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मार्गदर्शन

 “फिर से मना हो गया…?”

कमरे में घुसते ही राजेश ने धीरे से पूछा। उसकी पत्नी ने एक नज़र फाइलों पर डाली, दूसरी नज़र दीवार पर टंगे कैलेंडर पर।

“हाँ,” मीरा ने धीमी आवाज़ में कहा, “इस बार भी ट्रस्ट से जवाब आया—‘हम आपकी पहल की सराहना करते हैं, पर फिलहाल आपके प्रोजेक्ट को सपोर्ट नहीं कर सकते।’”

राजेश ने फाइल उसके हाथ से लेकर सरसरी निगाह से पढ़ा,
“तीसरी बार है न…? पहले नगर निगम, फिर जिला शिक्षा अधिकारी, और अब ये ट्रस्ट… सब तारीफ करते हैं, पर आख़िरी समय में बात रुक जाती है।”

मीरा ने मेज़ पर रखी नीली फाइल पर उँगलियाँ फेरते हुए कहा,
“कहते हैं, ‘दस्तावेज़ पूरे हैं, योजना शानदार है, बच्चों के लिए बहुत अच्छा काम है’… और फिर आख़िर में—‘अभी नहीं, बाद में देखेंगे।’
राजेश, मैं समझ नहीं पा रही… गलती कहाँ है?”

राजेश कुछ देर चुप रहा, फिर बोला,
“शायद गलती तुम्हारी नहीं, हमारी दुनिया की है…
पर अब लग रहा है, हमें कारण ढूँढना ही होगा।”

मीरा ने जिस सपने को गले लगा रखा था, वह कोई मामूली सपना नहीं था।
वह छोटे शहर की सरकारी स्कूल में विज्ञान की टीचर थी।
हर साल बोर्ड का रिज़ल्ट आते ही उसे सबसे ज़्यादा दर्द उन बच्चों के लिए होता था, जो आठवीं–नौवीं तक तो मेहनत से पढ़ते, फिर दसवीं में घर की हालत या ट्यूशन न जुटा पाने के कारण औसत नंबरों से खिसक जाते।

“इन बच्चों में कितनी क्षमता है,” वह अक्सर सोचती, “अगर इन्हें थोड़ा सही मार्गदर्शन, थोड़ा समय और सही माहौल मिल जाए, तो ये भी शहर के बड़े स्कूलों के बच्चों की तरह उड़ान भर सकते हैं।”

उसी दिन से उसके मन में विचार आया—
क्यों न शाम को, अपनी नौकरी के बाद, मोहल्ले के ग़रीब बच्चों के लिए एक फ्री कोचिंग सेंटर खोला जाए?

विचार अच्छा था, लेकिन ज़मीन, किराया, किताबें, बेंच, पंखे—सबके लिए पैसे चाहिए थे। उनकी खुद की आय इतनी नहीं थी कि पूरा खर्च उठा सकें।
राजेश प्राइवेट कंपनी में जूनियर अकाउंटेंट था, ईएमआई, बच्चों की फीस, बुजुर्ग माँ की दवाइयाँ—इन सबके बीच बहुत कम बचता था।

इसलिए मीरा ने तय किया—
“मैं फ्री में पढ़ाऊँगी, पर सेंटर का खर्च किसी ट्रस्ट, एनजीओ या सरकारी योजना से उठवाऊँगी।”

योजना बनाते–बनाते एक साल निकल गया।
हर छोटी–बड़ी बात सोचकर उसने एक विस्तृत प्रोजेक्ट रिपोर्ट तैयार की—नाम रखा “उड़ान कक्षा”।
माहौल, उद्देश्यों, अनुमानित खर्च, संभावित परिणाम—सब विस्तार से लिखा था।

पहला आवेदन उसने नगर निगम की ‘सामुदायिक शिक्षा योजना’ के अंतर्गत दिया।
शुरू–शुरू में तो सब अच्छा लगा—निरीक्षक आए, बच्चों से मिले, मीरा के पढ़ाने के अंदाज़ को देखा, उसके पुराने रिज़ल्ट चेक किए।
उन्होंने कहा भी—
“आप बहुत अच्छा काम करना चाहती हैं, हम ज़रूर मदद करेंगे।”

