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वो सुबह कभी तो आएगी

 मोबाइल पर स्क्रॉल करते हुए एक तस्वीर पर अचानक नजर ठिठक गई । अरे ! यह तो बिंदिया है ! बिंदिया आज हवाई जहाज में सफर कर रही है । अपनी बेटी और दामाद के साथ उसकी तस्वीर कितनी प्यारी लग रही है । रंग-रूप बिल्कुल बदल गया है । ठीक ही कहते हैं, "सब दिन एक जैसा नहीं रहता ।

बिंदिया जब दुल्हन बनकर आई थी तो पूरे गाँव में शोर मच गया था। इतनी सुंदर दुल्हन गाँव में पहले नहीं आई थी । गाँव की औरतें बार-बार दुल्हन देखने आतीं। बिंदिया की सास गर्व से अकड़कर दरवाजे पर बैठी रहती। औरतों से कहती "दुल्हन है कि तमाशा है, बार-बार क्यों देखना है ।" औरतों के मुंह से दुल्हन की सुंदरता की बातें सुनकर चौपाल पर मर्दों के बीच खुसर-फुसर बढ़ गई थी। इन बातों से अनभिज्ञ बिंदिया नई दुल्हन होने के आनंद में मग्न थी । अभावग्रस्त परिवार में पली-बढ़ी बिंदिया को तो नई ज़िंदगी मिल गई थी । रोज पहनने के लिए नई-नई साड़ियां, साज-श्रृंगार उसे बड़ा मन भाता था । सुंदर तो वह थी ही, दुल्हन का श्रृंगार उसकी सुंदरता पर चार चांद लगा देता था । इस खूबसूरत दुनिया में वह इतनी मगन थी कि उसे यह अहसास भी नहीं था कि उसका यह श्रृंगार किसके लिए है । सौंदर्य के उड़नखटोले में स्वर्ग की सैर पर निकली बिंदिया उस वक्त धड़ाम से आ गिरी जब एक दिन उसके पति की तबियत खराब होने पर लोगों के मुंह से सुना कि इसकी तो शादी ही नहीं करनी चाहिए थी । बिंदिया का पति दिमाग से कमजोर था और उसे दौड़े भी पड़ते थे।

बिंदिया कुछ दिनों तक परेशान रही लेकिन जल्द ही परिस्थिति से समझौता करने का फैसला कर लिया । वह जब अपने अतीत को याद करती तो लगता, जैसा भी है, यहाँ जीवन बेहतर है। घर में पति और सास के अलावा एक देवर भी था, विजय ! जो घर का मालिक भी था । मालिक इसलिए कि पिता की मृत्यु के बाद अनुकम्पा की नौकरी और घर की जिम्मेदारी उसी ने हथिया रखी थी । एक छोटी ननद भी थी जो अपने ससुराल जा चुकी थी । धीरे-धीरे बिंदिया की खुशियों पर सास और देवर नकेल कसने लगे । वह दुल्हन से नौकरानी के रूप में परिवर्तित होने लगी। उसके खाने-पीने पर भी रोक-टोक किया जाने लगा । सास और देवर के लिए बढ़िया खाना बनता और बिंदिया और उसके पति के लिए रूखा-सूखा । छोटी-सी गलती होने पर भी पिटाई होने लगी । एक दिन उसका पति विनय उसे बचाने आया । यह देखकर  विजय आगबबूला हो गया ।  वह इस उठते फन को अभी कुचल देना चाहता था । उसने विनय की खूब पिटाई की और महीने भर कमरे में बंद रखा। अब बिंदिया इस पिंजरे में में बिल्कुल अकेली थी । बेचारी करती भी क्या ! माता-पिता की गरीबी ने मायका का भी रास्ता बंद कर दिया था । वह अपनी किस्मत पर रोती रहती  "भगवान ने मुझे बेटी के रूप में गरीब बाप के घर क्यों पैदा किया ? आज वे सक्षम होते तो मैं इस जेल में बंदिनी न होती ।" कभी-कभार ननद आती तो बिंदिया खूब आवभगत करती लेकिन कमजोर डाल पर कौन लटकता है भला ? वह भी अपनी मां का ही पक्ष लेती ।

