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मां सब मुझे कौव्वा...कौव्वा कह चिढाते हैं

     हम अपने बच्चों पर बचपन से जाने-अनजाने में जो संस्कार करते हैं, वो संस्कार ही उनके जीवन को आकार देते हैं और उन्हें जीवन जीने का सही मार्ग दिखाते है. कई बार वे इन्हीं संस्कारों के चलते अक्सर खुद को अनहोनी परिस्थितियों से मुक्त करते हैं। ऐसी ही कहानी है काव्या की...

  माँ कविता और पिता मंगेश की लाडली बच्ची है काव्या. बचपन में ही माँ ने उसे सही-गलत का फर्क समझाया. आज के दौर मे अपनी लडकी को मोम की गुडिया बनाने की बजाय वह अपनी रक्षा खुद करने में सक्षम हो इसलिए माँ ने उसे कराटे सिखाये.

   काव्या बेहद बातूनी और मिलनसार थी इसलिए उसके बहुत सारे दोस्त थे। हरसाल उसके जन्मदिन पर बढने वाली दोस्तों की लिस्ट देखकर कविता को अपनी बेटी के मित्रताभरे व्यवहार पर नाज होता था.

  समय अपनी रफ्तार से गुजर जाता है।नन्हीं मुन्नी काव्या अब स्कूल खत्म कर कॉलेज जाने लगी। स्कूल और कॉलेज में बहुत फर्क होता है। बचपन से साथ रहने के कारण स्कूल में हर कोई अपने साथ रहने वाले दोस्तों के स्वभाव को जानता है. लेकिन कॉलेज में पहचान होने में समय लगता है। काव्या,जो किसी से भी दोस्ती करने में माहिर थी, वो कॉलेज के माहौल में किसी से भी घुलमिल नहीं पा रही थी।

क्योंकि कॉलेज में उसके जैसी लड़कियां बहुत कम थीं। काॅलेज की लड़कियों कि फैशन और उन्मुक्त  जीवन की जो परिभाषा थी उसमें काव्या  फिट नहीं बैठती थी. इसलिए कॉलेज में उसका मित्र परिवार बन नहीं पा रहा था.दो तीन लडकियाॅं छोड उसकी ज्यादा सहेलियाॅं  नहीं बनी थी.

  काव्या की एक आदत थी वह घर आकर अपनी मां से दिन भर की छोटी मोटी बाते शेयर करती थी. लेकिन पिछले कुछ दिनों से कविता काव्या में कुछ बदलाव देख रही थी. हमेशा खुशी से चहकती रहने वाली काव्या अब गिने चुने शब्द बोलकर अपने कमरे में बंद हो जाती थी. उसे दिन-ब-दिन यु खोई खोई, गुमसूम होते देख कविता घबरा गई। उसने उससे संवाद करने की भी कोशिश की लेकिन वह खुलकर बात ही नहीं करना चाहती थी।

  आजकल चारों ओर घट रही भयावह  घटनाओं को देखकर कविता मन ही मन भयभीत हो उठी.जब तक काव्या के दिमाग में क्या चल रहा है इसका पता नही चलेगा तबतक समझ में नहीं आयेगा की करना क्या है। उसने इस बारे में मंगेश से बात की, उसने भी उससे बात करने की कोशिश की लेकिन ... व्यर्थ।

कविता की परेशानी गुजरते दिन के साथ बढती जा रही थी... और एक दिन वजह सामने आ ही गयी.

   एक दोपहर जब वह बालकनी से सूखे कपड़े उतारने गई, तो उसने काव्या को किसी से जोर से बात करते हुए सुना।

   देखो, मुझे नहीं आना है... तुम्हें जाना है तो जाओ..

  नहीं, मतलब नहीं...हाँ हूं मैं अडियल, देहाती... अब मुझे दोबारा मत बुलाना.. don't call me understand... फिर कविता ने काव्या को फुट फुटकर रोते सुना. अब कविता ने उससे बात करने का फैसला कर किया।

क्या कहें.. कैसे कहें...इसी उधेडभून में उसने चाय का पतीला गॅस पर चढाया और खडी खडी सोचने लगी. चाय के दो कप थामे ड्राॅईंगरुम में आकर उसने काव्या को आवाज दी.काव्या बाहर आई. रोने से उसकी आंखें लाल हो गईं थी.