फिर महीनों बीत गए।
न कोई कॉल, न कोई पत्र।
जब मीरा ने खुद दफ्तर जाकर पूछा, तो क्लर्क ने फाइल पलटते हुए कहा,
“मैडम, आपके बारे में लोकल लेवल से कुछ ‘मिश्रित’ रिपोर्ट आई है… ऊपर वालों ने फिलहाल फ़ंड रोक दिया है।”

“मिश्रित रिपोर्ट?” मीरा ने चौंककर पूछा,
“उसका मतलब?”

क्लर्क ने कंधे उचकाए,
“हम क्या जानें, मैडम… जो लिखकर आया, वही बता दिया हमने। आप चाहें तो ऊपर जाकर अफ़सर से मिल लीजिए।”

मीरा अफ़सर से भी मिली, पर वहाँ भी गोल–मोल जवाब मिला—
“आप काम अच्छा करना चाहती हैं, इसमें कोई शक नहीं।
पर कुछ लोग आपके ‘इरादों’ पर सवाल उठा रहे हैं।
कह रहे हैं कि आप फंड लेकर कोचिंग को प्राइवेट बना लेंगी, गरीब बच्चों के नाम पर खुद पैसे कमाएंगी वगैरह…
हम जाँच के बिना कैसे मदद करें?”

मीरा जैसे सन्न रह गई।
“कौन लोग हैं जो मेरा नाम ले–लेकर यह सब बोल रहे हैं?”

पर अफ़सर ने साफ–साफ कुछ नहीं बताया।

दूसरी बार उसने एक बड़े निजी ट्रस्ट में आवेदन किया, जो शिक्षा के क्षेत्र में काम करता था।
वहाँ से भी पहले मीटिंग, मुस्कान, तारीफ… और फिर अचानक चुप्पी।

तीसरी बार, जब उसने शहर के पुराने, प्रतिष्ठित “शारदा शिक्षा ट्रस्ट” में अप्लाई किया, तब जाकर राजेश ने ठान लिया—
“अब तो हम कारण पता लगाए बिना चैन से नहीं बैठेंगे।”

शारदा ट्रस्ट की तरफ़ से मीरा को कॉल आया,
“मैडम, आपकी प्रोजेक्ट रिपोर्ट हमें अच्छी लगी है। पर फाइनल निर्णय से पहले हम आपके शहर के कुछ लोगों से आपके बारे में जानकारी लेना चाहेंगे—ये हमारी स्टैंडर्ड प्रोसेस है।”

मीरा ने हाँ में सिर हिलाया,
“ज़रूर, आप जिसे चाहें पूछ सकते हैं।”

फोन कटते ही मीरा ने राजेश की ओर देखा,
“अब तो सब ठीक होगा न? इतने सालों की मेहनत है, राजेश…”

राजेश ने गहरी साँस ली,
“देखते हैं, इस बार क्या होता है।”

दो हफ्ते तक कोई जवाब नहीं आया।
तीसरे हफ्ते की सुबह राजेश का फोन बजा—शहर के ही एक परिचित पत्रकार, पवन का कॉल था।

“अरे राजेश भाई, क्या बात है, तुम्हारे मोहल्ले में आजकल फ्री कोचिंग का काफी जिक्र चल रहा है।”

“हाँ, मेरी पत्नी मीरा…,” राजेश ने बात शुरू ही की थी कि पवन की आवाज़ आई,
“अरे, वही मीरा दीदी न, दुबे साहब की बहन? सुन, आज बजार में तुम्हारे ताऊजी—विजय दुबे—किसी से जोर–जोर से कह रहे थे—
‘मीरा तो बस दिखावा कर रही है। आजकल एनजीओ खोलना, फंड लेना फैशन हो गया है। कौन देखता है कि गरीब बच्चों को कितना मिलता है, कितना जेब में जाता है…’
और साथ में तुम्हारा ममेरा भाई, चिराग, जोड़ रहा था—
‘दीदी की तो आदत है हर काम में आगे आने की। स्कूल में भी सब चमक–दमक उनके ही हिस्से आती है।’