आखिर बिंदिया ने हाथ-पांव मारना बंद कर दिया और नियति के प्रवाह में बहने लगी । वह एक बेटी और एक बेटे की मां बनी । अपने साथ-साथ अपने बच्चों के दुर्भाग्य पर रोती रहती। इधर देवर विजय का भी परिवार बसा । लेकिन वह अब अपने भतीजे के फन कुचलने की साजिश करने लगा । बचपन से ही उसे डराकर रखता । किशोरावस्था आते-आते वह अपने चाचा से भिड़ने लगा। एक दिन वह भी लड़-झगड़कर घर छोड़कर चला गया । विजय की साजिश सफल हुई और बिंदिया के जीवन में सुख की कली खिलने से पहले ही मुरझा गई । अब एक बेटी रह गई सो वह अब दिन-रात बेटी की चिंता में घुलती रहती । सोचती, एक तो मेरी किस्मत फूटी थी और इस फूटी किस्मत में भगवान ने बेटी देकर कहीं का न छोड़ा । बेटी की उम्र के साथ उसकी चिंता भी बढ़ती जा रही थी । भगवान से रोज विनती करती "हे भगवान ! मेरे जैसी किस्मत मेरी बेटी की न हो ।" सुबह तो रोज होती थी पर बिंदिया का जीवन निरंतर अंधेरे की ओर बढ़ता जा रहा था । लेकिन सुबह होने से कौन रोक सकता है । बिंदिया की बेटी रागिनी अब एक यौवन से भरपूर सौन्दर्य की प्रतिमूर्ति बन चुकी थी । एक दिन पड़ोस के घर में शादी में आए मेहमानों में से एक महिला ने आकर बिंदिया की बेटी का हाथ मांगा वह भी बिना दहेज के । पहले तो बिंदिया बहुत खुश हुई लेकिन अगले ही पल उसने मना कर दिया । सभी चौंक गए । सास ने भी समझाया "पागल हो गई है क्या! इतना अच्छा रिश्ता क्यों ठुकरा रही है । बाप तो किसी लायक है नहीं, तू क्या जिंदगी भर बेटी को सिर पर रखेगी ?"

"नहीं! बेटी की शादी तो जरूर करूंगी पर किसी की दया पर नहीं । पहले मैं लड़के से मिलूंगी तभी शादी की बात होगी ।"

तभी लड़का अपनी मां के साथ अंदर आकर बोला "मुझपर भरोसा कीजिए आंटी जी ! मैं आपकी बेटी को बहुत प्यार से रखूंगा।" कहकर उसने बिंदिया के पांव छू लिए। बिंदिया उसे एकटक देखती रह गई । देखते-देखते रागिनी दुल्हन बन ससुराल चली गई। बिंदिया की सास भी कुछ दिनों से बिस्तर पर पड़ी थी । बिंदिया ने खूब सेवा की । एक दिन वह बिंदिया को अपनी सेवा से मुक्त कर भगवान के पास चली गई ।

अब विनय और बिंदिया अपने ही घर में बंधुआ मजदूर की तरह काम करते और रूखा-सूखा खाकर दिन काटने लगे । पिछले वर्ष गांव जाना हुआ तो संयोग से वह अपने छत पर नजर आई । बहुत दिनों बाद देखा था इसलिए पहचानना मुश्किल हो रहा था। वह रूप-सौन्दर्य, जिसके कभी चर्चे हुआ करते थे, कहीं खो गया था । वह एक हड्डी का ढाँचा मात्र रह गई थी। रूखे-से बाल, कांतिहीन एवं भावशून्य चेहरा उसकी सौन्दर्यकथा को झुठला रहे थे । वह छत पर बैठी मटमैले साड़ी को दांत में दबाकर अपना आधा चेहरा छिपाए गोबर के उपले बना रही थी। वहीं उसका पति सीढ़ियों से टोकरी में गोबर लेकर चढ़ रहा था । मैंने दूर से ही उसे देखा और मन ही मन उसके लिए बेहतर जिंदगी की कामना करने लगी ।

हाल ही में खबर मिली थी कि उसका बेटा लौट आया है, बड़ी कंपनी में नौकरी करता है । अपने माता-पिता को अपने साथ पुणे ले गया है । जानकर बहुत अच्छा लगा । लेकिन जब आज हवाई जहाज में सफर करते हुए उसकी तस्वीर देखी तो सचमुच मन को सुकून मिला । अन्य तस्वीरों में उसका पूरा परिवार था ; पति, बेटा, बहू, बेटी, दामाद और दो छोटे-छोटे नाती-पोते भी। बिंदिया का चेहरा आज फिर दमक रहा है, बिल्कुल वैसे ही जैसे वह दुल्हन बन कर आई थी । यह चमक थी सुख के सूरज की जो बड़ी तपस्या के बाद उसे मिला था और होठों पर सुकून भरी मुस्कराहट उसके सौन्दर्य में चार चांद लगा रही थी ।


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