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बिन ब्याही मां

 भारत में ऐसे कई गांव हैं, जिनका अपना एक अलग समाज होता है. इस समाज में कई वर्जनाएं बनती हैं, तो कई टूटती भी हैं. यह समाज कई तरह की विडंबनाओं और विसंगतियों से भरा होता है, जिसका भार स्त्रियों के सिर पर होता है. यह कहानी ऐसे ही बोझ तले दबी ‘मुनिया’ की है.

15 वर्षीया मुनिया स्वभाव से चंचल होने के साथ-साथ बहुत समझदार भी थी. दिखने में सुंदर तो नहीं, पर औसत नैन-नक्शों वाली थी. वह अपने पिता की इकलौती संतान थी और मां गरीबी से तंग आकर उसे दो साल का छोड़ किसी और के साथ भाग गई थी. पर मुनिया ख़ुश थी अपने जीवन से.

उसके पिता दूसरों के खेतों में काम करते और मुनिया घर का ख़याल रखती. इस कहानी की एक और कड़ी है यशोदा चाची, जिसने मुनिया की मां के जाने के बाद उसे पालने-संभालने में उसके पिता की मदद की थी.

समृद्ध परिवार की यशोदा चाची, मुनिया के पड़ोस में ही रहती थी. चाची का 28 वर्षीय बेटा राजू मुनिया को अपनी बहन मानता था. उसकी शादी तय हो चुकी थी. मुनिया को तो जैसे ये घर दो नहीं, बल्कि एक ही लगते.

एक दिन मुनिया यशोदा चाची के घर कुछ मांगने आई और उस दिन वो हुआ, जिससे समाज की सारी वर्जनाएं टूट गईं. घर में कोई नहीं था, नशे में धुत्त राजू के सिवाय. उसने मुनिया का बलात्कार किया. मुनिया को तो यह भी बोध नहीं था कि आख़िर उसके साथ हुआ क्या?

सब कुछ पता लगने के बाद मुनिया के पिता यशोदा चाची के पास गए तो बेटे की ग़लती को नज़रअंदाज़ करते हुए वह बोली, “भैया, अब बच्चों से ग़लती तो हो ही जाती है और फिर मुनिया तो अपनी ही बेटी है. आगे भी उसकी शादी का ख़र्चा मुझे ही तो उठाना है…” लाचार व गरीब पिता हाथ बांधे वापिस आ गया.

अगले दो महीनों में राजू की शादी धूमधाम से हो गई, लेकिन इन सबके बीच मुनिया एकदम ख़ामोश हो गई. न किसी से कोई शिकायत करती, न कोई शिकवा. राजू उसके सामने ही उसका मखौल उड़ाता फिरता. तीन महीने बाद मुनिया को एहसास हुआ कि वह गर्भवती है. यशोदा चाची के सिवाय वह किसी और को जानती भी नहीं थी. बच्ची ही तो थी, वह घबरा गई. यशोदा चाची बच्चा गिराने के लिए उसे अस्पताल ले गई, पर गर्भ विकसित होने के कारण यह संभव नहीं था. अब तो मुनिया को और उसके बेबस पिता को सहना ही था. यशोदा चाची के दरवाज़े अब मुनिया और उसके पिता के लिए बंद हो गए थे. वह अपने आप में घुलती रहती. लोग तरह-तरह के ताने देते. हालांकि सच सबको पता था. कुछ दिनों बाद दोनों बाप-बेटी को जात-बिरादरी से ही नहीं, बल्कि गांव से भी बाहर कर दिया गया.

मुनिया, जो केवल 15 साल की बच्ची, मातृत्व का अर्थ भी नहीं जानती थी, अब मां बननेवाली थी और वह भी इस अपमानजनक तरी़के से. भगवान का वरदान उसके लिए श्राप बन गया था.

एक दिन अप्रत्याशित तरी़के से यशोदा चाची उनके पास आई और प्यार से बहला-फुसलाकर उन्हें गांव में ले गई. यशोदा चाची ने कहा, “देखो भैया, हमारी बहू कभी मां नहीं बन पाएगी. इसलिए राजू उसे उसके मायके छोड़ आया है. अब हम चाहते हैं कि मुनिया से इसकी शादी धूमधाम से हो जाए, ताकि उसका कलंक भी मिट जाए.” यह बात सुनकर मुनिया के पिता की ख़ुशी का ठिकाना न रहा.

कुछ महीनों के बाद मुनिया ने एक बेटे को जन्म दिया. बेटे के जन्म की बधाई देने पहुंची चाची मुनिया के पिता से बोली, “भैया, अब मुनिया हमारे घर ही रहेगी और मेरा पोता भी.” यह सुनते ही मुनिया शेरनी की भांति दहाड़ी, “किसने कहा यह आपका पोता है? यह किसी का कोई नहीं है, स़िर्फ मेरा बेटा है. जिसे आप देख रही हैं, वह स़िर्फ मातृत्व है, इसमें पितृत्व का कोई अंश नहीं है. मुझे या मेरे बच्चे को किसी की ज़रूरत नहीं. मैं बिनब्याही मां बन गई, पर आपका बेटा कभी पिता नहीं बन पाएगा. मुझे किसी समाज की फ़िक्र नहीं.” इस पर चाची उसे अगले दिन बच्चे को ले जाने की धमकी देकर वहां से चली गई. पर दूसरे दिन अख़बार में ख़बर छपी कि एक लड़की अपने बच्चे को लेकर अस्पताल से भाग गई. मातृत्व ने मुनिया जैसी अनपढ़, गंवार लड़की को भी संघर्ष करने की शक्ति दे दी थी


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