  गुड्डू,बिस्कीट खाएगी...

नहीं मम्मा,वह चुपचाप बैठ कर चाय पी रही थी.

  आज कॉलेज नहीं था क्या ?

था माँ.

  तुम गयी क्यों नहीं ?

वह चूप रही.

गुड्डू क्या हुआ...

सुनते ही काव्या रोने लगी। कविता उसके पास पहुंची और उसे गले से लगा लिया. कुछ देर बाद उसने रोना बंद कर दिया।

क्या हुआ गुड्डू?

मम्मा, कॉलेज में सब मुझे कौआ ..कौआ  कहकर चिढाते हैं।

क्यों बेटा?

काव्या ने सर झुका लिया और चुपचाप बैंठ गई।

बताओ बेटा क्या हुआ...

माँ, हमारी क्लास की हर लड़की का कोई न कोई बॉयफ्रेंड है...बॉयफ्रेंड के साथ घुमना फिरना, पार्टी में जाना, ड्रिंक्स, सिगारेट पीने वालों को सब माॅडर्न कहते हैं..और...और.. मैं...

  और क्या बेटा ...

मैं यह सब नहीं करती इसलिए मुझे कौआ..चाचीजी...ऑंटीजी... कहकर चिढाते हैं.

 कविता अब जाके सारा माजरा समझी.

अपनी बेटी इतने दिनों से इस टेंशन में जी रही थी सोचकर मन भर आया उसका पर गर्व भी हुआ उसपर कि उसने ऐसी दकियानुसी आधुनिक संस्कृति को नहीं अपनाया.

 गुड्डू, मुझे एक बताओ, आजतक तुम्हें कभी किसी ने मुर्ख या  बेवकूफ कहा क्या?

काव्या ने नहीं में सर हिलाया।

क्या तुम आधुनिक होने की तुम्हारे दोस्तों की इस परिभाषा से सहमत हो?

काव्या ने फिर नहीं में सर हिलाया.

   जो भी तुम्हारा अच्छा दोस्त है, क्या वो तुम्हें गलत रास्ते पर जाने के लिए मजबूर करेगा?

जो सच्चे दोस्त होते है क्या वे सबके सामने अपने ही दोस्त का मजाक उड़ाते हैं?

 काव्या ने फिर ना में सर हिलाया. 

नहीं ना तो ऐसे लोगों से दोस्ती न करना ही बेहतर है।

  तुम ठीक कहती हो मम्मा।

किसी ने तुम्हे कौआ, ऑंटी कहा तो तुम क्या कौआ बन जाती हो क्या.... कविता ने कुछ इसतरहा से ऍक्टिंग की कि काव्या की हॅंसी छूटी.

  तो फिर उनकी कही बातों का बुरा क्यो मानना.. बेटा जो बात तुममे है वो हरकिसी के पास नहीं होती. तुम्हारा आत्मविश्वास, तुम्हारा पढाई के साथ साथ अन्य विषयों का ज्ञान... अभी तक उभर कर नहीं आया और अगर किसी को तुमने अपनी ब्लैक बेल्ट का नमुना दिखाया तो कोई तुमसे पंगा नहीं लेगा क्या बोलती... कविता ने कुछ ऐसी भावभंगिमा करते हुए कहा कि काव्या के चेहरे पर मुस्कान आ गई।

 मम्मा, मुझे आपको यह बात पहले बताना चाहिए थी ... लेकिन  कैसे बताऊ इसी उलझन‌ में थी.

जाने दो... चलो, तुम फ्रेश होकर कर को आओ मैं मस्त कॉफी बनाती हूँ।

  ठीक है मैं अभी आयी, कह कर काव्या अंदर चली गई। कविता के सर पर पन्द्रह दिनों से जो बेचैन का बोझ था आज उतर गया. वह गुनगुनाते हुए काॅफी बनाने लगी.

    बच्चों के ऐसे कई नाजुक सवाल मां-बाप के सामने आते हैं. ऐसे समय में बच्चों का सही तरीके से मार्गदर्शन करना बहुत जरूरी है.


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