मुझे कुछ अजीब लगा, इसलिए सोचा तुम्हें बता दूँ।
सुना है, बाहर से कोई ट्रस्ट वाले भी शहर में आए हैं, शायद वही लोग होंगे जिन्हें ये सब सुनाया जा रहा था।”

राजेश का चेहरा तमतमा उठा।
फोन कटते ही वह मीरा के सामने जाकर खड़ा हो गया।
मीरा बच्चों की डायरियाँ चेक कर रही थी।

“तुम्हें पता है कौन तुम्हारे रास्ते में काँटे बिछा रहा है?” राजेश की आवाज़ भारी थी।

मीरा ने सिर उठाया,
“कौन?”

“वो ही, जिनके घर में हम हर शादी–ब्याह में सबसे पहले पहुँचते हैं…
ताऊजी विजय और मामा की बेटा, चिराग।
ज़रा सी जलन क्या है, तुम्हारे हर काम को ‘पब्लिसिटी स्टंट’ बता कर सबके सामने नुचवा रहे हैं।
आज शारदा ट्रस्ट के लोगों के सामने भी उन्होंने यही किया है।”

मीरा कुछ पल खामोश रही।
फिर उसके होंठों पर हल्की मुस्कान आई,
“अपनों से दुश्मन अच्छे, राजेश… कम–से–कम सामने से वार करते हैं।
ये तो पीछे से ही तीर चलाते हैं।”

लेकिन इस बार मीरा ने ठान लिया—
“जो होगा, सच बोलकर होगा।
मैं अपने काम के लिए किसी रिश्तेदार से इजाज़त नहीं माँगूँगी, न झूठ के सहारे खड़ी रहूँगी।”

तीन दिन बाद शारदा ट्रस्ट की ओर से कॉल आया,
“मैडम, अगर आप व्यस्त न हों तो कल दोपहर तीन बजे हमारे दफ़्तर आ जाइए। ट्रस्टी महोदय आपसे मिलना चाहते हैं।”

अगले दिन मीरा और राजेश दोनों ट्रस्ट के पुराने, बड़े से दफ्तर में बैठे थे।
दीवारों पर जगह–जगह पर लगी बच्चों की मुस्कुराती तस्वीरें, कुछ शिल्ड्स, कुछ सम्मान पत्र।
थोड़ी देर में एक सौम्य, साठ वर्ष के आसपास के व्यक्ति अंदर आए—सफ़ेद बाल, हल्की मुस्कान, आँखों में गहराई।

“आईए, आईए, मीरा जी… मैं राघवनाथ शरद, ट्रस्ट का चेयरमैन,” उन्होंने आगे बढ़कर हाथ मिलाया।

मीरा और राजेश ने आदर से नमस्कार किया।

कुछ औपचारिक बातों के बाद राघवनाथ जी ने सीधे विषय पर आते हुए कहा,
“आपकी फाइल मैंने खुद पढ़ी है।
आपकी पढ़ाई, आपका अनुभव, और आपका विज़न—सब काबिले–तारीफ़ है।
पर हमें एक बात तो पूछनी ही पड़ेगी।”

मीरा ने सीधा उनकी आँखों में देखा,
“जी, ज़रूर पूछिए।”

“जब आप जैसी काबिल लड़की अपने शहर में इतना अच्छा काम करना चाहती है,” राघवनाथ जी बोले,
“तो आपके अपने ही लोग आपके बारे में इतनी उलटी–सीधी बातें क्यों कर रहे हैं?”

