय चल बसे थे।


छोटू की माँ ने पति के विछोह में व खान पान की कमी से जल्द ही बिस्तर पकड़ लिया।


झोला छाप डॉक्टर ने सुई व बॉटल चढ़ाते हुए कुछ दवाइयाँ लिखकर भी दे दीं।


माँ ने बड़े बेमन से आखिरी बचे पैसे डॉक्टर को सौंप दिए।


और लड़खड़ाते हुए वह घर पहुँचकर बिस्तर में ऐसे गिरी कि फिर उठ न सकी।


अब अपनी माँ की तीमारदारी का जिम्मा छोटू पर ही था।


वह दवा की पर्ची थामे मेडिकल दुकान पर पहुँचा।


दुकान वाले ने सशंकित हो उससे पूछाकितने पैसे लाया है !!


छोटू कुछ कह न सका।


उसे काठ का बना देख मेडिकल वाले ने झल्लाकर पर्ची उसकी ओर फेंकते हुए कहाइसे क्या तूने खैरात खाना समझ रखा है जो मुँह उठाये चला आया। डेढ़ सौ रुपये हैं नहीं और ख्वामख्वाह मेरा वक्त बर्बाद किया। बड़बड़ाते हुए वह पूरे अदब के साथ दूसरे ग्राहक को दवा देने लगा। आज छोटू को पता चला कि दवा लेने के लिए भी पैसे देने पड़ते हैं।


अब वह पैसों की खातिर काम की तलाश में निकल पड़ा।


दिन भर खाक छानने के बाद उसे एक मिस्त्री के गैराज में गाड़ी धोने का काम मिल सका।


उसने बड़े मनोयोग से बाइक धोई। उसके नन्हे कोमल हाथों से धोने वाला कपड़ा व ब्रश बार बार छूट जाता था जिस पर दुकान का मालिक उसे बार बार झिड़कता।


दरअसल वह तो सुबह से भूखा था।


शाम के अंधेरे में मालिक ने उसे सौ रुपये थमाते हुए कहाआज तो फिर भी तुझे इतने सारे पैसे दे रहा हूँ लेकिन कल सुबह छह बजे से काम पर आ जाना।


छोटू उन पैसों को ध्यान से देखने लगा कि उसका मालिक फिर से चिल्लाकर कहने लगाअबे!! लगता है कि तूने जिंदगी में इतने सारे पैसे कभी देखे नहीं।


पर माँ की दवाई तो डेढ़ सौ रुपये कीलेकिन उसकी आवाज मालिक की हो हो की हँसी में दबकर रह गई।


अब वह फिर से मेले के बीच वाले रास्ते से गुजरने लगा।


फुग्गे ले लो! रंग बिरंगे फुग्गे ले लो!!


छोटू ने चहककर उससे पूछाअंकल!! यह कितने की है? दस रुपइया की है बाबू जी !! डुगडुगी बजाते हुए फुग्गे वाला बोला। छोटू ने अपने हाथ में कसकर भींचे नोट को देखा। कि तभी उसे याद आया माँ की दवाई।


अस्फुट स्वर से यह दोहराते हुए वह आगे बढ़ गया।


सामने सड़क पर चाबी वाली रंगीन कारों का ढेर पड़ा था। उसके चलते तेज कदम ठिठककर रह गए।


पचास रुपये की कार दौड़े सरपट लगातार!


लाल पीली नीली कार बाबू चलाये जो हो होनहार!!


स्वरचित लुभावने बालछंद में गाड़ी वाला अपने मधुर कंठ से यह आमंत्रण गीत गा रहा था। जिसे सुनकर कई बच्चे अपने माता पिता से वह खिलौना दिलाने की जिद कर रहे थे। और उनके अभिभावक हंसते हंसते उनकी यह बालहठ पूरी भी कर रहे थे।


पर माँ की दवाई?


छोटू अब और भी तेज कदमों से बढ़ने लगा।


तभी दिन भर के भूखे बालक को एक पहचानी सी मीठी गंध ने सरोबार कर दिया। उसके ठीक बाजू से अपने सिर पर जलेबी और समोसे की टोकरी थामे आदमी पुकार रहा थासमोसा गरम, जलेबी नरम खाये वो दीवाना जिसके हो अच्छे करम!!


सुनकर छोटू बेपरवाह होकर आगे बढ़ गया। सामने ही बाँसुरी वाला मधुर स्वरलहरी में बाँसुरी बजा रहा था। छोटू ने एक झलक उसकी ओर देखा। उसे आज बाँसुरी की ध्वनि कर्कश प्रतीत हो रही थी और वह यह कहते हुए आगे बढ़ गयानहींनहींमाँ की दवाई!!


जल्द ही वह मेडिकल दुकान की ऊंची सीढ़ियों पर खड़ा था।


दुकान वाले ने उसे देखते ही पहचान कर कहा।


तू फिर से आ गया!!


पहले पैसे आगे रख तब बात करना। छोटू ने हथेली में अपने 'बचपने का गला घोंटकर संभाला' वह मुड़ा तुड़ा नोट दुकानदार के आगे कर दिया।


अब दुकान वाला फुर्सत में था। उसने नोट को कई बार उलट पुलट कर देखा और मजाक करते हुए कहने लगा। अबे!! नकली नोट तो छापकर नहीं लाया? लेकिन तेरी दवाई तो पूरे डेढ़ सौ की आएगी। ठहर मैं तुझे अभी सौ रुपये की ही दवाई दे देता हूँ, कहकर वह स्ट्रिप काट कर उसे देने लगा। नन्हा बालक बस यंत्रवत उसे देखे जा रहा था। दवा लेकर वह दौड़कर घर पहुंचा।


घर पर अंधेरा छाया हुआ था। वह माँ माँ चिल्लाता हुआ घर के भीतर दाखिल हुआ ही था कि तभी अचानक वह किसी ठंडी चीज से टकराकर गिर पड़ा।


उसने अँधेरे में टटोलते हुए माचिस ढूंढकर मिट्टी तेल वाली बाती सुलगाई। जैसे जैसे उसकी रोशनी बढ़ती जाती थी वैसे वैसे उस बालक की ममता की छाँव बड़ी होकर उससे दूर होती जाती थी। अब पूरे कमरे में रोशनी छा गई थी और छोटू के जीवन में अंधेरा।


उसके सामने जमीन पर पड़ी ममता की निर्जीव मूरत पथराई आंखों से उसे ही निहार रही थी।


वह तीव्र आवेश में पछाड़ें खाकर माँ से लिपटकर क्रंदन करने लगा।


पर उस प्राणविहीन ममतामयी मिट्टी की मूरत के पखेरू तो न जाने कबके उड़कर उस अनंत लोक में जा पहुँचे थे जहाँ से कभी कोई वापस नहीं आता।


इधर दुनिया का मेला खत्म हो चुका था। उस बालक के घर के आगे से वही फुग्गे, बाँसुरीवाले, खेल खिलौने, जलेबीवाले उस मासूम का 'अधूरा बचपन' साथ लेकर, दबे कदमों से चुपचाप अपने अपने घरों की ओर वापस लौट रहे थे।


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