मेरी सासू माँ दिल की साफ हैं , बस एक ऐसी आदत है वो है हर बात की नुक्ताचीनी करना , जिससे काफी परेशान हो जाती मैं ! बहू धीरे धीरे चला करो , चाय में पती कम डाला करो, बहुत डाल देती हो इसलिए चाय पीने में कड़वी लगती है , तुम्हें तनिक शरूर नहीं ससुर के सामने सर पर पल्लू रखा करो ,तुम्हारी माँ ने पता क्या संस्कार दिए हैं कि सुबह जल्दी नहाया ही नहीं जाता तुमसे , बच्चों को भेजकर नहाती हो , एक हमलोग का समय था कि सुबह का नहाना कोई नहीं देख पाया ! ऐसे रोक टोक से मन खिन्न हो जाता था पर क्या करती , आदत सी हो गई थी कि शायद मेरी सहनशील स्वभाव वश वो अब कम बोलती थी । उम्र का तकाजा था या मेरी बर्दाश्त करने की सीमा थी जिससे वो मुझे अपने अलमारी की चाभी दी थी कि मेरे लाॅकर में बहुत से जेवर हैं , उनकी सूची बनाकर अपने पास रखो , मुझे याद नहीं रहता है । बयासी वर्ष की सासू माँ की यादाश्त क्षीण होती जा रही थी और इस उमर में हम पे निर्भर थीं वो , तो मैं उनकी सेवा टहल में कोई कसर नहीं छोड़ती थी ।
एक ही ननद है , गर्मी की छुट्टी में आती रहती है और एकाध महीने बीताकर चली जाती । ननद की एक खराब आदत थी , जिससे सासू माँ बहुत ही दुखी रहती , हमेशा ननद को पैसे की किल्लत रहती और पैसे का रोना रोते रहती कि ये खर्चा है वो खर्चा है और मायके से जाते समय भारी भरकम रकम सासू माँ से ऐंठ कर ले जाती । सासू माँ को पेंशन भी सतर पचतर हजार के आसपास मिलता , हमारे ससुर जी डी एम से रिटायर्मेंट हुए थे इसलिए संपन्न परिवार है हमारा । ससुर मना करते कि इस तरह पैसे मत दिया करो पर वो नहीं सुनती । खैर , इस बार ननद अनिता अकेले ही मायके पधारी और माँ से उनके जेवर में से सीता हार की मांग की हैं। सासू माँ बोली _ देख अनिता अब हमसे जेवर कपड़ा लता नही संभलता इसलिए बहू नीतू के जिम्मे सौंपा है वो ही सब संभालती है । ऐसे कैसे माँ ? आप बहू को अभी से मालकिन बना दी हैं , सब अपने पास रख लेगी तब हाथ मलते रह जाओगी? समझी !
सासू माँ अपनी बेटी के कुबुद्धि से वाकिफ थीं , जानती थीं कि अनिता अपनी भाभी के खिलाफ कान।भरने की चेष्टा कर रही है ? जो कि निराधार है , आज तक बहू ने कभी भी पैसे नहीं माँगे , ना ही कोई और चीज की डिमांड की ? फिरभी मैं उसके आचरण पर नुक्ताचीनी करती रही ? एक ये मेरी बेटी है जो कि मायके को लूटने आती है और मैं भी कभी दस बीस हजार हाथ में पकड़ाती रही , इसलिए इसका सुरसा जैसा मुँह खुल गया है तभी तो अभी पैसे नहीं मांग रही, बल्कि अपनी दादी का जड़ाऊ सोने का सीता हार की फर्माइश कर रही है । अब इसे उसके हद क्या है , जतलाना होगा ।
अनिता बेटा ! सीता हार पर तेरी भाभी का सौ प्रतिशत अधिकार है , वो मेरे कुलवधू है और सीता हार उसे ही मिलेगा । तेरी दादी को उनकी सास ने दिया था , दादी ने मुझे दिया , अब मैं अपनी बहू को दूंगी । ठीक है बेटा , तुझे क्या कमी है ससुराल में ? तेरे दोनों बच्चे जॉब कर रहे , दामाद भी प्रोफेसर हैं , चारमंजिला मकान है तेरा , अच्छा खासा किराया मिलता है तुझे । तेरी सास ससुर भी गाँव में रहते हैं , साल में कभी कभार आते हैं , खाना बनाने से लेकर झाड़ूपोंछा तक के लिए आदमी है तेरे पास , फिर भी अपनी भाभी की चीजों पर कुदृष्टि डाल कर पापी मत बन ? जा अपनी सास से जेवर माँग , उन्होंने ने भी पहले के खानदानी गहने दबा के रखे होंगे । अरे माँ क्या कह रही हो तुम ? होश में हो ना , मेरी सास मुझे गहने थोड़े देगी , वो तो छोटी वाली देवरानी को ही होगी , पूरे आत्मविश्वास के साथ अनिता अपनी माँ से बोल पड़ी व सासू माँ भी कम नहीं थी , कहने लगी कि तेरे सास ससुर की सेवा करती है तेरी देवरानी, तेरा देवर गाँव की खेती बाड़ी, घर द्वार देख रहा , सब कुछ संभाल रहे हैं वो दोनों , इसलिए उन धरोहर पर उनलोगों का हक है । तुम शहर में ठाट से रहती हो , कभी अपने ससुराल के गाँव नहीं जाती ? ना ही सास ससुर देवर देवरानी को अपने पास बुलाती हो ? फिर उम्मीद क्यों ? कोई क्यों कर तुम्हें अपना सौगात दे ? सास ससुर की सेवा जो करे , उनके कड़वे बोल को सुने , कभी पलटकर जवाब ना दिया करे , ऐसी बहू को ही सब कुछ मिलना चाहिए इसलिए मेरे जेवर पर बहू नीतू का है और तुम्हारी सास के गहनों पर तेरी देवरानी का अधिकार है । जो सेवा करेगा उसी को मेवा मिलेगा । इसलिए खबरदार कभी हमसे कुछ मांगी ?
तुरंत मुझे बुलाकर सासू माँ ने सीता हार मेरे गले में पहना दिया , उनका यह स्नेह पाकर गदगद हो गई मैं और ननद अपना सा मुँह लेकर रह गई।
आज सासू माँ नहीं हैं ससुर भी पिछले महीने गुजर गए,
अब सास की नुक्ताचीनी याद आती है तो चेहरे पे मुस्कान आ जाती है कि उनके इस बर्ताव के पीछे प्यार का तरीका था या यही उनका प्रेम जतलाए जाने सलीका था , पर हाँ वो सब रोक टोक की वजह से अपने सारे नाते रिश्तेदार में मेरी पहचान बनी कि मैं सभ्य सुशील हूँ। इसलिए मेरी नजर में अपनी सास का कद ऊंचा हो गया है ।
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