कमरे में कुछ क्षण के लिए सन्नाटा छा गया।
राजेश ने सजग होकर मीरा की ओर देखा।

मीरा ने गहरी साँस ली,
“क्योंकि मैं वो काम करना चाहती हूँ, जो उनके सोच के दायरे से बाहर है।
और क्योंकि उन्हें लगता है कि अगर मैं इस तरह बच्चों के लिए कुछ कर पाऊँगी, तो मोहल्ले में, समाज में मेरी पहचान उनसे ज़्यादा हो जाएगी।
जो मैं कर रही हूँ, वो दिखावा नहीं है, सर…
मैं पिछले पाँच साल से बिना फंड के भी, अपनी क्लास के बाद, दो घंटे आठ–दस बच्चों को फ्री में पढ़ाती रही हूँ।
अपने घर के ड्राइंग रूम में, छत पर, कभी किसी के बरामदे में… जहाँ जगह मिली।
पर इतनी भीड़ हो गई है कि अब जगह और साधनों की जरूरत महसूस हो रही है।”

राजेश ने जोड़ते हुए कहा,
“हमने अब तक किसी से पैसे नहीं माँगे, बस जगह और कुछ बुनियादी चीज़ों के लिए मदद चाही है।
पर हर बार… जैसे ही बात आगे बढ़ती है, कोई न कोई ‘अपना’ पीछे से जाकर इतना ज़हर घोल देता है कि सामने वाला डर जाता है।”

राघवनाथ जी कुछ देर चुप रहे, फिर हल्का सा मुस्कुराए,
“आपको शायद यह जानकर थोड़ी तसल्ली होगी कि हम भी इन सबके भुगत–भोगी हैं।”

मीरा ने आश्चर्य से कहा,
“जी…?”

“हाँ,” उन्होंने कुर्सी से थोड़ा पीछे टिकते हुए कहा,
“शारदा ट्रस्ट की शुरुआत जब मैंने की थी, तब मैं सरकारी कॉलेज में प्रोफ़ेसर था।
रिटायरमेंट के बाद सोचा, क्यों न कुछ समाज के लिए किया जाए।
एक छोटे से कमरे से हमने शुरुआत की।
तब भी कुछ ‘ख़ास अपने’—कज़िन भाई, दूर के रिश्तेदार—सब कहते थे,
‘ये सब दिखावा है। सरकारी नौकरी से जो बचाया है, अब ट्रस्ट के नाम पर वापस लेगा।’
और जब भी कोई नया दानदाता हमारे बारे में मालूम करने किसी के पास जाता,
तो वही लोग आधी–अधूरी बातें बता कर उसे डरा देते।
बहुत साल लगे, लोगों को यह समझाने में कि हर एनजीओ घोटाला नहीं होता, कुछ लोग सच में काम भी करते हैं।
इसलिए, मीरा जी, आपके दर्द को मैं भली–भाँति समझ सकता हूँ।”

मीरा की आँखों में नमी आ गई।
“तो… क्या आप भी वही निर्णय लेंगे, जो दूसरों ने लिया?
कि ‘काम अच्छा है, पर लोगों की बातें सुनकर अभी नहीं’…?”

राघवनाथ जी ने तुरंत सिर हिलाया,
“नहीं, मीरा जी। आप शायद हमारे बोर्ड के लोगों की सोच नहीं जानतीं।
हम किसी प्रोजेक्ट को सिर्फ़ दूसरों की बातों पर रिजेक्ट नहीं करते।
अगर हम केवल रिश्तेदारों की कहानियाँ सुनकर निर्णय लें, तो इस देश में कोई भी ईमानदार पहल बच ही नहीं पाएगी।
हमने आपके दो पुराने छात्र, आपके प्रिंसिपल और आपके मोहल्ले के दो अलग–अलग परिवारों से बात की है।
सबने आपके बारे में एक ही बात कही—
‘मीरा मैडम सख्त हैं, पर न्यायप्रिय हैं। बच्चों के लिए कुछ भी कर सकती हैं।’
अगर वही मोहल्ला जिसमें कुछ लोग आपकी बुराई कर रहे हैं, वही मोहल्ला यह भी कहता है कि ‘उन्होंने हमारे बच्चों को बदल दिया’,
तो हमारे लिए वह गालियाँ नहीं, गवाही बन जाती हैं।”

