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फ़ौजी

 रात के बारह बज रहे थे। स्टेशन लगभग सुनसान हो चला था। प्लेटफॉर्म की पीली रोशनी के नीचे एक युवती अपने पति के साथ जल्दी-जल्दी कदम बढ़ा रही थी। हवा में ठंडक थी, लेकिन उसके माथे पर पसीना झलक रहा था। “अमित, सुनो… इस बोगी में मत चढ़ो, देखो न, एक भी औरत नहीं है वहाँ,” उसने घबराए स्वर में कहा। “मुझे डर लग रहा है, सब फौजी लग रहे हैं। लोग कहते हैं कि फौजी लोग बहुत सख्त होते हैं, औरतों से अच्छा बर्ताव नहीं करते।”

अमित ने उसकी ओर देखा और धीमे से मुस्कुराया। “नैना, तुम भी ना, सुनी-सुनाई बातों पर इतना भरोसा क्यों करती हो? अगर फौजी बुरे होते, तो हम आज चैन की नींद कैसे सो पाते? वही तो हमारी नींद और जिंदगी की हिफाजत करते हैं।”

“पर…” नैना कुछ कहने ही वाली थी कि ट्रेन के सीटी बज उठी। वो लोग जल्दी से उसी बोगी में चढ़ गए। रात गहरी थी, सन्नाटा गाढ़ा। नैना ने दुपट्टा कसकर सिर पर लिया और खिड़की से बाहर देखने लगी। सामने कुछ जवान फौजी बैठे थे—थके हुए से, लेकिन उनके चेहरों पर सुकून था। हाथ में टीपॉय रखा, उस पर स्टील के डिब्बे और टिफिन।

अमित की तबीयत कुछ ठीक नहीं थी। उसके माथे पर पसीना था, और आंखें थकी हुईं। नैना ने पानी निकाला, लेकिन बोतल खाली थी। वो हिचकिचाई, और फिर पास बैठे एक फौजी की तरफ़ देखने लगी। फौजी ने शायद उसकी झिझक को पढ़ लिया। उसने उठकर कहा, “भाभी जी, ये लीजिए पानी। आप परेशान लग रही हैं। भैया ठीक हैं ना?”

नैना ने डरते हुए बोला, “थोड़ी तबीयत खराब है इनकी… बस दिल्ली तक पहुँच जाएँ, तो डॉक्टर दिखा देंगे।”

फौजी ने हँसकर कहा, “अरे भाभी जी, तब तक तो बहुत वक्त है। आप लोग मेरी सीट पर चलिए। आराम से बैठिए। आदमी को ज़रा लिटा दीजिए, तबियत सुधर जाएगी।”

अमित ने पहले तो मना किया, पर उस फौजी की आँखों में ईमानदारी देख झिझक दूर हो गई। वो सीट पर चला गया। नैना अब भी हिचकिचा रही थी। तभी एक दूसरा जवान, लगभग उसकी उम्र का, पास आया और बोला, “बहन, घबराओ मत। हम सब यहाँ अपने देश की बहनों की इज़्जत की रखवाली करते हैं। अगर तुम चाहो तो मैं तुम्हें अभी भाई बना लेता हूँ।”

नैना ने अचरज से उसकी ओर देखा। “कैसे?”

“तुम्हारे आँचल का एक टुकड़ा फाड़ दो, और मुझे राखी बाँध दो। ताकि तुम्हें भरोसा रहे कि अब तुम हमारे बीच पूरी तरह सुरक्षित हो,” उसने मुस्कुराकर कहा।

उसकी आँखों में ऐसी सच्चाई थी कि नैना की आँखें नम हो गईं। उसने आँचल का किनारा फाड़ा, और काँपते हाथों से उस फौजी की कलाई पर बाँध दिया। बाकी फौजी तालियाँ बजाने लगे, “अब तो असली राखी का रिश्ता बन गया!”

वो रात नैना के लिए जैसे एक सबक बन गई। पूरे सफ़र में फौजियों ने अमित और नैना का ध्यान रखा। कोई उन्हें चाय लाकर देता, कोई काजू-दाने निकालकर खिलाता। एक ने तो बैग से दवा की स्ट्रिप निकाली और कहा, “भैया को ये दे दीजिए, शायद आराम मिले।”

ट्रेन जब दिल्ली पहुँची, तो स्टेशन की भीड़ के बीच उन फौजियों ने अमित और नैना को उतारा। उनके चेहरे पर थकान थी, पर मुस्कान भी थी। विदाई के वक्त एक जवान ने कहा, “भाभी जी, याद रखिए, अगर कभी डर लगे न, तो ये मत सोचना कि आप अकेली हैं। इस देश में हर फौजी आपकी रक्षा के लिए है।”

नैना की आँखों में आँसू थे। उसने कहा, “आप सब तो सच में भगवान जैसे हैं। लोग कहते हैं डरना चाहिए, पर अब मैं कहूँगी—‘अगर फौजी हैं, तो डर किस बात का!’”

उस दिन के बाद नैना हर साल रक्षाबंधन पर उन फौजियों को राखी भेजती रही। उनके नाम, रैंक और यूनिट नंबर उसने अपनी डायरी में लिख रखे थे। राखी के साथ हमेशा एक छोटा सा संदेश भी होता —

“जो हमारी नींद की रखवाली करता है, उसे राखी बाँधना मेरा सौभाग्य है।”

कई बार उन्हें जवाब में पोस्टकार्ड आते — “भाभी, हमने राखी बाँधी। अगले साल फिर भेजना। आप सबका आशीर्वाद चाहिए।”

वक़्त बीतता गया। अमित की तबीयत सुधर गई, नैना ने अपने छोटे से घर में उस रात की याद में एक फ्रेम टाँग रखी थी — उसमें फौजियों के साथ खिंचवाई तस्वीर थी।

हर बार जब रक्षाबंधन आता, वो उसी फ्रेम को साफ़ करती, अगरबत्ती जलाती और धीमे स्वर में कहती, “जो देश की रक्षा करता है, वो किसी माँ-बहन की आँखों में आँसू कैसे आने देगा?”

बाहर बारिश हो रही होती, और भीतर नैना के दिल में गर्व उमड़ता। उसे एहसास था — डर सिर्फ़ तब होता है जब हम अनजान होते हैं, पर विश्वास… वो हर डर को मिटा देता है।

और शायद यही विश्वास ही असली रक्षा कवच है —
जो सिर्फ़ देश की सरहदों को नहीं, हमारे दिलों को भी सुरक्षित रखता है।

मूल लेखक 

राही राज


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