राजेश के चेहरे पर जैसे वर्षों पुराना बोझ हटने लगा।
“मतलब…?” उसने धीरे से पूछा।

राघवनाथ जी मुस्कुराए,
“मतलब यह कि हम आपके प्रोजेक्ट ‘उड़ान कक्षा’ को एक साल के लिए फ़ंड करेंगे।
किराए की जगह, बेंच, ब्लैकबोर्ड, दो पंखे, और ज़रूरत के हिसाब से किताबें—सबकी व्यवस्था ट्रस्ट करेगा।
बदले में आपको हर तीन महीने में प्रोग्रेस रिपोर्ट देनी होगी, बच्चों के टेस्ट रिज़ल्ट, संख्या, उनकी कहानियाँ…
और सबसे ज़रूरी, आप अपने काम में पारदर्शिता बनाए रखेंगी।
हमारे लिए यह प्रोजेक्ट सिर्फ़ आपके लिए नहीं, हमारी अपनी पुरानी लड़ाई के लिए भी है—
यह साबित करने के लिए कि दुनिया अभी सिर्फ़ बुरे लोगों से नहीं भरी है।”

मीरा को लगा, जैसे किसी ने उसके कंधों पर रखे सारे पत्थर उतार दिए हों।
उसके होंठ काँप रहे थे।
“आपने… हमें विश्वास दिया, सर,” उसने भर्राए गले से कहा,
“शायद पहली बार कोई ऐसा मिला है, जिसने हमारी बात ‘उन’ से ज़्यादा सुनी, जो खुद को अपना कहते हैं।”

राघवनाथ जी ने धीरे से कहा,
“मीरा जी, याद रखिए—
दुनिया में दो तरह के लोग होते हैं।
एक, जो दूसरों की रोशनी देख कर खुद को अंधेरा महसूस करते हैं, और हर संभव कोशिश करते हैं, कि उनका दिया बुझ जाए।
दूसरे, वे जो दूसरों का दिया जलता देख अपने कमरे में उजाला महसूस करते हैं।
हम कोशिश करेंगे कि आपकी कक्षा की रोशनी, बहुत से बच्चों तक पहुँचे।”


‘उड़ान कक्षा’ की शुरुआत वाले दिन, गली के कोने वाला पुराना गोदाम साफ़–सुथरा चमक रहा था।
दीवारों पर रंग–बिरंगे चार्ट, एक कोने में छोटी–सी लाइब्रेरी, बीच में बेंचों की दो कतारें।

पहले दिन ही पच्चीस बच्चे आ गए—किसी के पिता रिक्शा चलाते थे, किसी की माँ घरों में बर्तन माँजती थी, कोई चाय की दुकान पर काम करता था, तो कोई सब्ज़ी की रेहड़ी लगाता था।

मीरा ने बोर्ड पर बड़े अक्षरों में लिखा—
“उड़ान कक्षा – सिर्फ़ नंबरों के लिए नहीं, सपनों के लिए।”

शाम को जब बच्चे चले गए, राजेश ने कमरे के बीचोंबीच खड़े होकर ताली बजाई,
“लगता है, हमारी छोटी–सी दुनिया सच में बदलने वाली है।”

मीरा थकी हुई थी, पर उसके चेहरे पर जो चमक थी, वह थकान से कहीं ज़्यादा तेज़ थी।
“राजेश,” उसने धीरे से कहा,
“आज जब राघवनाथ सर बच्चों को देख रहे थे, तो उनकी आँखों में जो चमक थी न…
मुझे लगा, जैसे कोई मेरे साथ–साथ अपने पुराने घाव भी भर रहा हो।”

राजेश ने सिर हिलाया,
“हाँ, शायद इसलिए कि उन्होंने भी तुम्हारी तरह अपने ही लोगों के हाथों चोट खाई है…
इसलिए आज तुम्हारी जीत उन्हें अपनी जीत लग रही होगी।”

कुछ हफ्तों बाद, मोहल्ले में नए किस्से घूमने लगे।
अब वही लोग, जो कल तक कहते थे—
“मीरा तो बस शोबाजी कर रही है,”
आज दूसरों से कहते दिखते,
“अरे, हमारी भतीजी शहर भर के गरीब बच्चों को फ्री में पढ़ाती है, बड़ा काम कर रही है।”

चिराग ने दो–तीन बार कोचिंग के पास से झाँककर देखा,
इतने बच्चों को ध्यान से पढ़ते देख उसके चेहरे पर एक अजीब–सा भाव आया—
जलन, पछतावा, या शर्म… खुद वह भी नहीं जानता था।

एक दिन विजय ताऊजी भी ट्रस्ट की ओर से आए निरीक्षण दल के साथ खड़े थे।
मीरा ने उन्हें देखा, तो बस इतना कहा,
“नमस्ते ताऊजी।”

विजय ने हल्की–सी खाँसी के साथ जवाब दिया,
“जियो बेटा… अच्छा काम कर रही हो।”

मीरा ने मन–ही–मन सोचा—
“शायद कुछ लोगों को बदलने की कोशिश नहीं करनी चाहिए।
बस अपना काम इतना मज़बूती से करना चाहिए कि समय उन्हें आईना दिखा दे।”

साल भर में ‘उड़ान कक्षा’ से पाँच बच्चों ने मेरिट लिस्ट में जगह बनाई,
तीन ने पॉलीटेक्निक में दाखिला लिया,
कुछ ने आईटीआई, तो किसी ने नर्सिंग का कोर्स।

शारदा ट्रस्ट की वार्षिक बैठक में, राघवनाथ जी ने मंच से कहा,
“इस साल हमारे लिए सबसे खास प्रोजेक्ट ‘उड़ान कक्षा’ रहा।
क्योंकि यह सिर्फ़ बच्चों की नहीं, एक परिवार की, एक लड़की की जीत की कहानी है—
जो बार–बार अपने ही लोगों की रुकावटों से टकराई, पर फिर भी गिर–गिरकर उठती रही।
और हाँ, यह हमारी भी जीत है—
क्योंकि हमने किसी के बारे में फैसला, उसके रिश्तेदारों की ज़ुबान से नहीं, उसके काम की सच्चाई से किया।”

भीड़ में बैठे राजेश की आँखें चमक उठीं।
मीरा मंच के पीछे बच्चों के साथ बैठी थी—उसकी गोद में उसकी छोटी बेटी सो रही थी,
और आसपास खड़े बच्चे अपने–अपने प्रमाण पत्र लेकर खिलखिला रहे थे।

घर लौटते समय राजेश ने स्कूटर स्टार्ट करते हुए पूछा,
“थक गईं मैडम जी?”

मीरा ने हँसते हुए आसमान की ओर देखा,
“थकी तो हूँ… पर आज बहुत हल्का लग रहा है।
पता है राजेश, एक बात समझ आई—
बार–बार टूटने का दर्द तो हम भी जानते हैं,
पर अब समझ आया कि दुनिया में कुछ ऐसे लोग आज भी हैं,
जो दूसरों के घर की इज़्ज़त, अपनी इज़्ज़त मान कर चलते हैं।
और ऐसे लोगों की वजह से ही शायद, हमारे जैसे छोटे–छोटे सपने, बड़े हो पाते हैं।”

राजेश ने स्कूटर आगे बढ़ाते हुए कहा,
“हाँ, और एक बात और…
अब अगर कोई पूछे कि ‘अपनों ने क्या किया?’
तो मैं कहूँगा—
अपने तो वही हैं, जो आपके सपने को भी अपना मान लें।
बाकी तो बस भीड़ होती है, जो तालियाँ भी बजा लेती है, और पीछे से पत्थर भी मार देती है।”

मीरा मुस्कुराई।
हवा में हल्की–सी ठंडक थी,
पर उसके भीतर जो सुकून था, वह किसी भी मौसम से ज़्यादा गर्म था।


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